पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने अपने पत्ते खोल दिए हैं. कांग्रेस ने सूबे में 284 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है. बंगाल की चुनावी जंग पर लंबे अर्से के बाद अकेले उतरी कांग्रेस ने अपने तमाम दिग्गज नेताओं को चुनावी मैदान में उतार दिया है. अधीर रंजन चौधरी से लेकर मौसम नूर तक पर दांव खेल दिया है.
कांग्रेस ने बंगाल चुनाव में अपने दिग्गजों को मुख्य रूप से राज्य में अपनी खोई हुई साख को बचाने, जमीनी संगठन को मजबूत रखने और ममता बनर्जी व बीजेपी के बीच चल रही सीधी लड़ाई में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए चुनावी मैदान में उतारा है.
बंगाल ने कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों के जरिए एक मजबूत सोशल इंजीनियरिंग बनाने की कवायद की है ताकि चुनावी जंग को फतह कर सके. कांग्रेस ने सबसे बड़ा दांव मुस्लिमों पर खेला, उसके बाद दलित और महिलाओं पर भरोसा जताया है. ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस की रणनीति से ममता बनर्जी का खेल बिगड़ेगा या फिर बीजेपी का गेम खराब होगा?
कांग्रेस ने अपने दिग्गज नेताओं पर खेला दांव
कांग्रेस ने बंगाल की 294 सीटों में से 284 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं.कांग्रेस ने अपने सबसे कद्दावर नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी को उनके परंपरागत गढ़ बहरामपुर से टिकट दिया है, जो करीब 30 साल के बाद विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाएंगे. अधीर ने पिछली बार 1996 में नवग्राम सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा व जीता था.
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1999 में कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें लोकसभा लोकसभा चुनाव में उतारते हुए बहरमपुर से टिकट दिया था, जहां से वे पांच बार सांसद निर्वाचित हुए. 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें तृणमूल कांग्रेस प्रत्याशी पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान ने हरा दिया था और अब पार्टी ने उन्हें विधानसभा के चुनाव में दांव खेला है. कांग्रेस की लिस्ट में दूसरा प्रमुख नाम मौसम बेनजीर नूर का है, जिन्होंने हाल में तृणमूल से वापसी की है. मालदा क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए मौसम नूर को मालतीपुर सीट से चुनावी मैदान में उतारा गया है .
कांग्रेस भवानीपुर में प्रदीप प्रसाद को प्रत्याशी बनाया है, जहां तृणमूल से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी व भाजपा से सुवेंदु अधिकारी प्रत्याशी हैं. वहीं, कांग्रेस ने नंदीग्राम सीट से शेख जरियातुल हुसैन को प्रत्याशी बनाया है. रायगंज से मोहित सेनगुप्ता, जलांगी से अब्दुल रेज्जाक मोल्ला, चकुलिया से अली इमरान रम्ज़ और बालीगंज सीट से रोहन मित्रा जैसे दिग्गज नेता को उतारा है.
कंग्रेस ने बंगाल चुनाव में किसी विशिष्ट हस्ती के बजाय अपने पुराने वफादारों पर भरोसा कायम रखा है. कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि इस बार राज्य में अपनी खोई सियासी जमीन वापस पाने के लिए इस बार गठबंधन के बजाय अपने दम पर चुनाव लड़ेगी.
कांग्रेस की बंगाल में सोशल इंजीनियरिंग
बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों के जरिए एक मजबूत सोशल इंजीनियरिंग का दांव चला है. कांग्रेस ने अपने 284 उम्मीदवारों में 68 दलित समुदाय के प्रत्याशी उतारे हैं तो 64 मुस्लिम कैंडिडेट है. इसके अलावा 16 अनुसूचित जनजाति से है तो 42 महिला उम्मीदवार हैं. इस तरह से कांग्रेस ने दलित और मुस्लिम पर सबसे ज्यादा भरोसा जताया है, जो ममता बनर्जी और बीजेपी दोनों के लिए सियासी टेंशन बन सकता है.
