साल 2024 में लेबनान में हेजबुल्लाह के लोगों के पेजर और वॉकी-टॉकी अचानक फट गए थे. बहुत लोग मारे गए और घायल हुए. पता चला कि दुश्मन ने उन उपकरणों में पहले से ही खतरा छिपा रखा था. इस घटना ने सबको चौंका दिया. अगर बातचीत के सामान में ही धोखा हो सकता है तो फौज कैसे सुरक्षित रहेगी.
इसी बात को ध्यान में रखकर भारत की IDR नाम की कंपनी ने अपना खुद का नया सिस्टम बना लिया है. अब भारतीय जवान मोबाइल टावर या किसी बाहर के नेटवर्क के बिना भी आपस में बात कर सकते हैं. यह सिस्टम बहुत सरल तरीके से काम करता है. हर मशीन एक छोटी सी कड़ी की तरह जुड़ी रहती है.
अगर एक मशीन खराब हो जाए या दुश्मन उसे रोक दे तो दूसरी मशीनों के जरिए संदेश अपने आप आगे बढ़ जाता है. इसे मेश नेटवर्क कहते हैं. मतलब जाल की तरह कई रास्ते बने रहते हैं. साथ में बातचीत को कोड में बदल दिया जाता है ताकि दुश्मन सुन भी ले तो समझ न सके. कंपनी का कहना है कि यह करीब सात किलोमीटर तक चल सकता है. पहाड़ों में, जंगलों में या जहां मोबाइल का सिग्नल नहीं मिलता वहां भी जवान एक-दूसरे से बात कर सकते हैं.
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फौज के लिए क्यों जरूरी है
लड़ाई के मैदान में सबसे बड़ी जरूरत है कि अपने लोगों से बातचीत बनी रहे. अगर संपर्क टूट जाए तो आदेश नहीं पहुंचते और नुकसान हो सकता है. पुराने सिस्टम में मोबाइल टावर पर निर्भर रहना पड़ता था. दुश्मन टावर को नष्ट कर दे या सिग्नल जाम कर दे तो सब थम जाता है.
After The Hezbollah Pager Blasts, India Develops Its Own Secure Battlefield Network. 🇮🇳 IDR Research & Development Pvt Ltd has developed a decentralised tactical communication system that works without relying on public cellular networks. The system uses encrypted communication and a mesh network, allowing devices to stay connected through multiple nodes instead of depending on a single link. It has a stated range of up to 7 km and is designed for secure battlefield communication where conventional networks may not be available. The 2024 pager attacks exposed how communication equipment can become a major vulnerability when its supply chain is compromised. India is now building its own alternative. 🇮🇳
— Military Observer (@TheMilObserverr) October 4, 2026
नया सिस्टम बिना टावर के चलता है और पूरी तरह भारतीय है. इसमें कोई विदेशी हिस्सा नहीं है इसलिए पेजर वाली गलती नहीं हो सकती. सीमा पर तैनात जवान, जंगलों में काम करने वाली टीम या बाढ़ जैसे हालात में राहत पहुंचाने वाले लोग भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं.
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भारत अब अपने हथियार और सामान खुद बनाने पर जोर दे रहा है. यह सिस्टम उसी सोच का हिस्सा है. अभी इसकी दूरी सात किलोमीटर है. आगे इसे और दूर तक चलने लायक बनाया जा सकता है. बैटरी भी ज्यादा देर तक चले तो और अच्छा रहेगा.
अगर सेना इसे अपना लेती है तो जवानों को ज्यादा सुरक्षित महसूस होगा. दुश्मन की नजर से बचकर बातचीत करना आसान हो जाएगा. छोटी सी घटना से बड़ा सबक लेकर भारत ने अपना रास्ता बना लिया है. अब फौज की बातचीत ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद हो सकती है.