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सम्राट सरकार में एक के बाद एक किले ध्वस्त, बिहार में बीजेपी को क्यों लग रहे हैं बड़े सियासी झटके?

बिहार में सत्ता और संगठन की कमान होने के बावजूद बीजेपी को एक के बाद एक मिल रहे चुनावी झटकों ने पार्टी के भीतर गहरी चिंता बढ़ा दी है. बांकीपुर उपचुनाव से लेकर एमएलसी चुनावों तक शहरी और पारंपरिक गढ़ों के खिसकने से सम्राट चौधरी के नेतृत्व और पार्टी की चुनावी रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.

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बिहार के सीएम सम्राट चौधरी के राज में हारी बीजेपी (Photo-ITG)
बिहार के सीएम सम्राट चौधरी के राज में हारी बीजेपी (Photo-ITG)

बिहार की सियासत हमेशा से देश की राजनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र रही है. यहां सत्ता का गणित सिर्फ जातीय गणित से नहीं बनता है, बल्कि सामाजिक समीकरण, स्थानीय नेतृत्व, विकास, रोजगार और जनता के राजनीतिक मिजाज का भी बड़ा योगदान होता है. ऐसे में बिहार में किसी भी सियासी दल के लिए सत्ता हासिल करना जितना चुनौतीपूर्ण है, उसे लंबे समय तक बनाए रखना उससे कहीं अधिक मुश्किल है. यही सियासी मुश्किल अब बीजेपी के सामने खड़ी नजर आ रही है, जो सत्ता के सिंहासन पर विराजमान तो है, लेकिन उसके हाथ से एक के बाद एक सीट निकलती जा रही है.

बिहार की राजनीति में पहली बार है, जब बीजेपी का अपना मुख्यमंत्री है. सत्ता और सियासत दोनों की कमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हाथ में है, लेकिन बीजेपी एक के बाद एक चुनाव हारती जा रही है. हाल के दिनों में बीजेपी को उसके मजबूत गढ़ और पारंपरिक सीटों पर झटके लगे हैं. पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव में हार के बाद विधान परिषद (MLC) चुनावों में पटना शिक्षक सीट भी उसके हाथ से निकल गई है.

बांकीपुर और पटना शिक्षक सीट पर बीजेपी का तीन दशकों से चले आ रहे वर्चस्व का टूटना पार्टी के भीतर गंभीर आत्ममंथन का विषय बन गया है. केंद्र और राज्य की सत्ता में डबल इंजन की सरकार होने, मजबूत संगठन और पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के गृह राज्य होने के बावजूद बीजेपी के हाथ से उसके ये गढ़ क्यों फिसल रहे हैं? पार्टी का एक के बाद एक सियासी दुर्ग क्यों दरकता जा रहा है?

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सम्राट सरकार में तीन चुनाव हारी एनडीए

बिहार में सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बने छह महीने से ज्यादा हो गया है. इस दौरान बीजेपी को एक के बाद एक चुनावी झटका लग रहा है. सम्राट चौधरी के सत्ता की कमान संभालने के बाद मई 2026 में भोजपुर-बक्सर स्थानीय निकाय विधान परिषद (MLC) उपचुनाव हुए थे, जिसमें आरजेडी के सोनू कुमार राय प्रत्याशी थे, जबकि एनडीए की ओर से जेडीयू के कन्हैया प्रसाद मैदान में उतरे थे. आरजेडी ने यह सीट 340 वोटों के अंतर से जीत ली थी, जो एनडीए के लिए बड़ा झटका था.

भोजपुर-बक्सर के स्थानीय निकाय एमएलसी उपचुनाव में जीत के साथ ही राजद ने सम्राट चौधरी सरकार के शुरुआती दिनों में ही एनडीए के खिलाफ चुनावी बढ़त बनाने की शुरुआत कर दी थी, जिसके बाद फिर बीजेपी के मजबूत किले ध्वस्त होने लगे. अगस्त में बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुए, जो नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई थी. यह सीट बीजेपी के हाथ से निकल गई और उसके बाद पटना शिक्षक एमएलसी सीट पर उसे करारी मात खानी पड़ी. बिहार एमएलसी चुनाव में बीजेपी से ज्यादा सीटें आरजेडी को मिलीं.

