मोहब्बत के लिए मौत! सऊदी शासन ने प्रिंसेस को दिया था सरेआम मृत्युदंड!

सऊदी अरब के कानून के मुताबिक दो बांग्लादेशी नागरिकों को मिली मौत की सजा पर दुनिया में बहस हो रही है. पूछा जा रहा है कि क्या मोहब्बत की सजा मौत है? सऊदी कानून इसे ‘जिना’ (व्यभिचार) कहता है. जिसका दंश 50 साल पहले वहां की एक राजकुमारी भी उठा चुकी है.

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सऊदी अरब में 'व्याभिचार' की सजा मौत है.  (प्रतीकात्मक तस्वीर. Photo: Pexels) सऊदी अरब में 'व्याभिचार' की सजा मौत है. (प्रतीकात्मक तस्वीर. Photo: Pexels)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 21 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 10:10 PM IST

उम्र महज 19 साल. खानदान-सऊदी रॉयल. लड़की का नाम था- मिशाल बिंत फहद अल सऊद. वो राजकुमारी थी. वह किंग अब्दुलअजीज के वंश से ताल्लुक रखती थीं और उनके दादा प्रिंस मोहम्मद बिन अब्दुलअजीज, किंग खालिद के बड़े भाई थे. जुलाई 1977 में मिशाल को जेद्दा के एक चौराहे पर सरेआम मृत्युदंड दिया गया. लेकिन तब वो अकेली नहीं थी. मौत की सजा पाने वालों में 20 साल का एक युवक भी था. जो उसका प्रेमी था.

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न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस घटना पर लिखा है, "1977 में, प्रिंस मोहम्मद ने अपनी एक पोती और उसके प्रेमी को मौत की सजा देने का आदेश दिया. यह आदेश तब दिया गया जब उन्होंने शाही हुक्म मानने से इनकार कर दिया था; इस हुक्म के तहत पोती, राजकुमारी मिशाल को परिवार द्वारा चुने गए एक व्यक्ति से शादी करनी थी."

अखबार के अनुसार इस जोड़े पर व्यभिचार (अवैध शारीरिक संबंध) का आरोप लगाया गया था, जिसके लिए सऊदी कानून के तहत मौत की सजा का प्रावधान है. राजकुमारी मिशाल को जेद्दा में गोली मार दी गई, उस समय उसका प्रेमी खालिद अल-शाएर मुहलहल भी वहां मौजूद थे. मिशाल को गोली मारने के बाद खालिद का सिर काट दिया गया. 

लेकिन ये पूरी कहानी नहीं है. 

बताया जाता है कि मिशाल पढ़ाई के लिए लेबनान की राजधानी बेरूत गई थीं. वहीं उनकी मुलाकात खालिद से हुई और दोनों के बीच प्रेम संबंध बन गए. उस दौर में सऊदी समाज में महिलाओं की निजी जिंदगी पर परिवार का नियंत्रण काफी सख्त था. शाही परिवार के लिए विवाह और रिश्ते व्यक्तिगत पसंद के साथ-साथ खानदान की प्रतिष्ठा से भी जुड़े थे.

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हालांकि खालिद अल-शाएर मुहलहल भी कोई सामान्य नागरिक नहीं था. खालिद लेबनान में सऊदी राजदूत अली हसन अल-शायर का भतीजा था. 

विकीपीडिया के अनुसार राजकुमारी मिशाल के परिवार ने उन्हें स्कूल की पढ़ाई के लिए लेबनान के बेरूत भेज दिया. वहां रहने के दौरान उन्हें खालिद अल-शायर मुहलहल नाम के एक व्यक्ति से प्यार हो गया.  खालिद डिप्लोमैटिक परिवार से था और उसके चाचा लेबनान में सऊदी राजदूत थे. दोनों के बीच प्रेम संबंध शुरू हो गए. 

सऊदी अरब लौटने पर राज परिवार को पता चला कि उन्होंने कई बार अकेले मिलने की साजिश रची थी, जिसके चलते उन पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया.

