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PM मोदी ने बताया था 'दोस्त अखिलेश', 3 महीने में सपा चीफ लेने लगे यू-टर्न!

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के बीच सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण लागू करने और परिसीमन बिल के जरिए उच्च सदन में सीटें बढ़ाने की मांग की है. उन्होंने यह बात महिल संगठनों से मुलाकात के बाद कही है. ऐसे में सवाल उठता है कि तीन महीने के बाद अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर क्यों यू-टर्न लिया?

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मोदी सरकार का समर्थन करेंगे अखिलश यादव (Photo-ITG)
मोदी सरकार का समर्थन करेंगे अखिलश यादव (Photo-ITG)

16 अप्रैल 2026 का दिन था, महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के मुद्दे पर संसद में चर्चा चल रही थी, जिसके चलते माहौल गर्म था. लोकसभा में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बात कही थी,'अखिलेश जी मेरे मित्र हैं, जो कभी-कभी हमारी मदद कर देते हैं.' हालांकि, सपा प्रमुख अखिलेश यादव उस समय पीएम मोदी के मदद नहीं कर सके थे, जिसके चलते सरकार बिल नहीं पास करा सकी थी. अब तीन महीने बाद अखिलेश ने यू-टर्न लिया है और मोदी सरकार के मदद के लिए पॉजिटिव संकेत दे दिए हैं. 

लोकसभा में मॉनसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के दोबारा पेश होने की चर्चाओं के बीच अखिलेश यादव की राजनीति बदली हुई नजर आ रही है. मंगलवार को महिला संगठनों और सिविल सोसाइटी से जुड़े प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने तीन शर्तों के साथ महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के समर्थन के संकेत दिए हैं. 

अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण को 2027 के विधानसभा चुनाव में ही लागू करने, परिसीमन बिल के माध्यम से उच्च सदन में सीटें बढ़ाने की मांग की है. इसके अलावा महिला आरक्षण बिल से पीडीए में शामिल पिछड़े समाज और अल्पसंख्यक मुस्लिम महिलाओं का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की मांग रखी. ऐसे में साफ है कि सरकार इन मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाती है, तो सपा अपना समर्थन दे सकती है. 

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महिला आरक्षण के समर्थन में उतरी सपा
महिला संगठनों के प्रतिनिधि मंडल ने सपा प्रमुख से मुलाकात के दौरान महिला आरक्षण को तत्काल प्रभाव से क्रियान्वयन कराने की मांग रखी. महिला संगठनों और सिविल सोसाइटी से जुड़े हुए प्रतिनिधिमंडल ने अखिलेश से मुलाकात कर मांग उठाई है कि संसद के आगामी मानसून सत्र के दौरान संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम में जरूरी बदलाव कर महिला आरक्षण को तत्काल लागू कराया जाए. 

महिला संगठनों ने मांग किया कि सपा, संसद के भीतर और बाहर इस मांग का समर्थन करे और केंद्र सरकार पर महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से अलग कर लागू करने के लिए दबाव बनाए. इसके बाद ही अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया के जरिए महिला संगठन के मांगों का समर्थन करते हुए सरकार के सामने तीन मांगे रखी. उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण केवल लोकसभा तक सीमित न रहकर विधान परिषद और राज्यसभा में भी लागू किया जाना चाहिए. इसके अलावा दलित, पिछड़ी और मुस्लिम महिलाओं के प्रतिनिधित्व देने की मागं रखी. 

तीन महीने में अखिलेश यादव का यू-टर्न
मोदी सरकार ने अप्रैल 2026 में महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) और परिसीमन बिल को पास कराना चाहती थी, जिसके लिए दोनों ही बिल को लेकर आई थी. उस समय सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने विपक्ष के साथ मजबूती से खड़े रहकर पुरजोर तरीके से विरोध किया था, जिसके चलते ही मोदी सरकार संसद से पास नहीं करा सकी थी. 

