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भारत ने फ्रांस को भेजा 114 राफेल लड़ाकू विमानों का 'लेटर ऑफ रिक्वेस्ट'

भारतीय वायु सेना के लिए फ्रांस से करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये में 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की प्रक्रिया शुरू हो गई है. मेक इन इंडिया के तहत करीब 90 विमान भारत में ही बनेंगे.

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भारतीय वायुसेना को राफेल विमानों की जरूरत है. ऑपरेशन सिंदूर में भी इस जेट ने पाकिस्तान को धूल चटाई थी. (File Photo: AFP)
भारतीय वायुसेना को राफेल विमानों की जरूरत है. ऑपरेशन सिंदूर में भी इस जेट ने पाकिस्तान को धूल चटाई थी. (File Photo: AFP)

भारतीय वायु सेना (IAF) की क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है. भारत सरकार ने भारतीय वायु सेना के लिए 114 डसॉल्ट राफेल (Dassault Rafale) मल्टी-रोल फाइटर जेट्स की खरीद के लिए 'लेटर ऑफ रिक्वेस्ट' (LoR) को औपचारिक रूप से अंतिम रूप दे दिया है. करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाला यह सौदा भारत के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा लड़ाकू विमान रक्षा समझौता होने जा रहा है.

'लेटर ऑफ रिक्वेस्ट' (LoR) एक आधिकारिक सरकारी दस्तावेज (G-to-G) होता है, जिसके जरिए अंतर-सरकारी समझौते (IGA) के तहत बड़े रक्षा सौदों की प्रक्रिया शुरू की जाती है. इस आधिकारिक अनुरोध पत्र को आने वाले कुछ हफ्तों में औपचारिक रूप से फ्रांस सरकार को भेज दिया जाएगा.

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मेक इन इंडिया के तहत भारत में बनेंगे 90 राफेल विमान

इस मेगा डिफेंस डील की सबसे बड़ी खासियत इसका स्वदेशीकरण है. प्रस्तावित समझौते के अनुसार, कुल 114 विमानों में से लगभग 90 जेट विमानों का निर्माण मेक इन इंडिया पहल के तहत भारत में ही किया जाएगा. इसके लिए फ्रांसीसी एयरोस्पेस कंपनी डसॉल्ट एविएशन एक भारतीय निजी या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के साथ साझेदारी करेगी.

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India France Rafale deal 114 jets

भारत में बनने वाले विमानों की सटीक संख्या 92 हो सकती है, जबकि बाकी बचे 22 विमान फ्रांस से सीधे 'फ्लाई-अवे' (पूरी तरह से तैयार) स्थिति में भारत लाए जाएंगे. इस सौदे के तहत तैयार होने वाले विमानों में स्वदेशी पुर्जों और तकनीक की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी होने की उम्मीद है. इस सौदे का मुख्य उद्देश्य वायुसेना के घटते स्क्वाड्रन (squadron) की संख्या को संभालना और देश की हवाई सुरक्षा को अभेद्य बनाना है.

वायुसेना प्रमुख का फ्रांस दौरा: प्रक्रिया को मिलेगी रफ्तार

यह महत्वपूर्ण घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब भारतीय वायु सेना के प्रमुख, एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह 1 जून से फ्रांस के तीन दिवसीय आधिकारिक दौरे पर हैं. भारत द्वारा 114 राफेल विमानों की खरीद प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के बीच वायुसेना प्रमुख का यह दौरा बेहद रणनीतिक माना जा रहा है.

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अपने इस दौरे के दौरान एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह फ्रांस की प्रमुख रक्षा कंपनियों के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात करेंगे. इनमें राफेल विमान बनाने वाली कंपनी 'डसॉल्ट एविएशन' और खतरनाक मिसाइल प्रणालियों का निर्माण करने वाली कंपनी 'एमबीडीए' (MBDA) शामिल हैं. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि वायु सेना प्रमुख के इस दौरे से राफेल अधिग्रहण की इस लंबी प्रक्रिया को तेजी मिलेगी.

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डील की आगे की प्रक्रिया: कैसे बढ़ेगी बात?

भारत द्वारा 'लेटर ऑफ रिक्वेस्ट' (LoR) भेजे जाने के बाद जब फ्रांस सरकार इस पर अपनी प्रतिक्रिया देगी, तब भारत इस सौदे के लिए औपचारिक 'रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल' (RFP) जारी करने की दिशा में आगे बढ़ेगा.

  • रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) की मंजूरी: रक्षा मंत्रालय की सर्वोच्च संस्था, डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) ने वायुसेना के लिए इन राफेल विमानों की खरीद को पहले ही अपनी मंजूरी दे दी है.
  • मूल्य और लॉजिस्टिक्स पर बातचीत: फ्रांस सरकार जब भारत के LoR का जवाब देगी- जिसमें विमानों की कीमत, उपलब्धता की समय-सीमा और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट (रखरखाव सहायता) का ब्योरा होगा- तब दोनों देशों के बीच अंतिम कीमत को लेकर बातचीत शुरू होगी.
  • CCS की अंतिम मुहर: दोनों देशों के बीच बातचीत पूरी होने के बाद, इस अंतिम अनुबंध (Contract) पर हस्ताक्षर होने से पहले प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली 'कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी' (CCS) से अंतिम मंजूरी लेना अनिवार्य होगा.

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वायु सेना के लिए क्यों जरूरी है यह सौदा?

वर्तमान में भारतीय वायु सेना अपने फाइटर स्क्वाड्रनों की घटती संख्या से जूझ रही है. स्वीकृत नियमों के अनुसार, दो मोर्चों (चीन और पाकिस्तान) पर एक साथ सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए वायुसेना के पास कम से कम 42 लड़ाकू स्क्वाड्रन होने चाहिए, लेकिन वर्तमान में यह संख्या घटकर काफी कम हो गई है.

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राफेल विमान अपनी अत्याधुनिक रडार प्रणाली, लंबी दूरी की मिसाइलों (जैसे मिटियोर और स्कैल्प) और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमताओं के लिए दुनिया भर में मशहूर हैं. वायु सेना में इन 114 नए राफेल विमानों के शामिल होने से न केवल भारत की सीमाओं पर निगरानी क्षमता मजबूत होगी, बल्कि चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के मुकाबले भारतीय वायु सेना को रणनीतिक बढ़त भी हासिल होगी.
 

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