घर केवल रहने की जगह नहीं होते. वे यह भी बताते हैं कि हम जीवन को किस तरह जीने की कल्पना करते हैं. सीनियर लिविंग इसका एक अच्छा उदाहरण है. लंबे समय तक हमने रिटायरमेंट को लगभग जगह बदलने से जोड़कर देखा. शहर छोड़िए... किसी शांत और सुविधाजनक समाज में जाइए और जीवन के इस पड़ाव को देखभाल और सुकून के साथ बिताइए. लेकिन अब यह सोच धीरे-धीरे बदल रही है.
आज कई वरिष्ठ नागरिक कुछ अलग चाहते हैं, वे आत्मनिर्भर रहना चाहते हैं, लेकिन साथ ही उस जीवन से भी जुड़े रहना चाहते हैं, जिसे उन्होंने वर्षों में बनाया है. उनके डॉक्टर, दोस्त, परिचित पड़ोस, सामाजिक दायरा और अक्सर उनके बच्चे भी उसी शहर में या उससे जुड़े हुए हैं. इसलिए सीनियर लिविंग के सामने अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि लोग रिटायर होने के बाद कहां रहें? असली सवाल यह है कि हम उन्हें बेहतर तरीके से उम्र बढ़ाने की सुविधा कैसे दें, बिना उनसे उनका शहर और उनका बनाया हुआ जीवन पीछे छोड़ने को कहे?
बेसिक होम लोन के को-फाउंडर और सीईओ अतुल मोंगा का कहना है कि सीनियर लिविंग का अगला बड़ा अवसर यहीं है. भविष्य केवल नए रिटायरमेंट डेस्टिनेशन बनाने में नहीं, बल्कि ऐसे शहरी समुदाय विकसित करने में है जो वरिष्ठ नागरिकों को आत्मनिर्भरता दें और साथ ही उन्हें शहर, अपने लोगों और अपने सामाजिक जीवन से जोड़े रखें.
शहर अभी भी घर है...
रिटायरमेंट का मतलब यह जरूरी नहीं कि व्यक्ति शहरी जीवन से दूर हो जाए. कई वरिष्ठ नागरिकों के लिए शहर में बने रहना स्वास्थ्य सेवाओं, परिवार, दोस्तों, परिचित माहौल और उन रोजमर्रा की गतिविधियों से जुड़े रहने का माध्यम है, जिन्होंने दशकों से उनके जीवन को एक पहचान और संरचना दी है.
बदलते पारिवारिक ढांचे के बीच यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है. संयुक्त परिवारों की जगह न्यूक्लियर परिवार बढ़ रहे हैं और बच्चे काम और बेहतर अवसरों के लिए दूसरे शहरों या देशों में जा रहे हैं.
ऐसे में सीनियर लिविंग एक बीच का रास्ता दे सकता है, व्यक्ति को एक ऐसे घर और समुदाय की स्वतंत्रता मिल सकती है, जो उसकी जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया हो. लेकिन वह उन लोगों और जगहों से भी जुड़ा रह सकता है जो उसके लिए मायने रखते हैं. इसलिए मुझे लगता है कि सीनियर लिविंग का अगला चरण अलग-थलग रिटायरमेंट डेस्टिनेशन बनाने से आगे बढ़कर शहरी समुदायों के निर्माण का होगा.
रिटायरमेंट डेस्टिनेशन से अर्बन कम्युनिटी तक
पारंपरिक मॉडल में अलगाव पर अधिक जोर था, रिटायरमेंट कम्युनिटी को अक्सर ऐसे एक स्वतंत्र परिसर के रूप में देखा जाता था, जहां वरिष्ठ नागरिक शहर की भागदौड़ से दूर एक साथ रह सकें. लेकिन अब एक अधिक जुड़ा हुआ मॉडल उभर रहा है. भारत के बड़े शहरों में विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं, परिवार और वर्षों में बने सामाजिक नेटवर्क के करीब रहना जीवन की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है.
