अमेरिका और इजरायल UAE के साथ अपने सैन्य संबंध काफी मजबूत कर चुके हैं. संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई ने इजरायल के एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य कर्मियों को अपने यहां तैनात किया हुआ है. बाराकाह न्यूक्लियर प्लांट पर ड्रोन हमले के बाद यूएई की सुरक्षा बढ़ाने के लिए US-इजरायल और अधिक हथियार तथा सहायता पहुंचा रहे हैं.
यूएई इजरायल का करीबी सहयोगी बन चुका है, खासकर ईरान के खिलाफ. दोनों देश मिलकर यूएई की सुरक्षा मजबूत करने में लगे हैं, जिससे ईरान नाराज है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को साफ चेतावनी दी है. उन्होंने कहा कि ईरान के लिए समय सही नहीं है, उन्हें तेजी से आगे बढ़ना चाहिए, वरना उनमें कुछ नहीं बचेगा.
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ट्रंप ने शनिवार को वर्जीनिया गोल्फ क्लब में अपने राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के साथ अहम बैठक की. इस बैठक में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विदेश मंत्री मार्को रुबियो, CIA प्रमुख जॉन रैटक्लिफ और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ शामिल थे. पेंटागन पहले से ही ईरान के ऊर्जा केंद्रों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने के स्ट्राइक प्लान तैयार रखा है. ये प्लान अब फैसले का इंतजार कर रहे हैं.

जंग कब शुरू होगी?
फिलहाल कोई निश्चित तारीख नहीं बताई गई है. ट्रंप ने कहा है कि समय बहुत महत्वपूर्ण है. वे अभी कूटनीतिक रास्ता पसंद करते हैं, लेकिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने और तेल की कीमतों पर दबाव के कारण उनका धैर्य कम होता जा रहा है. इस हफ्ते फिर से सुरक्षा टीम के साथ बैठक होने वाली है.
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से ट्रंप की बातचीत भी हो चुकी है. दोनों देश मिलकर ईरान पर दबाव बढ़ा रहे हैं. अगर कूटनीति असफल रही तो बड़े हमलों की संभावना बढ़ जाएगी.
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क्या ईरान इस बार हमला करने की स्थिति में है?
ईरान अभी हमले के बजाय बचाव की मुद्रा में दिख रहा है. उसके पास मिसाइलें और ड्रोन हैं, लेकिन पिछले युद्ध में उसकी काफी क्षमता कम हो चुकी है. ईरान पाकिस्तान जैसे देशों के जरिए कूटनीति चला रहा है. इलाके के इस्लामिक देशों से अच्छे संबंध बनाने की बात कर रहा है.
ईरानी मीडिया पर लोग हथियार लेकर युद्ध की तैयारी दिखा रहे हैं, लेकिन वास्तविक सैन्य क्षमता अमेरिका-इजरायल के मुकाबले काफी कमजोर मानी जा रही है. ईरान सीधा बड़ा हमला करने की बजाय प्रॉक्सी ग्रुप्स - हिज्बुल्लाह और हूती के जरिए जवाब देने की कोशिश कर रहा है.

क्या अमेरिका और इजरायल ईरान पर कब्जा कर लेंगे?
फिलहाल कब्जे की कोई बात नहीं है. ट्रंप का मकसद ईरान को मजबूर करके समझौता करवाना है, न कि पूरे देश पर कब्जा करना. अमेरिका और इजरायल ईरान के परमाणु कार्यक्रम, ऊर्जा केंद्रों और सैन्य ठिकानों पर लक्षित हमले करना चाहते हैं. पूर्ण कब्जा बहुत बड़ा और महंगा सैन्य अभियान होगा, जिसके अभी कोई संकेत नहीं है. दोनों देश ईरान को कमजोर करके क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की खाड़ी बंद होने से दुनिया भर में तेल संकट गहरा रहा है. यूएई पर हालिया हमले ने स्थिति और बिगाड़ दी है. इजरायल और अमेरिका मिलकर यूएई की रक्षा कर रहे हैं, जबकि ईरान इसे अपना घेराव मान रहा है. ट्रंप की टीम चीन यात्रा के बाद अब ईरान पर फोकस कर रही है.
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वर्तमान में अमेरिका-इजरायल UAE के साथ मिलकर ईरान पर दबाव बना रहे हैं. नई जंग की तैयारी चल रही है, लेकिन शुरू होने का समय ट्रंप के फैसले पर निर्भर है. ईरान हमला करने की पूरी स्थिति में नहीं दिख रहा, जबकि अमेरिका-इजरायल टारगेटेड हमलों के जरिए ईरान को घुटनों पर लाना चाहते हैं.