पाकिस्तान के कराची शहर में पैरामिलिट्री रेंजर्स के एक बड़े दफ्तर पर भयानक आतंकी हमला हुआ. इस हमले में पाकिस्तानी सेना के कई जवान मारे गए. हमले के बाद मारे गए आतंकियों के शवों और उनके पास से मिले दस्तावेजों से उनकी पहचान अफगान नागरिक के तौर पर हुई. इस हमले की जिम्मेदारी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP के एक गुट जमात उल अहरार ने ली.
इस हमले के अगले ही दिन गुस्साई पाकिस्तानी सेना और वायुसेना ने अफगानिस्तान की सीमा के अंदर घुसकर जोरदार बमबारी की और कई लड़ाकों को मारने का दावा किया. यह कोई एक दिन की घटना नहीं है.
फरवरी 2026 से ही पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच एक खुली जंग जैसी हालत बनी हुई है, जिसमें दोनों तरफ से ड्रोन और तोपों से हमले हो रहे हैं.
जिस तालिबान का स्वागत किया, वही बना चुनौती
सबसे दिलचस्प बात यह है कि आज पाकिस्तान जिस तालिबान से पिट रहा है, उसी तालिबान के काबुल पर कब्जा करने पर अगस्त 2021 में तब के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने खुशी जताई थी और कहा था कि अफगानिस्तान ने गुलामी की जंजीरें तोड़ दी हैं. अब वही जंजीरें पाकिस्तान के गले का फंदा बन गई हैं.
क्या है गुड और बैड आतंकवाद की थ्योरी?
सबसे पहले समझिए गुड आतंकवाद और बैड आतंकवाद की थ्योरी का मतलब क्या है. पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी ISI ने सालों पहले एक रणनीति बनाई थी, जिसे स्ट्रैटेजिक डेप्थ कहा जाता है.
‘गुड तालिबान’ की पाकिस्तान नीति
इस रणनीति के तहत आतंकी संगठनों को दो हिस्सों में बांटा गया. एक हिस्सा था गुड तालिबान या गुड टेररिस्ट. ये वो आतंकी संगठन थे जो पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल करके भारत के जम्मू कश्मीर में हिंसा फैलाते थे, जैसे लश्कर ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद.
लश्कर, जैश और हक्कानी नेटवर्क का रोल
इसी श्रेणी में हक्कानी नेटवर्क और अफगान तालिबान भी आते थे, जो अमेरिकी सेना और अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ लड़ रहे थे. पाकिस्तान इन्हें आजादी के लड़ाके या अपने काम के मोहरे मानता था.
कौन हैं ‘बैड’ आतंकवाद?
दूसरा हिस्सा - बैड तालिबान या बैड टेररिस्ट. ये वो संगठन हैं जो खुद पाकिस्तान की सेना और संविधान के खिलाफ हथियार उठाते हैं और वहां अपना कानून लागू करना चाहते हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है TTP यानी तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान.
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आसान भाषा में कहें तो पाकिस्तान की पुरानी सोच यही थी कि जो सांप पड़ोसी देशों भारत और अफगानिस्तान को काट रहा है, उसे दूध पिलाओ, और जो सांप खुद को काटे, उसे मारो.
हिलेरी क्लिंटन की चेतावनी हुई सच
साल 2011 में अमेरिका की तब की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने इस्लामाबाद में खड़े होकर पाकिस्तान को सीधी चेतावनी दी थी कि अपने घर के पीछे इस उम्मीद में सांप नहीं पाले जा सकते कि वे सिर्फ पड़ोसियों को काटेंगे, एक दिन वे सांप खुद पालने वाले को भी काटेंगे. आज 2025 और 2026 के आंकड़े बता रहे हैं कि यह बात पूरी तरह सच हो गई है.
तालिबान से पाकिस्तान की उम्मीदें टूटीं
पाकिस्तान को उम्मीद थी कि 2021 में अफगान तालिबान के सत्ता में आने के बाद वे पाकिस्तान के दुश्मन TTP पर रोक लगाएंगे, लेकिन हुआ इसका उल्टा. अफगान तालिबान और TTP के बीच गहरा जातीय और वैचारिक जुड़ाव है, दोनों पश्तून हैं और दोनों एक जैसी सोच रखते हैं.