इसलिए सीनियर लिविंग को सिर्फ अपने परिसर के भीतर नहीं, बल्कि उसके आसपास मौजूद पूरे शहरी परिवेश के संदर्भ में भी सोचना होगा. इससे योजना और डिजाइन की सोच भी बदलती है. इमारत और आसपास का वातावरण ऐसा होना चाहिए, जिसमें आसानी से आना-जाना संभव हो. कॉमन स्पेस लोगों को एक-दूसरे से मिलने-जुलने का अवसर दें. लेकिन उनकी निजता भी बनी रहे. स्वास्थ्य सेवाओं, मोबिलिटी और रोजमर्रा की जरूरतों को शुरुआत से ही डिजाइन का हिस्सा बनाना होगा. उद्देश्य शहर को एक सीनियर लिविंग प्रोजेक्ट के भीतर दोबारा बनाने का नहीं है. उद्देश्य ऐसा समुदाय तैयार करना है, जहा रहने वाले लोग शहर का हिस्सा बने रह सकें.
एक और महत्वपूर्ण बदलाव सीनियर लिविंग में दिखाई दे रहा है. यह क्षेत्र अब केवल देखभाल या सहायता तक सीमित नहीं रह गया है. JLL-ASLI की ‘Elevating the Golden Years’ रिपोर्ट के अनुसार भारत में मौजूदा सीनियर लिविंग इन्वेंटरी का लगभग 85% हिस्सा इंडिपेंडेंट लिविंग का है. यह आंकड़ा बताता है कि लोग क्या चाहते हैं. बहुत से वरिष्ठ नागरिक किसी संस्थागत या अस्पताल जैसे माहौल में रहना नहीं चाहते. वे ऐसा घर चाहते हैं जहां वे सक्रिय और आत्मनिर्भर जीवन जी सकें और जरूरत पड़ने पर सहायता उपलब्ध हो.
बदलती जनसांख्यिकी इस जरूरत को और महत्वपूर्ण बना रही है. UNFPA India की ‘India Ageing Report 2023’ के अनुसार भारत की 60 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी का हिस्सा 2022 में 10.5% से बढ़कर 2050 तक 20.8% होने का अनुमान है. इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि भारत को भविष्य में कितने और सीनियर लिविंग घरों की जरूरत होगी. असली सवाल यह है कि उम्र बढ़ने के साथ लोग किस तरह के घर और किस तरह का जीवन चाहते होंगे.
जरूरत और अवसर के बीच का अंतर
जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन संगठित सीनियर लिविंग की उपलब्धता अभी भी सीमित है. JLL के अनुसार भारत में संगठित सीनियर लिविंग की पैठ केवल 1.3% है, जबकि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में यह 6% से अधिक है. JLL का अनुमान है कि 2030 तक संभावित टार्गेट मार्केट 2.27 मिलियन परिवारों तक पहुंच सकता है, जो 2024 में 1.57 मिलियन परिवारों का था.
ये आंकड़े रियल एस्टेट क्षेत्र के सामने एक बड़ा अवसर दिखाते हैं. लेकिन यह अवसर केवल अधिक रिटायरमेंट कम्युनिटीज बनाने का नहीं है. यह ऐसे देश के लिए शहरी आवास की पूरी सोच को नए सिरे से देखने का अवसर है, जहां लोग पहले से अधिक लंबा जीवन जी रहे हैं.
इसका मतलब शहरों के भीतर समर्पित सीनियर लिविंग कम्युनिटीज हो सकता है. ऐसे आवासीय प्रोजेक्ट हो सकते हैं, जो अलग-अलग उम्र के लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किए जाएं. सीनियर लिविंग का भविष्य शायद शहर से दूर जाने में नहीं, बल्कि शहर को उम्रदराज़ होती आबादी के लिए बेहतर बनाने में है.