बिहार में बीजेपी का दरकता सियासी किला

बिहार में सम्राट सरकार बनने के बाद से बीजेपी के मजबूत किले दरकते जा रहे हैं. बांकीपुर 1995 से लगातार बीजेपी का अभेद्य किला रहा था. नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा से लेकर नितिन नवीन तक, इस सीट पर भाजपा का वर्चस्व इतना अटूट माना जाता था कि इसे पार्टी के लिए 'गारंटी जीत' वाली सीट समझा जाता था, लेकिन इसी साल अगस्त में हुए उपचुनाव में बीजेपी का यह किला ध्वस्त हो गया.

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बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों ने 30 साल पुराने राजनीतिक समीकरण को उलट दिया. पहली बार चुनावी मैदान में उतरे जन सुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर ने यहां से विशाल जीत दर्ज करते हुए भाजपा के गढ़ में सेंध लगाई और तीन दशक पुराने वर्चस्व का खात्मा कर दिया. इसके बाद बीजेपी को दूसरा बड़ा झटका एमएलसी चुनाव में लगा. पटना की शिक्षक एमएलसी सीट पर तीन दशक से कब्जा जमाने वाले भाजपा के नवल किशोर यादव को हार का सामना करना पड़ा.

राजद के उम्मीदवार डॉ. संजीव कुमार सिंह ने उन्हें 1,057 वोटों से हरा दिया. इस जीत के साथ ही पटना शिक्षक सीट पर नवल किशोर यादव का लंबे समय से चला आ रहा दबदबा खत्म हो गया. बांकीपुर सीट पर हुए ऐतिहासिक बदलाव के बाद अब 'पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र' एमएलसी चुनाव में बीजेपी को करीब 30 साल बाद करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है. इतना ही नहीं, बीजेपी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी के दरभंगा इलाके में भी बीजेपी को मात खानी पड़ी है, जहां से आरजेडी के अनिल झा एमएलसी चुने गए हैं.

बिहार में बीजेपी की क्यों हो रही दुर्दशा

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बिहार में भाजपा की राजनीति लंबे समय तक नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ जुड़ी रही है. इससे पार्टी को सत्ता में भागीदारी और चुनावी लाभ तो मिला, लेकिन एक सवाल हमेशा बना रहा कि भाजपा का अपना ऐसा चेहरा कौन है, जो पूरे बिहार में जनता के बीच स्वतंत्र राजनीतिक स्वीकार्यता रखता हो? बीजेपी ने ओबीसी जाति से आने वाले सम्राट चौधरी को सीएम की कुर्सी सौंपी, लेकिन पार्टी के लिए यह चुनावी तौर पर पूरी तरह मुफीद साबित नहीं हो पा रहा है.

बिहार के शहरी और सवर्ण वोटों के चलते बीजेपी का मजबूत किला लंबे समय से बना रहा है, लेकिन अब उसकी पकड़ कमजोर होने लगी है. पहले बांकीपुर उपचुनाव हारी और उसके बाद पटना शिक्षक कोटे की एमएलसी सीट भी गंवा दी. पटना की शहरी और शिक्षक सीटों को भाजपा ने पूरी तरह 'सुरक्षित' मान लिया था. स्थानीय मुद्दों और असंतोष को नजरअंदाज करना पार्टी को भारी पड़ा. इसके चलते ही बांकीपुर सीट बीजेपी को गंवानी पड़ी है.

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जन सुराज और स्थानीय स्वतंत्र चेहरों के आने से पारंपरिक वोट बैंक में बिखराव हुआ है. बांकीपुर में प्रशांत किशोर की सीधी जीत ने साबित किया था कि पटना के वोटर अब पारंपरिक दलीय निष्ठा से आगे बढ़कर विकल्पों की तलाश कर रहे हैं. इस तरह सम्राट चौधरी के चेहरे सहारे बीजेपी द्वारा मजबूत पकड़ बनाए रखने की उम्मीदें धूमिल होती हुई नजर आ रही हैं.