काबुल की जेलों से छूटे TTP आतंकी
अफगान तालिबान ने काबुल की जेलों से सैकड़ों TTP आतंकियों को छोड़ दिया, जिनके पास अमेरिकी सेना के छोड़े हुए आधुनिक हथियार पहुंच गए. एक थिंक टैंक सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज के मुताबिक 2025 पाकिस्तान के लिए पिछले दस साल का सबसे खूनी साल रहा.
2025 बना पाकिस्तान का सबसे खूनी साल
साल 2024 में आतंकवाद से जुड़ी मौतों की संख्या 2555 थी, जो 2025 में बढ़कर 3000 के पार हो गई, यानी एक साल में ही 34 प्रतिशत की बढ़ोतरी. अकेले खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में मौतों में 44 प्रतिशत का उछाल आया और पूरे देश की कुल मौतों का 68 प्रतिशत हिस्सा इसी इलाके में हुआ, जो अफगानिस्तान की सीमा से जुड़ा है.
बलूचिस्तान में भी हिंसा में 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जहां बलूच लिबरेशन आर्मी और TTP मिलकर चीन के प्रोजेक्ट और पाकिस्तानी सेना को निशाना बना रहे हैं.
सीमा बंद करने से भी नहीं मिली राहत
2025 के आखिर में तंग आकर पाकिस्तान ने अफगानिस्तान से लगी सीमा को पूरी तरह बंद कर दिया था, जिससे कुछ महीने हमलों में थोड़ी कमी आई, लेकिन 2026 आते आते यह सीमा विवाद और तेज हो गया.
आतंकवाद का पूरा नेटवर्क कैसे काम करता है?
पाकिस्तान में आतंकवाद किसी अकेले गिरोह का काम नहीं है, बल्कि यह एक पूरा सिस्टम है जिसे सरकार और सेना का साथ मिला हुआ है. इसे तीन हिस्सों में समझा जा सकता है. पहला है कश्मीर से जुड़ा ढांचा. मुजफ्फराबाद और मानसेहरा में बने कैंप आज भी लश्कर ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद के ट्रेनिंग सेंटर के तौर पर सक्रिय हैं. ISI का एक खास विंग इन आतंकियों को पैसा, हथियार और भारत में घुसने का रास्ता देने के लिए जिम्मेदार रहा है.
क्वेटा शूरा और अफगान तालिबान कनेक्शन
दूसरा है अफगानिस्तान से जुड़ा ढांचा. पाकिस्तान के क्वेटा शहर में सालों तक अफगान तालिबान के बड़े नेताओं को सुरक्षित ठिकाना दिया गया, जिसे क्वेटा शूरा कहा जाता है. हक्कानी नेटवर्क के मुखिया सिराजुद्दीन हक्कानी को भी पाकिस्तान हमेशा अपना भरोसेमंद साथी मानता रहा, लेकिन आज वही सिराजुद्दीन हक्कानी अफगानिस्तान का गृह मंत्री बन गया है और पाकिस्तान की बात सुनने से इनकार कर चुका है.
हक्कानिया मदरसा और कट्टरपंथ
तीसरा हिस्सा है सोच बनाने वाले मदरसे. अकोरा खटक में मौजूद दारुल उलूम हक्कानिया मदरसे को जिहाद की यूनिवर्सिटी कहा जाता है. इस मदरसे से ही अफगान तालिबान और TTP दोनों के बड़े नेता पढ़कर निकले हैं. हैरानी की बात यह है कि पहले इस मदरसे को खुद इमरान खान की पार्टी की सरकार से सरकारी पैसा मिलता रहा है. यानी जिस पौधे को पाकिस्तान ने खुद पाला, वही पौधा आज पाकिस्तान को काट रहा है.
