18 सितंबर को आईआईटी बॉम्बे के हॉस्टल नंबर-16 में बीटेक द्वितीय वर्ष के छात्र साहिल वाकोडे का शव मिलने के बाद संस्थान में फैला आक्रोश अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है. शुरुआती दौर में जहां परिजनों के बयानों और छात्र प्रदर्शनों का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु 'जातिगत उत्पीड़न' था, वहीं अब समय बीतने के साथ परिसर के भीतर इस पूरे नैरेटिव के सुर बदलते हुए दिख रहे हैं.
साहिल के परिवार ने फैकल्टी सदस्य प्रो. सूर्यनारायण दुल्ला पर मानसिक प्रताड़ना का सीधा आरोप लगाया था, जिसके आधार पर मुंबई पुलिस ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी थी. लेकिन घटना के कुछ ही दिनों बाद, शुरुआती आक्रोश का केंद्र रहा 'जातिगत भेदभाव' का मुद्दा छात्रों के आधिकारिक बयानों और मांगों से लगभग नेपथ्य में चला गया है.
विरोध प्रदर्शनों में अचानक कैसे बदला सुर?
साहिल की मौत के तुरंत बाद परिसर में जो गुस्सा 'कास्ट बायस' और प्रताड़ना के खिलाफ खुलकर सामने आ रहा था, वह अब छात्र प्रतिनिधियों की आधिकारिक दलीलों में 'संस्थागत सुधार', 'एकेडमिक प्रेशर' और 'सिस्टमैटिक बदलाव' की गोल-मोल शब्दावली में तब्दील हो गया है.
छात्र प्रतिनिधियों की ओर से जारी हालिया बयानों में प्रो. दुल्ला को लेकर बेहद संतुलित और सतर्क रुख अपनाया गया है. छात्रों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को जांच से पहले दोषी ठहराना नहीं है, बल्कि वे केवल यह चाहते थे कि निष्पक्ष जांच होने तक प्रोफेसर को प्रशासनिक जिम्मेदारियों (डीन एडमिनिस्ट्रेटिव अफेयर्स) से अलग रखा जाए.
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि परिजनों की एफआईआर में दर्ज प्राथमिक आरोप पर छात्रों का रुख इतना 'सॉफ्ट' और सामान्य कैसे हो गया? क्या यह किसी संस्थागत दबाव का नतीजा है या फिर शुरुआती दावों के सामने जांच के दौरान आ रहे तथ्यों का असर?
'सेल में कोई शिकायत नहीं थी'- फैकल्टी फोरम का काउंटर अटैक
दूसरी तरफ, आईआईटी बॉम्बे फैकल्टी फोरम प्रो. दुल्ला के बचाव में पूरी मजबूती के साथ सामने आया है. फोरम ने मीडिया में चल रही खबरों का खंडन करते हुए साफ किया कि प्रोफेसर को निलंबित नहीं किया गया है, बल्कि जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए उन्हें केवल प्रशासनिक प्रभार से मुक्त किया गया है.
फैकल्टी फोरम के अध्यक्ष प्रो. डॉ. राजकुमार पंत ने जातिगत आरोपों पर पलटवार करते हुए संस्थान के आधिकारिक रिकॉर्ड्स को सामने रखा. प्रो. पंत ने स्पष्ट किया कि हर संस्थान की तरह हमारे पास भी एससी/एसटी वर्ग के छात्रों के कल्याण के लिए एक समर्पित एससी/एसटी सेल है. संस्थान के डिप्टी डायरेक्टर प्रो. रवींद्र गुडी से मिली जानकारी के अनुसार, सेल ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि बीते तीन-चार महीनों में साहिल की ओर से किसी भी शिकायत या संपर्क का कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं है.
प्रो. पंत ने आगे कहा कि एक शिक्षक के तौर पर परीक्षा में अनुचित साधनों (चीटिंग) के इस्तेमाल को रोकना नियम के तहत अनिवार्य है. प्रो. दुल्ला ने केवल अपनी निर्धारित ड्यूटी निभाई थी ताकि ईमानदारी से परीक्षा देने वाले बहुसंख्यक छात्रों के अधिकार सुरक्षित रहें.
संस्थागत व्यवस्था पर खड़े होते गंभीर सवाल
फैकल्टी फोरम जहां यह तर्क दे रहा है कि एससी/एसटी सेल में कोई पूर्व शिकायत दर्ज नहीं थी, वहीं बाहरी छात्र संगठन (जैसे AISA) अभी भी पूरी प्रशासनिक जवाबदेही और इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से कई बुनियादी और संवेदनशील सवाल उठते हैं जैसे क्या शिकायत न होना ही प्रताड़ना न होने का सुबूत है? क्या किसी छात्र का एससी/एसटी सेल में न पहुंचना इस बात का अंतिम प्रमाण माना जा सकता है कि वह किसी अलगाव या दबाव का सामना नहीं कर रहा था?
सवाल ये भी है कि क्या प्रीमियम संस्थानों में बने एससी/एसटी सेल्स छात्रों के भीतर इतना भरोसा कायम कर पाते हैं कि वे अपनी परेशानी बेझिझक वहां दर्ज करा सकें?
फिलहाल मुंबई क्राइम ब्रांच 18 सितंबर की दोपहर परीक्षा हॉल से हॉस्टल तक के सीसीटीवी फुटेज और अन्य तकनीकी साक्ष्यों को खंगाल रही है. फाइलों, बयानों और जांच के बीच साहिल की दुखद मौत का असली सच कानूनी प्रक्रिया के बाद ही सामने आ पाएगा. लेकिन इस घटना ने एक बार फिर देश के शीर्ष संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, संस्थागत दबाव और जातिगत संवेदनशीलताओं पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है.