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बिहार में क्यों बीजेपी से हो रहा मोहभंग

बीजेपी की पारंपरिक ताकत शहरी मध्यम वर्ग, व्यापारी और सवर्ण मतदाता माने जाते हैं. सम्राट चौधरी के सीएम बनने के चलते सवर्ण समुदाय की उम्मीदों को झटका लगा था. भरत तिवारी के एनकाउंटर से अगड़ी जातियों में नाराजगी दिखी थी, जिसे लेकर बीजेपी के कई सवर्ण नेताओं ने भी बयान दिए थे. पिछले कुछ वर्षों में महंगाई, बेरोजगारी, स्थानीय बुनियादी मुद्दों और प्रशासनिक स्तर पर हो रही अनसुनी के कारण इस वर्ग में धीरे-धीरे उदासीनता और नाराजगी पनप रही है.

शहरी इलाकों में जनता अब केवल भावनात्मक मुद्दों की बजाय विकास, शिक्षा, रोजगार और जमीनी काम के आधार पर वोट करने लगी है, जिसके चलते बीजेपी के पारंपरिक समीकरण कमजोर पड़े हैं. बीजेपी के भीतर केंद्रीय स्तर पर बड़े बदलाव और शीर्ष नेतृत्व के व्यस्त होने के चलते भी जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनता के बीच संवाद में कुछ कमी आई है. टिकट वितरण से लेकर स्थानीय स्तर के मुद्दों को समय रहते न सुलझाना भी भितरघात और असंतोष का कारण बना है.

जातीय और सामाजिक समीकरणों में बदलाव

बिहार की राजनीति हमेशा से जातियों के इर्द-गिर्द घूमती रही है. हाल के दिनों में यह देखा गया है कि बीजेपी के पारंपरिक मतदाता समूहों, जैसे सवर्ण या पिछड़ी जातियों के एक हिस्से में बदलाव की प्रवृत्ति उभरी है, जिससे केवल वैचारिक या पारंपरिक मोर्चेबंदी के सहारे चुनाव जीतने की रणनीति कमजोर पड़ी है. बिहार में पिछड़े, अति पिछड़े, दलित, महादलित और सवर्ण समुदायों के राजनीतिक रुझान चुनावी परिणामों को प्रभावित करते हैं.

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भाजपा ने इन सामाजिक वर्गों में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए हैं, लेकिन बिहार में किसी भी दल के लिए सभी सामाजिक समूहों के बीच स्थायी राजनीतिक विश्वास कायम करना आसान नहीं है. पार्टी के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी वैचारिक राजनीति के साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व और स्थानीय आकांक्षाओं के बीच किस तरह संतुलन स्थापित करती है.

बिहार में भाजपा की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू जेडीयू के साथ उसका संबंध रहा है. नीतीश कुमार की अपनी राजनीतिक पहचान और सामाजिक आधार है. चुनाव में दोनों दलों ने मिलकर आंकड़े बेहतर किए, लेकिन गठबंधन की राजनीति में भविष्य का नेतृत्व, सत्ता में हिस्सेदारी और दोनों दलों के अपने-अपने राजनीतिक हित हमेशा महत्वपूर्ण बने रहते हैं.

बीजेपी के लिए क्यों टेंशन का सबब बन रहा

भाजपा के सामने एक चुनौती यह भी है कि वह गठबंधन की मजबूती बनाए रखते हुए अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को किस तरह विकसित करती है. बिहार की राजनीति में रोजगार सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है, और बड़ी संख्या में युवा आज भी रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करते हैं.

बिहार की जनता समय-समय पर राजनीतिक दलों और गठबंधनों के प्रति अपना रुख बदलती रही है. इसलिए भाजपा को भी यह समझना होगा कि चुनाव जीतना और जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरना दो अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं. शिक्षा, उद्योग, सरकारी नौकरियों और निजी निवेश को लेकर जनता की अपेक्षाएं लगातार बढ़ रही हैं. चुनाव के समय विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित बदलाव अभी तक नहीं दिखा है. यही वजह है कि बीजेपी को बिहार में एक के बाद एक सियासी झटका लग रहा है.

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यदि बीजेपी ने अपनी शहरी मतदाताओं की नाराजगी को दूर करने, सवर्ण जातियों के साथ संतुलन साधने, जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने और नए विकल्पों से मिल रही चुनौतियों का ठोस राजनीतिक जवाब नहीं खोजा, तो आने वाले दिनों में पार्टी के लिए अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखना और अधिक कठिन हो सकता है.

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