आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की रफ्तार ने आज पूरी दुनिया की रफ्तार बदल दी है. सॉफ्टवेयर डेवलपर्स और रिसर्चर्स की नींद उड़ाने के बाद अब एआई का खौफ दुनिया भर के युवा गणितज्ञों के दिलों-दिमाग पर छाने लगा है. स्थिति यह है कि कई युवा यह सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि उन्हें अपने चुने हुए इस कठिन क्षेत्र में टिके रहना चाहिए या नहीं.
मैसेच्युसट इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) की एक नई और बेहद दिलचस्प स्टडी सामने आई है, जिसके आंकड़े किसी भी अकादमिक पेशेवर को चौंकाने के लिए काफी हैं. आइए जानते हैं कि इस स्टडी में क्या-क्या खुलासे हुए हैं और क्यों आज युवा गणितज्ञ एआई के साये में जीने को मजबूर हैं:
भारत समेत 5 देशों के 268 गणितज्ञों पर हुआ सर्वे
MIT के रिसर्चर्स अन्ना ब्रैंडेनबर्गर, हन्ना मुलारजिक और डोरा वुडरफ ने गणित के ग्रेजुएट छात्रों और पोस्टडॉक्टोरल रिसर्चर्स से एआई के बढ़ते दखल पर तीखे सवाल किए. इस स्टडी में भारत समेत कम से कम पांच देशों के करीब 60 संस्थानों से जुड़े 268 युवा गणितज्ञों को शामिल किया गया. इनमें से लगभग 85 प्रतिशत ग्रेजुएट छात्र और करीब 15 प्रतिशत पोस्टडॉक्टोरल रिसर्चर थे. लेकिन इन सबसे मिले जवाब बिल्कुल भी उत्साह बढ़ाने वाले नहीं थे.
नौकरी और करियर को लेकर गहराया संकट
स्टडी के आंकड़े बताते हैं कि एआई के कारण युवा रिसर्चर्स का अकादमिक दुनिया से मोहभंग हो रहा है. सर्वे में शामिल करीब 70 प्रतिशत युवा गणितज्ञों ने कहा कि अब उनके अकादमिक गणित में अपना काम जारी रखने की संभावना काफी कम हो गई है. इसके विपरीत, सिर्फ 9 प्रतिशत ने माना कि इस क्षेत्र में उनके बने रहने की संभावना बढ़ी है.
लगभग 76.3 प्रतिशत का मानना है कि एआई के कारण भविष्य में किसी यूनिवर्सिटी में स्थायी शिक्षण और रिसर्च की नौकरी (जिसे 'टेन्योर ट्रैक' पद कहा जाता है) पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा.
अगर AI ने हमारी समस्या हल कर दी, तो खुशी नहीं होगी...
एआई का असर सिर्फ नौकरियों पर ही नहीं, बल्कि रिसर्चर्स के मानसिक उत्साह पर भी पड़ रहा है. करीब 76.5 प्रतिशत युवा गणितज्ञों ने माना कि एआई के आने के बाद अब गणित की कठिन समस्याओं पर माथापच्ची करने की उनकी इच्छा कम होने लगी है.
हैरानी की बात यह है कि इतने ही लोगों ने यह भी कहा कि अगर एआई उस समस्या को हल कर दे, जिस पर वे महीनों या सालों से काम कर रहे हैं, तो उन्हें जरा भी खुशी नहीं होगी.
कई रिसर्चर्स को इस बात का डर सता रहा है कि जिस गुत्थी को सुलझाने में उन्होंने अपनी रातें एक कर दी हैं, उसे एआई चुटकियों में हल कर देगा जिससे उनकी अपनी मेहनत और वजूद कमतर महसूस होने लगता है. इसी डर के चलते कुछ रिसर्चर अब अपना अधूरा रिसर्च दूसरों के साथ साझा करने से भी कतराने लगे हैं.
फंडिंग और भविष्य को लेकर असमंजस
69 प्रतिशत युवाओं को इस बात का गहरा डर है कि आने वाले समय में रिसर्च की फंडिंग यूनिवर्सिटीज से छिनकर सीधे निजी एआई कंपनियों के हाथों में चली जाएगी. वहीं, 59 प्रतिशत रिसर्चर यह सोचते हुए परेशान हैं कि क्या अगले 10 वर्षों में गणित उनके लिए एक दिलचस्प और सार्थक करियर बना भी रह पाएगा या नहीं.
दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई रिसर्चर खुद अपने दैनिक काम में एआई का इस्तेमाल करते हैं जैसे रिसर्च पेपर खोजना, लेखन को एडिट करना या गणितीय गलतियों की जांच करना. इसके बावजूद, 54.8 प्रतिशत ने खुलकर माना कि उन्हें अपने रिसर्च के लिए एआई का उपयोग करना बिल्कुल पसंद नहीं है.
नेवियर-स्टोक्स समाधान पर विवाद और बढ़ता तनाव
यह पूरा सर्वे ऐसे समय में सामने आया है जब एआई द्वारा तैयार किए जा रहे रिसर्च को लेकर वैश्विक गणित समुदाय में तनाव अपनी चरम सीमा पर है.
इसी साल सितंबर में ओपनएआई (OpenAI) ने घोषणा की थी कि उसके एक एआई मॉडल ने नेवियर-स्टोक्स समस्या का समाधान तैयार कर लिया है. तरल पदार्थों की गति से जुड़ी यह मशहूर गुत्थी पिछले एक सदी से गणितज्ञों के लिए सिरदर्द बनी हुई है. कंपनी के मुताबिक, उसके सिस्टम ने करीब 10,000 एआई एजेंट्स को 88 घंटे तक दौड़ाकर यह समाधान निकाला था.
इस घोषणा के बाद दुनिया भर के गणितज्ञों में नाराजगी फैल गई. न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के दो गणितज्ञ, जो इसी समस्या पर काम कर रहे थे, ने चिंता जताई कि क्या ओपनएआई ने उनके अप्रकाशित शोध का इस्तेमाल किया है. हालांकि, ओपनएआई ने इससे साफ इंकार किया है. यहां तक कि इस समस्या को हल करने पर 1 मिलियन डॉलर का पुरस्कार देने वाले 'क्ले मैथमेटिक्स इंस्टीट्यूट' ने भी ओपनएआई के इस दावे वाले समाधान को मान्यता नहीं दी है.