अमेरिका और ईरान के बीच तनातनी जारी है, कच्चा तेल भी 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है. इस बीच दुनिया की निगाहें अमेरिका पर है. खासकर रूस और ईरान से कारोबार करने वाले देश अमेरिका के निशाने पर हैं. जिसमें भारत भी शामिल है.
दरअसल, अमरीकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर 2026 को 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट 2026' पारित कर दिया है. इस विधेयक के तहत अमरीका उन प्रमुख देशों पर 100% तक का एक्स्ट्रा टैरिफ लगा सकता है, जो रूस या ईरान से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का आयात जारी रखते हैं. इस विधेयक के पारित होने से अब ट्रंप प्रशासन के पास ये अधिकार होगा कि वे किस देश पर कितना टैरिफ लगाए.
भारत सरकार का रुख और एनर्जी सेफ्टी
अमरीकी संसद में यह बिल पास होने के बाद भारत सरकार अपनी रणनीति पर काम कर रही है, फिलहाल भारत सरकार वैट एंड वॉच की रणनीति अपना रही है. विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट किया है कि भारत अपने 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है.
भारत की ओर से जारी बयान में कहा गया कि देश बाजार की बदलती स्थितियों और अलग-अलग सोर्स से कच्चे तेल की खरीदारी जारी रखेगा. भारत ने पिछले वर्षों में अमरीका से भी ऊर्जा आयात बढ़ाया है, लेकिन राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहेंगे. दरअसल, भारत ने पिछले महीने सबसे ज्यादा कच्चा तेल रूस से आयात किया था, जबकि एलपीजी की सबसे ज्यादा खरीदारी अमेरिका से हुई.
कच्चे तेल का आयात गणित
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की रिपोर्ट के अनुसार भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है. जुलाई 2026 में भारत ने रूस से $7.27 अरब का कच्चा तेल खरीदा, जो भारत के कुल $14.21 अरब के कच्चे तेल आयात का 51.1% था. अमेरिका का ध्यान भारत-रूस के बीच बढ़ते व्यापार पर भी है.
रूस के अलावा भारत ने संयुक्त अरब अमीरात (10.8%), सऊदी अरब (9.6%), वेनेजुएला (6.3%), ब्राजील (5.5%), ओमान (5.3%) और अमरीका (2.9%) कच्चा तेल आयात किया है. यह आंकड़े दर्शाते हैं कि रूसी तेल भारत के ऊर्जा बॉस्केट का सबसे बड़ा आधार बना हुआ है.
भारत के लिए अमेरिका क्यों अहम
वहीं भारत सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट अमेरिका को करता है. अगस्त 2026 में भारत का अमेरिका को निर्यात 21.83% बढ़कर $8.4 अरब तक पहुंच गया, जबकि आयात $5.97 अरब रहा था. ऐसे में भारत के लिए अमेरिका के साथ बेहतर रिश्ते भी आर्थिक तौर पर जरूरी है.
भारत पर कितना टैरिफ का खतरा
इस बीच Emkay Global और ICRA जैसी एजेंसी के एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर अमेरिका 100% तक सीमा शुल्क लगाता है, तो भारत के अमेरिकी निर्यात में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे देश की GDP ग्रोथ तक प्रभावित हो सकती है. इससे पहले सितंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच 50% शुल्क रहने पर मासिक निर्यात गिरकर $6.5 अरब रह गया था.
GTRI रिपोर्ट का मानना है कि अमेरिका इस विधेयक का इस्तेमाल भारत पर दबाव बनाने और द्विपक्षीय व्यापार वार्ता में मनमाफिक रियायतें हासिल करने के लिए कर सकता है. हालांकि भारत ने साफ कर दिया है कि किसी भी तरह के दबाव में आर्थिक समझौते नहीं किए जाएंगे.