ट्रंप ने खोल दिया राज! सऊदी-तुर्की-पाकिस्तान की दोस्ती से अमेरिका क्यों खुश?

ट्रंप के बयान से यह संकेत मिला कि वॉशिंगटन फिलहाल इस उभरते सुरक्षा ढांचे को अपने खिलाफ नहीं मान रहा. समझौते में सामूहिक रक्षा, संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया सहयोग और आगे दूसरे देशों, खासकर मिस्र, के जुड़ने की संभावना ने क्षेत्रीय राजनीति की बहस को और तेज कर दिया है.

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. (Photo- ITG) अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. (Photo- ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 17 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 10:46 AM IST

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने हाल ही में मक्का में एक त्रिपक्षीय रक्षा समझौता किया था. समझौते के बाद इसे लेकर दुनिया भर में अलग-अलग तरह के कयास लगाए जा रहे थे. कुछ विशेषज्ञों ने इसे अमेरिका के प्रभाव से बाहर पश्चिम एशिया में नया सुरक्षा गठजोड़ बताया. कुछ का मानना था कि इसके पीछे कहीं न कहीं अमेरिका की भी भूमिका हो सकती है. अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजा बयान ने इस पूरे मामले को एक नया मोड़ दे दिया है.

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राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के इस समझौते का खुलकर स्वागत किया है. उन्होंने कहा कि वह तीनों देशों के इस समझौते से "बहुत खुश" हैं. इसे पश्चिम एशिया के एकजुट होने की दिशा में "बड़ा, साहसिक और महत्वपूर्ण पहला कदम" बताया.

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राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान से इतना जरूर साफ होता है कि अमेरिका इस गठजोड़ को फिलहाल अपने लिए खतरा नहीं मान रहा, बल्कि इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए सकारात्मक कदम के तौर पर देख रहा है.

क्या है सऊदी-तुर्की-पाकिस्तान की डील?

मक्का में हुए समझौते के तहत तीनों देश अपनी रक्षा व्यवस्था में सहयोग बढ़ाएंगे. समझौते की सबसे अहम बात यह है कि तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति को तीनों पर हमला माना जाएगा. यह प्रावधान नाटो के सामूहिक रक्षा सिद्धांत जैसा माना जा रहा है. इसके अलावा संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया सहयोग और रक्षा तकनीक के क्षेत्र में मिलकर काम करने की योजना है.

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अमेरिका के खिलाफ गठजोड़ या अमेरिकी समर्थन?

समझौते के बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या यह अमेरिका के खिलाफ पश्चिम एशिया में नया मोर्चा है. हालांकि, तीनों देशों ने इसे रक्षात्मक समझौता बताया है. तुर्की ने भी कहा है कि यह किसी देश के खिलाफ नहीं है. दूसरी तरफ अमेरिका के साथ तीनों देशों के अपने-अपने रणनीतिक रिश्ते हैं. ऐसे में इसे सीधे अमेरिकी विरोधी गठजोड़ कहना जल्दबाजी होगी.

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अब ट्रंप का बयान इस तस्वीर को और दिलचस्प बनाता है. अगर अमेरिका इस समझौते को अपने खिलाफ मानता, तो ट्रंप का इतना खुलकर स्वागत करना मुश्किल होता. इससे संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन कम से कम फिलहाल इस क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को अपने हितों के खिलाफ नहीं देख रहा.

ट्रंप की खुशी के पीछे क्या है बड़ा संदेश?

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि इस समझौते से पश्चिम एशिया के देश अपने बचाव में ज्यादा प्रभावी तरीके से सक्षम होंगे. यानी अमेरिका की नजर में क्षेत्रीय देशों का अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादा जिम्मेदारी लेना बुरी बात नहीं है. दरअसल, पश्चिम एशिया में ईरान, हूती हमलों और लगातार बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना चाहता है. इस समझौते में आगे दूसरे देशों के शामिल होने की संभावना भी बताई जा रही है. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने मिस्र के शामिल होने के संकेत दिए हैं.

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