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10 लाख ज्यादा सैलरी लेकिन फिर भी कोई बचत नहीं! बेंगलुरु में रहना आसान नहीं    

अच्छी नौकरी और ज्यादा सैलरी मिलने पर अक्सर लोग इसे आर्थिक तरक्की से जोड़कर देखते हैं लेकिन अगर नौकरी के लिए दूसरे शहर में जाना पड़े तो सिर्फ पैकेज बढ़ने से बचत भी बढ़े, यह जरूरी नहीं है. बेंगलुरु में काम करने वाले टेक प्रोफेशनल के एक विश्लेषण में इसी बात पर ध्यान दिलाया गया है. 

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10 लाख ज्यादा सैलरी फिर भी नहीं पा रही बचत.
10 लाख ज्यादा सैलरी फिर भी नहीं पा रही बचत.

अच्छी सैलरी को हमेशा आर्थिक सुरक्षा और स्थिरता के तौर पर देखा जाता रहा है. लेकिन भारत के बड़े शहरों में सैलरी और व्यय की तुलना करने पर एक टेक प्रोफेशनल ने अलग ही प्रतिक्रिया शेयर की है. उन्होंने बताया कि ज्यादा सैलरी का ये मतलब बिल्कुल नहीं होता है कि बचत भी ज्यादा होगी. 

सोशल मीडिया पर शेयर किया वीडियो

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर टेक प्रोफेशनल सुमित ने बेंगलुरु, दिल्ली, नोएडा और गुरुग्राम में हर महीने 1 लाख रुपये कमाने वाले व्यक्ति की तुलना की है. इस दौरान उनका फोकस इस बात पर था कि सैलरी मिलने के बाद सभी जरूरी खर्च निकालकर आखिर में कितना पैसा बचता है. उनके मुताबिक, बेंगलुरु में नौकरी करने वाले व्यक्ति को किराया, खाना, रोजाना आने-जाने और दूसरे जरूरी खर्चों पर काफी पैसा खर्च करना पड़ सकता है. ऐसे में ज्यादा सैलरी का बड़ा हिस्सा जीवन-यापन के खर्च में चला जाता है. 

घर से दूर रहने पर बढ़ जाता है खर्च

अगर कोई कर्मचारी पहले अपने परिवार के साथ रहता था और नौकरी के लिए बेंगलुरु शिफ्ट होता है, तो उसके कई नए खर्च जुड़ जाते हैं. सबसे बड़ा खर्च किराया हो सकता है. इसके अलावा खाना, ऑफिस आने-जाने और रोजमर्रा के खर्च भी बजट पर असर डालते हैं. इसके साथ घर जाने का खर्च भी जुड़ सकता है. सुमित के अनुमान के अनुसार, एक राउंड-ट्रिप फ्लाइट में करीब ₹20,000 खर्च हो सकते हैं. साल में कई बार घर आने-जाने पर यह रकम भी बड़ा खर्च बन सकती है. 

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बेंगलुरु में करीब ₹10 लाख सालाना खर्च का अनुमान

सुमित ने किराए, खाने और यात्रा समेत बेंगलुरु में एक प्रोफेशनल के कुल सालाना खर्च का अनुमान करीब ₹10 लाख लगाया है. हालांकि, यह सभी लोगों पर लागू होने वाली तय रकम नहीं है. वास्तविक खर्च व्यक्ति के रहने की जगह, लाइफस्टाइल, आने-जाने के तरीके और घर जाने की frequency पर निर्भर करेगा. 

ज्यादा पैकेज मिलने पर भी फैसला सोच-समझकर करें

मान लीजिए कोई व्यक्ति दिल्ली में परिवार के साथ रहकर कम सैलरी पा रहा है और उसे बेंगलुरु जाने पर सालाना ₹10 लाख ज्यादा मिल रहे हैं. पहली नजर में यह बड़ा फायदा दिखाई देता है. लेकिन अगर नई नौकरी के साथ किराया, खाना, ट्रांसपोर्ट और घर आने-जाने के खर्च बढ़ जाते हैं, तो अतिरिक्त कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च हो सकता है. 

इसलिए नौकरी बदलते समय सिर्फ CTC या सैलरी को देखकर फैसला नहीं करना चाहिए. यह भी देखना जरूरी है कि सभी खर्चों के बाद कितनी रकम बचेगी, कितनी बचत हो पाएगी और नई नौकरी से जीवनशैली पर क्या असर पड़ेगा. यानी बड़ा पैकेज हमेशा बड़ी बचत की गारंटी नहीं देता. नौकरी का ऑफर स्वीकार करने से पहले सैलरी के साथ-साथ शहर में रहने की वास्तविक लागत का हिसाब लगाना भी जरूरी है. 

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