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फाइटर जेट, ड्रोन और मिसाइलें... क्या है ईरान के हथियारों का रूस-चीन कनेक्शन?

चीन और रूस, ईरान के हथियारों के सबसे बड़े सहयोगी हैं. रूस ईरान को Su-35 फाइटर जेट, S-300 एयर डिफेंस सिस्टम, वेरबा मिसाइलें और अटैक हेलीकॉप्टर सीधे सप्लाई करता रहा है. चीन मुख्य रूप से मिसाइल पार्ट्स, केमिकल्स तथा ड्रोन कंपोनेंट्स देता है. दोनों देशों के साथ जॉइंट प्रोडक्शन भी चल रहा है जैसे रूस में शाहेद ड्रोन बनाना.

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ईरान की नूर मिसाइल लॉन्च होते हुए. चीन मिसाइलों के लिए कंपोनेंट देता है. (Photo: AFP)
ईरान की नूर मिसाइल लॉन्च होते हुए. चीन मिसाइलों के लिए कंपोनेंट देता है. (Photo: AFP)

ईरान दुनिया के उन देशों में से एक है जो खुद बहुत सारे हथियार बनाता है लेकिन फिर भी कुछ खास तरह के आधुनिक हथियारों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहता है. चीन और रूस ईरान के सबसे बड़े दोस्त माने जाते हैं. इन दोनों देशों के साथ ईरान का हथियारों का रिश्ता कई सालों से बहुत मजबूत चल रहा है। 

यह रिश्ता सिर्फ हथियार बेचने-खरीदने तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें तकनीक साझा करना, एक-दूसरे को मदद करना और संयुक्त उत्पादन भी शामिल है. रूस ईरान को सीधे हवाई जहाज और एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइल देता है जबकि चीन ज्यादातर पार्ट्स और केमिकल्स की सप्लाई करता है. 

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यह सब अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ईरान को मजबूत बनाने में मदद करता है. दोनों देश ईरान के साथ रणनीतिक साझेदारी करते हैं ताकि पश्चिमी देशों का दबाव कम हो सके.

China Russia Iran Weapons

रूस और ईरान के हथियार संबंध कितने गहरे हैं?

रूस और ईरान के बीच हथियारों का संबंध बहुत पुराना है लेकिन 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यह और मजबूत हो गया. ईरान ने रूस को हजारों शाहेद-136 ड्रोन दिए जो रूस अब खुद बनाता है. उन्हें गेरान-2 नाम से बनाता है. बदले में रूस ईरान को आधुनिक हथियार दे रहा है. 

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2025 में दोनों देशों ने 20 साल की रणनीतिक साझेदारी की संधि साइन की जिसमें हथियारों की खरीद-बिक्री और तकनीकी मदद शामिल है. हाल ही में दिसंबर 2025 में रूस ने ईरान को 500 वेरबा मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम और 2500 मिसाइलें देने का सीक्रेट डील साइन किया जिसकी कीमत लगभग 500 मिलियन यूरो है.

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ये डिलीवरी 2027 से 2029 तक होंगी लेकिन कुछ पहले भी पहुंच चुकी हैं. इसके अलावा रूस ईरान को Su-35 फाइटर जेट्स (48 की डील), MI-28 हेलीकॉप्टर और YAK-130 ट्रेनर एयरक्राफ्ट भी दे रहा है.  

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चीन ईरान को हथियार कैसे सप्लाई करता है और क्यों?

चीन ईरान को सीधे हथियार बेचना 2005 के बाद बंद कर चुका है लेकिन फिर भी दोनों के बीच गहरा संबंध है. चीन ज्यादातर डुअल-यूज सामान देता है यानी जो चीजें आम जीवन में भी इस्तेमाल होती हैं लेकिन हथियार बनाने में भी काम आती हैं. उदाहरण के लिए चीन ने ईरान को हजारों टन सोडियम परक्लोरेट भेजा जो बैलिस्टिक मिसाइल बनाने के लिए जरूरी है. इससे ईरान सैकड़ों मिसाइलें बना सकता है. 

