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रनवे से आगे, कैसे नोएडा एयरपोर्ट बदल रहा है यूपी की आर्थिक तस्वीर

नोएडा में उड़ानों की शुरुआत निस्संदेह उत्तर प्रदेश के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है, लेकिन इसका असली असर यात्रियों की संख्या से नहीं, बल्कि यहां से होने वाले निर्यात और इसके आस-पास पनपने वाले उद्योगों से मापा जाएगा.

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नोएडा का नया एयरपोर्ट यूपी के आर्थिक भूगोल नए सिरे से परिभाषित करता है (Photo-ITG)
नोएडा का नया एयरपोर्ट यूपी के आर्थिक भूगोल नए सिरे से परिभाषित करता है (Photo-ITG)

लखनऊ से नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर इंडिगो की पहली उड़ान का उतरना एक उत्सव की तरह मनाया गया, जो उत्तर प्रदेश के विमानन इतिहास में एक मील का पत्थर है. हालांकि, जेवर में परिचालन की शुरुआत को केवल भारत के विमानन मानचित्र पर एक और टर्मिनल के जुड़ने के रूप में देखना, असल तस्वीर को नजरअंदाज करने जैसा होगा.

यह एयरपोर्ट सिर्फ एक नया हवाई अड्डा नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत में व्यापार और कमाई के पूरे तरीके को बदल देगा. अब तक सारा दबाव दिल्ली पर था, लेकिन अब दिल्ली की भीड़भाड़ से दूर एक नया केंद्र बन रहा है, जहां सड़क, रेल और हवाई मार्ग सब एक साथ जुड़ेंगे और पूरे इलाके के विकास को रफ्तार देंगे.

हालांकि तात्कालिक ध्यान यात्री यातायात पर है, जिसके पहले चरण में सालाना 1.2 करोड़ होने का अनुमान है, लेकिन इसकी असली कहानी इस हवाई अड्डे की महत्वाकांक्षी कार्गो क्षमता में छिपी है. दशकों से, उत्तर भारत का लॉजिस्टिक्स परिदृश्य राष्ट्रीय राजधानी के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के भारी दबाव से परिभाषित होता रहा है.

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नोएडा का सामान IGI से भेजा जाता है

दिल्ली (IGI) हवाई अड्डे से विदेशों में भेजे जाने वाले कुल सामान का लगभग आधा हिस्सा नोएडा और हरियाणा की फैक्ट्रियों में बनता है. अब सोचिए, सामान बनता नोएडा या हरियाणा में है, लेकिन उसे फ्लाइट पकड़ने के लिए दिल्ली के भारी ट्रैफिक से जूझते हुए जाना पड़ता था. इस चक्कर में समय और पैसा दोनों बर्बाद होते थे, जिससे यहां का सामान अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगा हो जाता था. यह बर्बादी व्यापारियों के लिए एक तरह के छिपे हुए टैक्स जैसी थी.

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (NIA) इस बाधा को पूरी तरह से खत्म करने के लिए तैयार है. खुद को एक पूरी तरह से एकीकृत 'एयरोट्रोपोलिस' के रूप में स्थापित करके, यह एयरपोर्ट सिर्फ एक रनवे का निर्माण नहीं कर रहा है, बल्कि एक मजबूत सप्लाई चेन इकोसिस्टम तैयार कर रहा है. 87 एकड़ में फैला मल्टी-मोडल कार्गो हब इसका एक सटीक उदाहरण है. 18 लाख मीट्रिक टन तक की क्षमता विस्तार की योजना के साथ, इस हब को फार्मास्यूटिकल्स , फूलों की खेती और जल्दी खराब होने वाले सामानों जैसे उच्च-मूल्य वाले और समय के पाबंद निर्यातों की विशिष्ट जरूरतों को पूरा करने के लिए डिजाइन किया गया है.

