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जानें- कौन हैं बसवेश्वर भगवान, जिनके आगे नतमस्तक हैं सभी नेता

आज लिंगायत समाज के दार्शनिक और समाज सुधारक बसवेश्वर भगवान की जयंती है. इस मौके पर कई नेता उनकी जंयती मना रहे हैं और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं.

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बसवेश्वर भगवान
बसवेश्वर भगवान

आज लिंगायत समाज के दार्शनिक और समाज सुधारक बसवेश्वर भगवान की जयंती है. इस मौके पर कई नेता उनकी जंयती मना रहे हैं और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी बेंगलुरु में बसवेश्वर भगवान की जयंती मनाई और माल्यार्पण किया. आइए जानते हैं कौन थे बसवेश्वर और समाज में फैली कुरीतियों को कम करवाने में उनका क्या योगदान है...

- बसवेश्वर भगवान को हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था और अन्य कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष करने के लिए जाना जाता है. उन्हें विश्व गुरु, भक्ति भंडारी और बसव भी कहा जाता है. उन्होंने लिंग, जाति, सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना सभी लोगों को बराबर अवसर देने की बात कही थी. वह निराकार भगवान की अवधारणा के एक समर्थक हैं.

- संत बसवेश्वर का जन्म 1131 ईसवी में बागेवाडी (कर्नाटक के संयुक्त बीजापुर जिले में स्थित) में हुआ था. उन्होंने उपनयन संस्कार (जनेऊ) होने के बाद 8 साल की उम्र में ही इस धागे को तोड़ दिया था.

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- उन्होंने उस दौर में कई पदों पर अपनी सेवाएं भी दी थीं. समाज में गरीब-अमीर और जाति के आधार पर भेदभाव हो रहा था. जिसके खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई.

- बसवेश्वर, एक ऐसे संत थे, जिन्होंने 800 साल पहले नारी प्रताड़ना को खत्म करने की लड़ाई लड़ी. साथ ही वो शिव के उपासक थे और उन्होंने मठों, मंदिरों में फैली कुरीतियों, अंधविश्वासों और अमीरों की सत्ता को चुनौती दी. एक संत जिसके नाम से कन्नड़ साहित्य का एक पूरा युग जाना जाता है.

- बसवेश्वर खुद ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे. उन्होंने ब्राह्मणों की वर्चस्ववादी व्यवस्था का विरोध किया. वे जन्म आधारित व्यवस्था की जगह कर्म आधारित व्यवस्था में विश्वास करते थे. उन्होंने कुरीतियों को हटाने के लिए इस नए संप्रदाय की स्थापना की, जिसका नाम लिंगायत था. बता दें लिंगायत पहले हिंदू वैदिक धर्म का ही पालन करता था.

- लिंगायत समाज को कर्नाटक की अगड़ी जातियों में गिना जाता है. कर्नाटक की आबादी का 18 फीसदी लिंगायत हैं. पास के राज्यों जैसे महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी लिंगायतों की अच्छी खासी आबादी है.

- लिंगायत सम्प्रदाय के लोग ना तो वेदों में विश्वास रखते हैं और ना ही मूर्ति पूजा में. लिंगायत हिंदुओं के भगवान शिव की पूजा नहीं करते लेकिन भगवान को उचित आकार "इष्टलिंग" के रूप में पूजा करने का तरीका प्रदान करता है.

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- इष्टलिंग अंडे के आकार की गेंदनुमा आकृति होती है जिसे वे धागे से अपने शरीर पर बांधते हैं. लिंगायत इस इष्टलिंग को आंतरिक चेतना का प्रतीक मानते हैं. निराकार परमात्मा को मानव या प्राणियों के आकार में कल्पित न करके विश्व के आकार में इष्टलिंग की रचना की गई है.

- लिंगायत पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं करते हैं. लिंगायतों का मानना है कि एक ही जीवन है और कोई भी अपने कर्मों से अपने जीवन को स्वर्ग और नरक बना सकता है.

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