इंश्योरेंस पॉलिसी लेते समय ग्राहक के लिए सबसे बड़ा सवाल आमतौर पर यही होता है कि उसे कितने प्रीमियम में कितना कवर मिल रहा है. लेकिन इस कीमत के पीछे सिर्फ बीमा का जोखिम नहीं होता, बल्कि पॉलिसी बेचने, कमीशन देने और उसे सर्विस करने की भी लागत शामिल होती है. अब भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने इसी लागत को लेकर बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कंपनियों और डिस्ट्रीब्यूटर्स का खर्च घटा, तो क्या इसका फायदा सीधे आपकी जेब तक पहुंचेगा?
कमीशन घटेगा तो प्रीमियम भी घटेगा?
IRDAI के कंसल्टेशन पेपर में इंश्योरेंस कंपनियों के खर्च और डिस्ट्रीब्यूशन कमीशन पर सख्त सीमाएं तय करने का प्रस्ताव है. रेगुलेटर का कहना है कि इंश्योरेंस की लागत में एक बड़ा हिस्सा पॉलिसी हासिल करने और उसे ग्राहकों तक पहुंचाने में खर्च होता है. ज्यादा कमीशन और डिस्ट्रीब्यूशन की कई परतें बीमा की कुल लागत बढ़ा सकती हैं.
लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है. कमीशन घटने का मतलब यह नहीं है कि प्रीमियम भी उसी अनुपात में तुरंत घट जाएगा. एक्सपर्ट्स के मुताबिक कंपनियां बची हुई रकम का इस्तेमाल टेक्नोलॉजी, क्लेम प्रोसेसिंग, अंडरराइटिंग और कस्टमर सर्विस जैसी दूसरी जरूरतों में कर सकती हैं.
लाइफ इंश्योरेंस में EoM लिमिट कितनी?
IRDAI ने लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों के लिए एक्सपेंस ऑफ मैनेजमेंट (EoM) की सीमा को कंपनी के स्तर पर ग्रॉस डायरेक्ट प्रीमियम इनकम (GDPI) से जोड़ने का प्रस्ताव दिया है. प्रस्ताव के मुताबिक यह सीमा दो साल में 15 फीसदी और पांच साल में 12.5 फीसदी तक लाई जा सकती है. वहीं, कुछ ऐसी लाइफ इंश्योरेंस कंपनियां जो प्रस्तावित सीमा से पहले ही नीचे हैं, उनके लिए पांच साल में 10 फीसदी का लंबी अवधि का लक्ष्य रखा गया है. यानी कंपनियों को अपनी कमाई के मुकाबले इंश्योरेंस चलाने और बेचने पर होने वाले खर्च को धीरे-धीरे कम करना होगा.
जनरल इंश्योरेंस में भी बदलेगा हिसाब
जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के लिए भी EoM का आधार बदलने का प्रस्ताव है. अभी जहां कैलकुलेशन में ग्रॉस रिटेन प्रीमियम (GWP) का इस्तेमाल होता है, उसे Domestic GDPI से जोड़ने की बात कही गई है. प्रस्ताव के तहत EoM लिमिट को पांच साल में 20 फीसदी तक लाने की बात है. दो साल के लिए 25 फीसदी का अंतरिम स्तर प्रस्तावित है. इसके साथ ही अलग-अलग इंश्योरेंस प्रोडक्ट और डिस्ट्रीब्यूशन चैनल के हिसाब से कमीशन की अलग सीमा तय करने का प्रस्ताव है. यानी हर पॉलिसी पर एक जैसा कमीशन नहीं होगा.
तो प्रीमियम कितना सस्ता हो सकता है?
यही वह हिस्सा है जहां ग्राहक को थोड़ा सावधान रहना चाहिए. InsuranceDekho के इंद्रनील चटर्जी के मुताबिक खर्च पर सीमा लगने से प्रीमियम में कमी की गुंजाइश बन सकती है, लेकिन अभी यह तय करना मुश्किल है कि बचत का कितना हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचेगा. इसका असर प्रोडक्ट, पॉलिसी की कीमत, डिस्ट्रीब्यूशन चैनल और ग्राहक के सेगमेंट पर निर्भर करेगा.
Insurance Samadhan की शिल्पा अरोड़ा के मुताबिक कमीशन कम होने से प्रीमियम अपने आप कम नहीं हो जाएगा. नए डिस्ट्रीब्यूशन चैनल तैयार करने में शुरुआती खर्च हो सकता है और उसका फायदा लंबे समय में दिखाई दे सकता है. यानी कागज पर लागत घटने और ग्राहक के प्रीमियम में कमी आने के बीच कई चीजें काम करेंगी.
बची हुई रकम आखिर जाएगी कहां?