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हालांकि, उस समय संसद में पीएम मोदी ने अखिलेश यादव को अपना मित्र बताया था और मदद की उम्मीद भी जताई थी, लेकिन सपा सांसदों ने सरकार के समर्थन करने के बजाय दोनों बिल के खिलाफ वोटिंग की थी. अब तीन महीने के बाद मॉनसून सत्र में मोदी सरकार दोबारा से महिला आरक्षण और परिसीमन बिल लाने की प्लानिंग कर रही है, जिसके बीच ही महिला संगठनों के साथ ही अखिलेश यादव मुलाकात करते हैं और शर्तों के साथ समर्थन करने के संकेत दे दे देते हैं. 

अखिलेश यादव के इस रुख को रणनीतिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि अप्रैल से जुलाई आने तक बहुत कुछ बदल चुका है. बीजेपी ने दो-तिहाई वाले आंकड़े के करीब खड़ी नजर आ रही है, जिसके चलते ही अखिलेश यादव भी विरोध के बजाय शर्तों के साथ समर्थन के संकेत दे रहे हैं.

सपा ने सरकार के सामने तीन शर्तें रखीं
अखिलेश यादव पहले सैद्धांतिक रूप से इस बिल विरोध में थे, लेकिन यूपी की चुनावी तपिश और बदले हुए सियासी माहौल को देखते हुए शर्तों के साथ महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के लिए पॉजेटिव संकेत दिए हैं. सपा पूरी तरह इस बिल के खिलाफ है, बल्कि उन्होंने सरकार के सामने 3 बड़ी शर्तें रखकर नया पासा फेंका है.

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सपा प्रमुख ने अपने सोशल मीडिया के जरिए कहा कि परिसीमन बिल के माध्यम से उच्च सदन (विधान परिषद/राज्यसभा के संदर्भ में सीट विस्तार) में भी सीटों की संख्या बढ़ाई जाए. इसके अलावा दूसरी मांग रखी कि महिला आरक्षण बिल के तहत PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) में शामिल पिछड़े समाज की महिलाओं और अल्पसंख्यक मुस्लिम महिलाओं का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए. तीसरी मांग रखी कि महिला आरक्षण को 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ही लागू किया जाए.

अखिलेश की रणनीति में क्यों आया बदलाव
अखिलेश यादव का यह कदम 'यू-टर्न' से ज्यादा 'राजनीतिक आत्मरक्षा' और मौके की नजाकत से जोड़कर देखा जा रहा है. तीन महीने में सियासी हालात बदले हैं. पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद ममता बनर्जी की पार्टी टूट गई है, टीएमस के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद अलग होकर एनसीपीआई में विलय कर सरकार के समर्थन में खड़े हैं.

इसके अलावा उद्धव ठाकरे की पार्टी के 9 में से 6 लोकसभा सांसद टूटकर शिंदे खेमे के साथ चले गए हैं.  इंडिया ब्लॉक से डीएमके भी अलग हो चुकी है. इस तरह से विपक्ष का गेम बिगड़ा है तो एनडीए दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंचती नजर आ रही है. 

बीजेपी के अगुवाई वाले एनडीए की रणनीति को देखते हुए अखिलेश यादव महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के विरोध में खड़े रहने का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे. इसकी वजह यह है कि जब अप्रैल में उन्होंने दोनों बिल का विरोध किया था तो बीजेपी ने उन्हें महिला विरोधी कठघरे में खड़े करने की कवायद की थी. 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए अखिलेश यादव किसी भी तरह का कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं, क्योंकि उन्होंने बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन का सियासी हश्र देख चुके हैं. 

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महिलाएं जिस तरह देश की राजनीतिक दशा और दिशा तय कर रही हैं, उसके चलते यूपी चुनाव में उनकी भूमिका अहम रहने वाली है. अखिलेश यादव इस बात को भी समझ रहे हैं कि बीजेपी जिस तरह से दो-तिहाई बहुमत के नंबर जुटाने के करीब पहुंच रही है, उसमें विरोध करके अब बिल को नहीं रोक पाएंगे. ऐसे में विलेन बनने का कोई फायदा नहीं है. इसीलिए वे भाजपा के बुने जाल में बिना फंसे समर्थन के संकेत दिए हैं. इस बहाने अपने पीडीए का एजेंडा भी सेट कर देना चाहते हैं, जिसके लिए उन्होंने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक महिलाओं के प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग रखी है.

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