टाइम मैगजीन ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि जब उनके खतरनाक प्रेम-संबंध के उजागर होने का खतरा पैदा हुआ, तो उन्होंने जाली पासपोर्ट हासिल किए और हवाई मार्ग से देश से भागने की कोशिश की. राजकुमारी ने पुरुष का भेष धारण किया था, लेकिन जब जेद्दा हवाई अड्डे पर सुरक्षा पुलिस की नज़र उस यात्री के पारंपरिक ढीले-ढाले लिबास पर पड़ी, तो उन्हें शक हुआ और राजकुमारी को उसके प्रेमी के साथ पकड़ लिया गया. 

मिशाल और खालिद पर शरीयत के अनुसार मुकदमा चलाया गया. और उन्हें मौत की सजा मुकर्रर की गई. 

रिपोर्ट बताते हैं कि मिशाल को राजपरिवार ने कहा कि वो अपना जुर्म स्वीकार नहीं करे, ऐसी स्थिति में उसकी जान बच जाती, लेकिन मिशाल नहीं मानी. उसने जुर्म स्वीकार किया. 

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15 जुलाई 1977 को जेद्दा में पार्क के भीतर 'क्वीन्स बिल्डिंग' के पास मिशाल और खालिद दोनों को सबके सामने मौत की सजा दी गई.

पीबीएस वेबसाइट के अनुसार 1977 की सर्दियों में ब्रिटिश फिल्म निर्माता एंथनी थॉमस ने लंदन की एक डिनर पार्टी में इस राजकुमारी की कहानी के बारे में सुना. शुरुआत में पश्चिमी देशों का ध्यान इस घटना की ओर नहीं गया, लेकिन लगभग छह महीने बाद, इन लोगों की पहचान हो गई. इसके बाद यह कहानी अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में छा गई. और खबर बनी- वह राजकुमारी, जिसने प्यार के लिए जान दे दी. 

एंथनी थॉमस ने इस घटना पर एक डॉक्यूड्रामा फिल्म Death of a Princess बनाई. फिल्म में दावा किया गया कि राजकुमारी की मौत केवल कानूनी सजा का मामला नहीं थी, बल्कि परिवार की प्रतिष्ठा और कथित प्रतिशोध ने भी इसमें भूमिका निभाई. सऊदी सरकार ने इसके प्रसारण का विरोध किया और कहा कि मृत्युदंड इस्लामी शरीयत के अनुसार दिया गया था. 

दरअसल सऊदी अरब की न्याय व्यवस्था इस्लामी शरीयत की व्याख्या पर आधारित है. यहां मृत्युदंड सिर्फ हत्या/रेप जैसे अपराधों तक सीमित नहीं रहा है. अपराध की प्रकृति और अदालत की व्याख्या के आधार पर कुछ दूसरे मामलों में भी मौत की सजा दी जा सकती है.

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करीब पांच दशक बाद सऊदी अरब में मृत्युदंड की एक और घटना ने ऐसे ही सवाल खड़े कर दिए हैं. 14 अक्टूबर 2026 को सऊदी अधिकारियों ने मक्का क्षेत्र में बांग्लादेश के दो नागरिकों नजरुल इस्लाम और स्वीटी अख्तर को मौत की सजा दी. सऊदी गृह मंत्रालय के मुताबिक दोनों को एक मस्जिद के भीतर कथित अश्लील कृत्य के मामले में दोषी ठहराया गया था. 

इन्हें अदालत ने ताजीर के तहत मृत्युदंड सुनाया था. यह इस्लामी कानून की वह श्रेणी है, जिसमें न्यायाधीश अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों के आधार पर सजा तय कर सकते हैं.

इसमें उन अपराधों के लिए सजा तय करने में न्यायाधीश को विवेकाधिकार मिलता है, जिनके लिए निश्चित दंड निर्धारित नहीं है. मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक सऊदी अरब में ताजीर के तहत भी मृत्युदंड दिए जाते रहे हैं. 
 

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