दुनिया भर में छाई मंदी की वजह से लोग नौकरी खो रहे हैं, जिसका असर भारत पर भी दिख रहा है. लोग नौकरी जाने के डर से बड़े निवेश से कतरा रहे हैं. खास तौर पर जो लोग घर खरीदने के प्लान कर रहे थे, वो अभी इस असमंजस में हैं कि कहीं उनकी नौकरी तो नहीं चली जाएगी. यह सवाल इस समय भारतीय मिडिल क्लास और रियल एस्टेट मार्केट के लिए सबसे बड़ा और प्रासंगिक विषय बना हुआ है.
बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद और गुरुग्राम जैसे शहर, जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था और रियल एस्टेट मार्केट आईटी प्रोफेशनल्स के भरोसे चलता है, वहां इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है. आईटी सेक्टर में काम करने वाले वेतनभोगी प्रोफेशनल्स के बीच इस समय 'वेट एंड वॉच' की स्थिति बनी हुई है. ओरेकल, टीसीएस, अमेज़न और मेटा जैसी दिग्गज कंपनियों में हुई छंटनी और एआई के बढ़ते प्रभाव ने टेक कर्मचारियों को सुरक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है.
कुछ दिन पहले ही बेंगलुरु के एक टेक-कपल की सोशल मीडिया पोस्ट ने इस बहस को हवा दी. उन्होंने लिखा था कि डाउन पेमेंट और होम लोन EMI चुकाने की वित्तीय क्षमता होने के बावजूद, नौकरी की असुरक्षा के कारण वे इतना बड़ा लोन लेने से बेहद डरे हुए हैं और उन्होंने अपना फैसला टाल दिया है.
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रियल एस्टेट रिसर्च फर्म नाइट फ्रैंक इंडिया और एनारॉक के हालिया डेटा से कुछ चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, बिना बिके घरों में बढ़ोतरी देखी गई है. आईटी हब्स में नए घरों की बिक्री सुस्त होने से अनसोल्ड इन्वेंट्री तेजी से बढ़ी है. बेंगलुरु में बिना बिके घरों का स्टॉक 23% बढ़कर लगभग 71,611 यूनिट्स तक पहुंच गया है, वहीं पुणे में इसमें 12% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
नाइट फ्रैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, पुणे के रेजिडेंशियल रियल एस्टेट सेल्स में 3% की गिरावट आई है, जबकि बेंगलुरु जैसे बड़े मार्केट में पिछले वर्षों की तुलना में ग्रोथ रेट शून्य (0%) पर आ गया है.
बायर्स का बदला रुख
आईटी कंपनियों में छंटनी की खबरों ने होमबायर्स के सेंटिमेंट पर सीधा असर डाला है. अगर यह डर न होता, तो इन शहरों में एंड-यूज़र डिमांड कहीं बेहतर होती. आईटी प्रोफेशनल्स पहले ₹1.5 करोड़ से ₹3 करोड़ तक के मिड और लग्जरी सेग्मेंट के घरों के सबसे बड़े खरीदार थे, जॉब मार्केट में अनिश्चितता के कारण इस सेगमेंट में नई बुकिंग्स और साइट विजिट्स में काफी कमी आई है.
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रेंटल मार्केट में सुधार और लचीलापन
लोग अब बड़ी EMI का जोखिम उठाने के बजाय किराए पर रहना ज्यादा सुरक्षित मान रहे हैं. हालांकि, बेंगलुरु के टेक कॉरिडोर्स में जहां पहले किराया 15-30% सालाना की दर से बढ़ रहा था, वह अब थम गया है. कई आईटी इलाकों में मकान मालिक अब किराए में 5 से 12% तक की बातचीत करने को तैयार हैं और कम सिक्योरिटी डिपॉजिट पर भी घर दे रहे हैं.
मांग में कमी को देखते हुए डेवलपर्स अब सीधे तौर पर कीमतों में कटौती तो नहीं कर रहे हैं, लेकिन खरीदारों को आकर्षित करने के लिए अप्रत्यक्ष तरीके अपना रहे हैं, जैसे बुकिंग अमाउंट में भारी छूट, मुफ्त में कार पार्किंग या नो-ईएमआई टिल पजेशन जैसे ऑफर्स.
क्या यह रियल एस्टेट मार्केट के क्रैश होने का संकेत है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मार्केट क्रैश नहीं, बल्कि एक 'टेम्परेरी स्लोडाउन' या करेक्शन है. हालांकि ट्रेडिशनल आईटी कंपनियों में छंटनी हो रही है, लेकिन भारत में विदेशी कंपनियों के 'ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स' (GCC) बहुत तेजी से ऑफिस स्पेस लीज पर ले रहे हैं और नई नियुक्तियां कर रहे हैं, जिससे मार्केट को सपोर्ट मिल रहा है.