ब्रिटिश राइटर जेम्स क्रैबट्री ने चीन में दो हफ्ते बिताने के बाद वहां की इकोनॉमी में एक बड़ा अंतर बताया है. हालांकि वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और ड्रोन में हुई तरक्की से बहुत इम्प्रेस हुए, लेकिन उन्होंने देखा कि इकोनॉमी कमजोर डिमांड, गिरते इन्वेस्टमेंट, बेरोजगारी और लंबे समय से चल रहे प्रॉपर्टी संकट से जूझ रही है.
'चीन: K-होल के ज़रिए' टाइटल वाली एक पोस्ट में, क्रैबट्री ने चीन को 'K-शेप्ड इकोनॉमी' बताया है, जहां तेज टेक्नोलॉजिकल तरक्की के साथ-साथ गहरी इकोनॉमिक प्रॉब्लम भी हैं. उन्होंने लिखा कि शेन्ज़ेन से मैं उसके टेक इकोसिस्टम की ताकत से हैरान होकर निकला, जो मेरी पहले की समझ से कहीं ज़्यादा था. फिर भी अंदर ही अंदर ये बहुत बुरी हालात में है और शायद उससे भी ज़्यादा बुरी जितनी मैंने सोची थी.
यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के जाने-माने विजिटिंग फेलो क्रैबट्री ने कहा कि चीन के टेक्नोलॉजी सेक्टर और बड़ी इकोनॉमी के बीच गैप बढ़ रहा है. उन्होंने लिखा कि हाल की तिमाही में हेडलाइन GDP में 4.5% की बढ़ोतरी हुई, लेकिन इन्वेस्टमेंट गिर रहा है, डिमांड कमजोर है, प्रॉपर्टी में भारी गिरावट आ रही है, और प्राइवेट बिजनेस ने खर्च करना बंद कर दिया है.
जियोपॉलिटिकल एनालिस्ट ने टैक्स रेवेन्यू में कमी, चीन के स्टॉक मार्केट पर दबाव और एडवांस्ड कंप्यूटिंग टेक्नोलॉजी तक पहुंच पर रोक की ओर भी इशारा किया. क्रैबट्री के अनुसार, चीन की बची हुई ग्रोथ एक्सपोर्ट पर निर्भर है, जिसे ट्रेडिंग पार्टनर्स से बदले में टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है.
क्या जापान जैसा चीन का हो जाएगा हाल?
बीजिंग की अपनी यात्रा के दौरान, क्रैबट्री ने अर्थशास्त्री माइकल पेटिस से मुलाकात की, जिन्होंने इस संभावना पर चर्चा की कि चीन में भी जापान की तरह कमजोर ग्रोथ का लंबे समय तक अनुभव हो सकता है, जब उसका एसेट बबल फट गया था. एनलिस्ट ने चीन के इकोनॉमिक आउटलुक के बारे में पेटिस के असेसमेंट को 'एक दशक या उससे ज़्यादा समय तक फ्लैट ग्रोथ, ठहराव और धीमी रिकवरी वाला समय बताया, जबकि यह इतिहास के सबसे बड़े कर्ज़ के बोझ से जूझ रहा है.' उन्होंने कहा कि और यही पॉजिटिव सिनेरियो है.
नौकरियों का संकट
क्रैबट्री ने यह भी सवाल उठाया कि क्या चीन के ऑफिशियल बेरोजगारी के आंकड़े लेबर मार्केट की हालत को पूरी तरह दिखाते हैं.
उन्होंने कहा कि एक साफ़ उदाहरण लें, बेरोज़गारी ऑफिशियली 5% से थोड़ी ज़्यादा है. बेशक, कोई भी इस पर यकीन नहीं करता. चीनी इकोनॉमिस्ट डेविड दाओकुई ली ने हाल ही में असली आंकड़ा 10.2% बताया. पेटिस को लगता है कि यह अभी भी ज़्यादा है. उन्होंने फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि 53 मिलियन चीनी वर्कर फूड डिलीवरी और राइड-हेलिंग में काम करते हैं, जबकि लगभग 200 मिलियन लोग बड़ी गिग इकॉनमी में काम करते हैं.
लेखक ने कहा कि चीन साफ तौर पर इनफ़ॉर्मल इकोनॉमी का इस्तेमाल नए अनएम्प्लॉयमेंट इंश्योरेंस के तौर पर कर रहा है, क्योंकि उसकी इकॉनमी धीमी हो रही है. उनकी कमेंट्री में रोज़गार के अनुमान और अल्टरनेटिव बेरोज़गारी के आंकड़ों का ज़िक्र किया गया था और पोस्ट में उन्हें अलग से वेरिफाई नहीं किया गया था.
कम्पटीशन के कारण विदेश जा रहीं चीनी कंपनियां
क्रैबट्री ने कहा कि चीनी बिज़नेस को अपने देश में, खासकर इलेक्ट्रिक गाड़ियों में, बहुत ज़्यादा कॉम्पिटिशन का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने लिखा कि अपनी यात्रा के दौरान कई मौकों पर मैंने एंटरप्रेन्योर्स को चीन में मुकाबला करने को सिविल वॉर बताते सुना.
उन्होंने बताया कि 100 से ज़्यादा EV ब्रांड्स तेज़ी से प्राइस कट करके मुकाबला कर रहे हैं, जिससे ज़्यादातर कंपनियों का मार्जिन बहुत कम रह गया है. क्रैबट्री के अनुसार, यह घरेलू कॉम्पिटिशन चीनी कंपनियों को मुनाफे की तलाश में विदेशों में विस्तार करने के लिए भी प्रेरित कर रहा है.
चीन नए टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट कंट्रोल तैयार कर रहा है चीन ने नए टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट कंट्रोल तैयार किए हैं. क्रैबट्री ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि अमेरिका के साथ कॉम्पिटिशन बढ़ने पर चीन टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट पर रोक लगा रहा है. उन्होंने लिखा कि चीन के पावरफुल 'ओपन वेट' AI मॉडल्स को भी पहली बार कंट्रोल किया जाएगा, साथ ही ड्रोन से लेकर टनल-बोरिंग मशीनों तक सब कुछ कंट्रोल किया जाएगा. उन्होंने कहा कि बीजिंग, स्ट्रेटेजिक टेक्नोलॉजी तक पहुंच को रोकने के लिए वाशिंगटन जैसे सिस्टम बना रहा है.
एक शक्तिशाली लेकिन आर्थिक रूप से परेशान चीन
क्रैबट्री ने यह नतीजा निकाला कि चीन टेक्नोलॉजी के मामले में कॉम्पिटिटिव बना हुआ है और इंटरनेशनल लेवल पर उसका कॉन्फिडेंस बढ़ता जा रहा है, भले ही उसकी घरेलू इकोनॉमी स्ट्रक्चरल चुनौतियों का सामना कर रही हो.
उन्होंने लिखा कि शी का चीन दुनिया के मंच पर कॉन्फिडेंट महसूस कर रहा है. उसने 2025 में वॉशिंगटन का सामना किया. कई टेक्नोलॉजी में उसकी बढ़त तेजी से बढ़ रही है, लेकिन चीन आर्थिक रूप से भी कमज़ोर महसूस कर रहा है, और यह सही भी है, जिससे यह भी पता चलता है कि बीजिंग US के साथ रिश्ते स्थिर रखने के लिए क्यों उत्सुक रहा है.