कांग्रेस ने अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर विशेष ध्यान दिया है तो मुस्लिम बहुल जिलों मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर में पार्टी ने अपने मजबूत संगठनात्मक ढांचे के आधार पर प्रत्याशियों का चयन किया है, जिससे त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना है. कोलकाता के मुस्लिम बहुल मटियाब्रुज से मोहम्मद मुख्तार, कोलकाता पोर्ट से आकिब गुलजार व इंटाली से कासिफ रेजा को उतारा है.
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कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में बड़ी संख्या में महिलाओं और नए चेहरों को भी जगह दी गई है. कोलकाता और हावड़ा जैसे शहरी क्षेत्रों में पेशेवर और युवा चेहरों पर दांव लगाया है.बालीगंज में पूर्व बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष दिवंगत सोमेन मित्रा के पुत्र रोहन मित्रा को टिकट दिया गया है. सिंगुर से बरुण कुमार मलिक, आसनसोल उत्तर से प्रसेनजीत पुइतांडी, आसनसोल दक्षिण से सौविक मुखर्जी, खडग़पुर से उज्ज्वल मुखर्जी और सिलीगुड़ी से आलोक धारा को उतारा गया है.
ममता या बीजेपी किसका खेल खराब करेगी कांग्रेस
बंगाल चुनाव में टीएमसी भले ही सबसे बड़ा दल बने लेकिन पिछली बार की तरह ग्रैंड मेजोरिटी मिलने से रही. ऐसे में कांग्रेस अपने दिग्गज नेताओं के सहारे बंगाल के सियासी गेम को त्रिकाणीय बनाने की है. असली सेंध मुस्लिम वोटों और बांग्ला भद्रलोक में लगेगी, जो ममता बनर्जी का सबसे बड़ा वोटबैंक बना हुआ है. कांग्रेस की रणनीति साफ है कि मालदा और मुर्शिदाबाद में फोकस कर कुछ सीटें हासिल करना.
कांग्रेस नेताओं को मानना है कि मुस्लिम बहुल जिलों में 2-3 सीटें भी जीत ली जाती हैं, तो बंगाल में उसकी वापसी की नींव रखी जा सकती है. हालांकि, मुकाबला आसान नहीं है. इन मुस्लिम बहुल इलाकों में तृणमूल कांग्रेस के अलावा असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर की पार्टियों का गठजोड़ भी चुनावी मैदान में है. ऐसे में मुस्लिम वोट बैंक का बंटवारा निर्णायक साबित हो सकता है.
बंगाल में कांग्रेस क्या साबित होगी तुरुप का इक्का
बंगाल के 2021 चुनाव में शून्य पर सिमटने के बाद, कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य अपने वोट शेयर को बढ़ाना और यह साबित करना है कि वह अभी भी बंगाल की सियासत में एक महत्वपूर्ण ताकत है. कांग्रेस और वामपंथी दलों दोनों के असफल रहने के चलते, 2021का बंगाल विधानसभा चुनाव द्विध्रुवीय सदन में तब्दील हो गया. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 294 में से 213 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा ने राज्य के इतिहास में पहली बार तीन से 77 सीटें जीतकर विपक्षी दल बन गई.
कांग्रेस के लिए पहली चुनौती है,जिसे न केवल राज्य में मजबूत स्थिति वाली सत्ताधारी तृणमूल से मुकाबला करना होगा, बल्कि बीजेपी, जो मुख्य विपक्षी दल है, से भी भिड़ना होगा. कांग्रेस को अपने पारंपरिक गढ़ों जैसे मालदा और मुर्शिदाबाद जिलों में कम से कम कुछ सीटें वापस हासिल करनी होंगी और उत्तर बंगाल के कुछ अन्य क्षेत्रों और राज्य भर के अन्य इलाकों में अपना वोट शेयर बढ़ाना होगा। अपने चुनाव प्रचार के मुख्य बिंदु के बारे में पूछे जाने पर ईशा खान चौधरी ने कहा, "हम वैचारिक रूप से भाजपा के विरोधी हैं. इसीलिए कांग्रेस ने मुस्लिमों को बड़ी संख्या में उतारा है.