अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चली आ रही जंग आखिरकार अब खत्म हो गई. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने बुधवार को MoU पर साइन कर दिए हैं. इसके दुनिया की कुल तेल जरूरत का 20 फीसदी पूरा करने के लिए जरूरी होर्मुज स्ट्रेट भी खुल गया है. अमेरिकी नाकाबंदी हट चुकी है और तेल-गैस के जहाजों का आना-जाना शुरू हो गया है.
US-Iran Peace Deal की सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर देखने को मिला है. ये 80 डॉलर के नीचे कारोबार करती हुई नजर आ रही हैं. तेल की कीमतों में ये गिरावट भारत के लिए कई मायनों में फायदेमंद है और आम आदमी से लेकर भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) तक को इससे फायदा होगा. आइए जानते हैं कैसे?
गिरते हुए यहां पहुंची क्रूड की कीमत
सबसे पहले नजर डाल लेते हैं इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों के अपडेट पर, तो अमेरिका और ईरान में डील डन होने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड का अगस्त के लिए वायदा भाव (Brent Crude Oil Price) गुरुवार को 1.13% की गिरावट के साथ फिसलकर 78.65 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया.
इसके अलावा अमेरिकी पश्चिम टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI Crude Oil Price) के जुलाई वायदा भाव में 2.20% की गिरावट देखने को मिली और ये अब गिरकर 75 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है. इसके अलावा मर्बन क्रूड प्राइस हल्की बढ़ोतरी के साथ ट्रेड करता हुआ नजर आया, लेकिन इसके बावजूद इसकी कीमत 75 डॉलर प्रति बैरल के नीचे बनी हुई है.

तेल क्रैश के भारत को ये बड़े फायदे
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों गिरावट खासतौर पर उन देशों के लिए बड़े फायदे की वजह बनती है, जो क्रूड ऑयल के आयात पर ज्यादा निर्भर होते हैं. भारत भी इनमें शामिल हैं और देश अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में Crude Oil Price Crash भारत को कई स्तरों पर फायदा पहुंचा सकता है.
पहला फायदा: Petrol-Diesel होगा सस्ता!
मिडिल ईस्ट तनाव और होर्मुज स्ट्रेट बंद होने की वजह से दुनिया ने तेल-गैस का भारी संकट झेला है. पाकिस्तान, बांग्लादेश, साउथ कोरिया से लेकर भारत, ब्रिटेन और अमेरिका तक में ईंधन की कीमतों में तगड़ा इजाफा देखने को मिला. भारत में 10 दिन के भीतर ही Petrol-Diesel Price Hike का सिलसिला जारी रखते हुए तेल कंपनियों ने इनकी कीमतों में 7 रुपये प्रति लीटर के आसपास की बढ़ोतरी की थी.
पेट्रोल-डीजल की कीमतों के निर्धारण में अन्य कारकों के साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का अहम रोल होता है. एक्सपर्ट्स की मानें, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में 1 डॉलर तेल महंगा होता है, तो देश में फ्यूल प्राइस 50-60 पैसे प्रति लीटर की संभावना होती है. अब जबकि US-Iran में शांति समझौते पर साइन हो गए हैं और क्रूड की कीमतों में तगड़ी गिरावट आई है, तो खर्च घटने के चलते तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कटौती कर सकती हैं, जो आम लोगों के बड़ी राहत होगी.

दूसरा फायदा: महंगाई पर लगेगी लगाम
Petrol-Diesel Price और महंगाई का सीधा कनेक्शन हैं. दरअसल, खासतौर पर डीजल की कीमतें बढ़ने पर परिवहन लागत बढ़ जाती है और सब्जियों समेत अन्य रोजमर्रा की चीजों के ट्रांसपोर्टेशन का खर्च बढ़ता है, जिसका अंतत: बोझ आम ग्राहकों पर डाल दिया जाता है, यानी ये महंगी हो जाती हैं.
Hormuz Strait फिर से ओपन होने से पेट्रोल, डीजल और गैस सस्ती हो रही है और इसकी सप्लाई भी जल्द सुचारू होने की उम्मीद है. कीमतें गिरने से माल ढुलाई की लागत कम होती है और खाद्य पदार्थ, उपभोक्ता वस्तुएं और औद्योगिक उत्पादों की कीमतों पर दबाव घटता है. RBI भी कहता है कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट खुदरा महंगाई को नियंत्रित करने में मदद करती है.
तीसरा फायदा: आयात बिल में आएगी कमी
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का तीसरा अर भारत के आयात बिल में कमी के तौर पर देखने को मिलेगा. दरअसल, भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है और अपनी जरूरत का 85 फीसदी के आसपास इंपोर्ट करता है. महंगा कच्चा तेल होने पर खरीद के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने होते हैं, जबकि तेल सस्ता होता है, तो फिर कम खर्च होता है.
रिपोर्ट्स की मानें, तो भारत वित्त वर्ष 2025-26 में प्रतिदिन लगभग 50 लाख बैरल (5 मिलियन बैरल) तेल आयात कर रहा है. एक अनुमान के मुताबिक, कच्चे तेल के दाम में 10 डॉलर प्रति बैरल की गिरावट से भारत का वार्षिक आयात बिल करीब 13-15 अरब डॉलर (1.1-1.3 लाख करोड़ रुपये) तक कम हो सकता है.

चौथा फायदा: चालू खाता घाटा में कमी, रुपया मजबूत
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट इंडियन करेंसी के लिए भी फायदेमंद ही, जो बीते कुछ समय में लगातार टूटते हुए 95 के स्तर को पार कर गई थी. हालांकि, तेल की कीमतें घटने से Indian Rupee पर दबाव कम हुआ है.
दूसरी ओर कच्चे तेल का टूटना भारत के चालू खाता घाटे में कमी की वजह बनता है, जो बेहद राहत भरी बात है. आरबीआई के एक अनुमान के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल प्राइस अगर 10 डॉलर प्रति बैरल फिसलता है, तो फिर देश का चालू खाता घाटा यानी CAD लगभग 0.3-0.4 फीसदी GDP तक कम हो सकता है.
पांचवां फायदा: शेयर बाजार को मिलेगा सपोर्ट
कच्चे तेल का घटना महंगाई के जोखिम को कम करने वाला साबित होता है. इसके अलावा जरूरी चीजों के आयात पर होने वाले खर्च को भी कम करता है. ये सारे कारक मिलकर शेयर बाजार को सपोर्ट करते हैं. एविएशन, पेंट, टायर, सीमेंट, लॉजिस्टिक्स और केमिकल कंपनियों की लागत घटती है, इनका मुनाफा बढ़ता है, जिसका असर शेयर बाजार में तेजी के रूप में दिखता है.