अभी चीन और ईरान सीएम-302 सुपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल की डील पर बातचीत कर रहे हैं जो बहुत तेज और खतरनाक है. चीन ईरान को ड्रोन के इंजन, रडार और इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स भी देता है. चीन ईरान से सस्ते तेल खरीदता है. बदले में ये तकनीकी मदद देता है. दोनों देश हर साल संयुक्त नौसेना अभ्यास भी करते हैं जिसमें रूस भी शामिल होता है. चीन का मकसद है कि अमेरिका के दबाव के बावजूद ईरान मजबूत रहे और मध्य पूर्व में चीन का प्रभाव बढ़े.

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ईरान को चीन और रूस से कितने प्रकार के हथियार सीधे मिलते हैं?

ईरान को रूस से मुख्य रूप से 5-6 प्रकार के बड़े हथियार सीधे मिलते हैं. इनमें Su-35 फाइटर जेट्स, वेरबा शोल्डर फायर एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल, S-300 एयर डिफेंस सिस्टम, MI-28 अटैक हेलीकॉप्टर और याक-130 ट्रेनर शामिल हैं. रूस ने पहले भी ईरान को मिसाइल और सेंसर दिए हैं. 

चीन से सीधे हथियार कम मिलता है लेकिन फिर भी CM-302 एंटी-शिप मिसाइल की डील लगभग फाइनल हो चुकी है. कुछ छोटे अटैक ड्रोन या लॉइटरिंग मुनिशन की सप्लाई रिपोर्ट हुई है. चीन से सबसे ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन बनाने के पार्ट्स और केमिकल्स आते हैं. 

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कुल मिलाकर रूस से 6-7 तरह के तैयार हथियार और चीन से 3-4 तरह के कंपोनेंट्स और मिसाइलें सीधे आती हैं. ईरान खुद भी मिसाइल और ड्रोन बनाता है लेकिन आधुनिक फाइटर जेट और एयर डिफेंस के लिए इन दोनों देशों पर निर्भर है.

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क्या चीन-रूस और ईरान के साथ जॉइंट प्रोडक्शन भी होता है?

जॉइंट प्रोडक्शन का सबसे बड़ा उदाहरण रूस और ईरान के बीच है. ईरान ने रूस को शाहेद ड्रोन की टेक्नोलॉजी दी. अब रूस तातारस्तान में फैक्ट्री लगाकर खुद ये ड्रोन बनाता है. इससे दोनों देशों को फायदा हो रहा है. ईरान को रूस से नई टेक्नोलॉजी मिल रही है. रूस को सस्ते ड्रोन मिल रहे हैं. 

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चीन के साथ जॉइंट प्रोडक्शन कम है लेकिन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर ज्यादा होता है. चीन ईरान को मिसाइल बनाने के पार्ट्स देता है. ईरान उन्हें इस्तेमाल करके अपनी मिसाइलें बनाता है. दोनों देश मिलकर कुछ रडार और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर काम कर रहे हैं.

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कुल मिलाकर चीन-रूस-ईरान तीनों के बीच हथियारों की तकनीक साझा करने और कुछ प्रोडक्शन में सहयोग बढ़ रहा है. यह सब अमेरिका के सैंक्शन के बावजूद चल रहा है ताकि ईरान की सेना मजबूत बनी रहे.

इस रिश्ते का भविष्य क्या है?

चीन और रूस के साथ ईरान का हथियार संबंध भविष्य में और मजबूत होने वाला है क्योंकि तीनों देश अमेरिका के खिलाफ एक साथ खड़े हैं. रूस ईरान को और ज्यादा फाइटर जेट और एयर डिफेंस दे सकता है जबकि चीन मिसाइल और ड्रोन पार्ट्स की सप्लाई बढ़ा सकता है. लेकिन सैंक्शन की वजह से सब कुछ सीक्रेट तरीके से होता है. यह रिश्ता न सिर्फ ईरान को मजबूत बनाता है बल्कि पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा को प्रभावित करता है.

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