CoverSure के सौरभ विजयवर्गीय के मुताबिक कमीशन इंश्योरेंस कंपनियों की कुल लागत का सिर्फ एक हिस्सा है. कंपनियों को टेक्नोलॉजी, पॉलिसी सर्विसिंग, क्लेम प्रोसेसिंग, पारदर्शिता और जरूरी जानकारी उपलब्ध कराने पर भी खर्च करना पड़ता है. इसलिए डिस्ट्रीब्यूशन में बची रकम का इस्तेमाल दूसरी सेवाओं को बेहतर बनाने में किया जा सकता है. इसका असर ग्राहक को तुरंत कम प्रीमियम के रूप में मिले, यह जरूरी नहीं है. इसी तरह इंद्रनील चटर्जी का कहना है कि कंपनियां बचत का कुछ हिस्सा टेक्नोलॉजी, अंडरराइटिंग, क्लेम और कस्टमर सर्विस को मजबूत करने में लगा सकती हैं.
छोटी पॉलिसी लेने वालों पर क्या असर?
यहीं से इस प्रस्ताव का एक दूसरा पहलू सामने आता है. अगर छोटी कीमत वाली पॉलिसियों पर डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए कम कमाई रह जाती है, तो वे ज्यादा कीमत वाली पॉलिसियों पर फोकस कर सकते हैं. इसका असर कम प्रीमियम वाले इंश्योरेंस और छोटे शहरों में वितरण पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.
शिल्पा अरोड़ा के मुताबिक इंश्योरेंस में डिस्ट्रीब्यूशन की भूमिका काफी अहम है, इसलिए कमीशन में बदलाव का असर सिर्फ कंपनियों पर नहीं, बल्कि ग्राहकों तक पॉलिसी पहुंचने के तरीके पर भी पड़ सकता है.
सौरभ विजयवर्गीय के मुताबिक हेल्थ इंश्योरेंस में राइडर्स, ऐड-ऑन्स, एक्सक्लूशन्स और को-पे जैसे कई पहलू होते हैं. इसलिए ग्राहक को पॉलिसी समझाने के लिए डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क की जरूरत बनी रहती है. लाइफ इंश्योरेंस के लंबे और जटिल प्रोडक्ट्स में भी यही बात लागू होती है.
पॉलिसी लेते समय सिर्फ कीमत न देखें
अगर आप पॉलिसी खरीद रहे हैं या रिन्यू कराने वाले हैं, तो सिर्फ यह देखकर फैसला न करें कि प्रीमियम कम हुआ है या नहीं. पॉलिसी की कवरेज, एक्सक्लूशन्स, क्लेम सपोर्ट, सर्विसिंग और रिन्यूअल की शर्तें भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं. इसके अलावा अलग-अलग इंश्योरर्स की कीमत और कवरेज की तुलना करना भी जरूरी है.
इंद्रनील चटर्जी के मुताबिक ग्राहक को कवरेज, एक्सक्लूशन्स, प्राइसिंग, इंश्योरर की पसंद, लोन या दूसरे वित्तीय प्रोडक्ट्स के साथ बंडलिंग और क्लेम सपोर्ट जैसी चीजों पर ध्यान देना चाहिए. यानी अगर भविष्य में प्रीमियम कम होता भी है, तो यह देखना जरूरी होगा कि कम कीमत के साथ कवरेज या सर्विस में कोई बदलाव तो नहीं आया.
कमीशन में पारदर्शिता भी बढ़ सकती है
IRDAI के प्रस्ताव में सिर्फ कमीशन कम करने की बात नहीं है. डिस्ट्रीब्यूटर्स को मिलने वाले कमीशन और उसकी संरचना को ज्यादा स्पष्ट तरीके से बताने की दिशा में भी बदलाव प्रस्तावित हैं. इससे ग्राहक को यह समझने में मदद मिल सकती है कि उसकी पॉलिसी बेचने और सर्विस करने में डिस्ट्रीब्यूशन की लागत कितनी है. रेगुलेटर का व्यापक उद्देश्य इंश्योरेंस की लागत, बिक्री व्यवस्था और ग्राहक सुरक्षा को ज्यादा पारदर्शी बनाना है.
अभी लागू नहीं हुए हैं ये बदलाव
सबसे जरूरी बात यह है कि ये अभी प्रस्ताव हैं, अंतिम नियम नहीं. IRDAI के कंसल्टेशन पेपर पर 25 अक्टूबर 2026 तक टिप्पणियां मांगी गई हैं. इसके बाद सुझावों और प्रतिक्रिया के आधार पर अंतिम नियमों में बदलाव हो सकता है. इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि कमीशन घटते ही आपकी इंश्योरेंस पॉलिसी सस्ती हो जाएगी. असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम नियम क्या होते हैं, इंश्योरेंस कंपनियां अपनी लागत कैसे संभालती हैं और डिस्ट्रीब्यूटर्स अपने बिजनेस मॉडल में कितना बदलाव करते हैं.