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फैक्ट्री के फर्श से लेकर हवाई जहाज के कार्गो होल्ड तक सामान को 30 मिनट से भी कम समय में पहुंचाने का दृष्टिकोण, इसके इरादे को साफ जाहिर करता है. वैश्विक लॉजिस्टिक्स की दुनिया में, रफ्तार ही सबसे बड़ी पूंजी है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए, ट्रांजिट टाइम में यह कमी उनके माल के खराब होने और मुनाफे वाले निर्यात के बीच का बड़ा अंतर साबित हो सकती है. यह एक ऐसे भविष्य का संकेत देता है, जहां यह क्षेत्र केवल एक सहायक उत्पादन केंद्र बनकर नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन का एक प्राथमिक केंद्र बन जाएगा.

महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मॉडल की सफलता 'मल्टी-मोडैलिटी' की अवधारणा पर टिकी है, जिसका समर्थन पीएम गति शक्ति पहल द्वारा किया गया है. अलग-थलग पड़ा एक हवाई अड्डा कमजोर होता है, लेकिन समर्पित माल ढुलाई गलियारों (Dedicated Freight Corridors - DFC), एक्सप्रेसवे और रेल लिंक से जुड़ा हवाई अड्डा एक पावरहाउस बन जाता है. पूर्वी और पश्चिमी डीएफसी के चौराहे पर स्थित होने के साथ-साथ यमुना एक्सप्रेसवे और दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे से सड़क कनेक्टिविटी, नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को हवाई, सड़क और रेल यातायात का एक स्वाभाविक संगम स्थल बनाती है.

यह निर्बाध जुड़ाव 'लास्ट-माइल कनेक्टिविटी' की उस बारहमासी चुनौती को हल करता है, जो अक्सर उत्तर प्रदेश की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को प्रभावित करती रही है.

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बदलने वाली है इलाके की औद्योगिक पहचान

इसके अलावा, यह एयरपोर्ट इस इलाके की औद्योगिक पहचान को बदलने वाला है. YEIDA-NIA कॉरिडोर तेज़ी से एक मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर विकसित हो रहा है, जो मेम्फिस या इंचियोन जैसे ग्लोबल एयरोट्रोपोलिस मॉडल की तरह है. HCL-फॉक्सकॉन के सेमीकंडक्टर वेंचर से लेकर मेडिकल डिवाइसेस पार्क तक, लगभग ₹30,000 करोड़ के औद्योगिक निवेश का वादा आधुनिक आर्थिक क्लस्टरिंग की गहरी समझ को दिखाता है. अब इंडस्ट्रीज़ सिर्फ़ सस्ती ज़मीन नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक्स के लिहाज़ से सुविधाजनक जगहें भी तलाश रही हैं. मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को एक ही जगह पर लाकर, यह इलाका एक क्लोज्ड-लूप वैल्यू चेन बनाता है, जो और ज़्यादा विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को आकर्षित करता है.

हालांकि, इस विजन को साकार करने के लिए सिर्फ कंक्रीट और स्टील की ही जरूरत नहीं है. जैसे-जैसे एयरपोर्ट की क्षमता बढ़कर 7 करोड़ यात्रियों तक पहुंचेगी, तेज़ी से हो रहे विकास और सस्टेनेबिलिटी के बीच के नाज़ुक संतुलन की परीक्षा होगी. नेट ज़ीरो एयरपोर्ट बनने का लक्ष्य तारीफ के काबिल है, लेकिन इसके लिए एनर्जी सोर्सिंग और वेस्ट मैनेजमेंट के मामले में बहुत सावधानी से काम करने की जरूरत है.

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 21वीं सदी में इंफ्रास्ट्रक्चर केवल यात्रा के बारे में नहीं है, बल्कि यह आर्थिक नियति को तय करने के बारे में है. यदि अधिकारियों द्वारा तैयार की गई यह रूपरेखा पूरी तरह सफल होती है, तो नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट न केवल दिल्ली की भीड़भाड़ को कम करेगा. बल्कि पूरे उत्तर भारत में आर्थिक मौकों को सबके लिए सुलभ बनाएगा.

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