20 लाख से ज्यादा अफगान निकाले गए
जब पाकिस्तान अपनी सैन्य रणनीति में नाकाम होने लगा, तो उसने पूरा गुस्सा अपने देश में रह रहे लाखों गरीब अफगान शरणार्थियों पर निकाल दिया. सितंबर 2023 में शुरू हुई एक योजना के तहत अब तक 20 लाख से ज्यादा अफगान नागरिकों को जबरन पाकिस्तान से निकाला जा चुका है. सिर्फ 2025 में 10 लाख से ज्यादा लोगों को बाहर भेजा गया, और 2026 के शुरुआती महीनों में हर महीने 70 से 80 हजार अफगानियों को निकाला जा रहा है.
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मार्च 2025 से पाकिस्तान ने अफगान सिटिजनशिप कार्ड और प्रूफ ऑफ रजिस्ट्रेशन कार्ड रखने वालों को भी गैरकानूनी घोषित कर दिया. इनके बैंक खाते बंद कर दिए गए, सिम कार्ड ब्लॉक कर दिए गए, और जिन मकान मालिकों ने इन्हें किराए पर घर दिया था उन पर भारी जुर्माना लगाया गया.
महिलाओं और बच्चों पर सबसे ज्यादा असर
संयुक्त राष्ट्र और एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक निकाले गए लोगों में 60 प्रतिशत महिलाएं और बच्चे हैं, जिन्हें अफगानिस्तान में भूख और तालिबान के सख्त नियमों के बीच धकेल दिया गया है. इस कदम से अफगान तालिबान बहुत नाराज है और काबुल सरकार का कहना है कि पाकिस्तान अपनी सुरक्षा में हुई नाकामी का बदला बेकसूर शरणार्थियों से ले रहा है.
पाकिस्तान की सेना का फोकस बदला
पाकिस्तान की सेना और ISI का पूरा ध्यान अब भारत वाली सीमा से हटकर अफगानिस्तान वाली सीमा पर लग गया है. पाकिस्तान की आधी से ज्यादा सेना अब TTP और बलूच लड़ाकों से जूझने में लगी है, जिससे भारत के खिलाफ उसकी ताकत कमजोर हुई है.
भारत के लिए क्या मायने हैं?
जो आतंकी पहले कश्मीर भेजने के लिए तैयार किए जाते थे, वे अब पाकिस्तान के अपने अंदरूनी झगड़े में उलझे हुए हैं. हालांकि भारत को फिर भी सावधान रहना होगा, क्योंकि परेशान और हताश ISI ध्यान भटकाने के लिए कश्मीर में अचानक छोटे हमले तेज कर सकती है.
भारत ने अपनाया संतुलित रुख
इस पूरे संकट में भारत ने बहुत समझदारी वाला रुख अपनाया है. भारत ने अफगान तालिबान सरकार को राजनीतिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन काबुल में अपना तकनीकी मिशन चालू रखा है.
चाबहार के जरिए बढ़ रही पहुंच
भारत ने अफगानिस्तान को हजारों टन गेहूं, दवाइयां और भूकंप राहत सामान भेजा है, जिससे अफगान जनता के बीच भारत की इज्जत और बढ़ गई है. पाकिस्तान का रास्ता बंद होने के बावजूद भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह के जरिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक अपनी पहुंच मजबूत कर रहा है.
अमेरिका और चीन भी चिंतित
आज दुनिया के किसी भी देश को पाकिस्तान की इस हालत पर कोई दया नहीं आ रही है. अमेरिका अब पाकिस्तान को भरोसेमंद साथी नहीं मानता और साफ कह चुका है कि पाकिस्तान को अपनी धरती पर मौजूद सभी आतंकी नेटवर्क खत्म करने होंगे, चाहे वे भारत के खिलाफ हों या अफगानिस्तान के खिलाफ.
चीन ने अपने CPEC प्रोजेक्ट में अरबों डॉलर लगाए हैं, लेकिन दासू, कराची और बलूचिस्तान में चीनी इंजीनियरों पर हुए आत्मघाती हमलों ने चीन को भी हिला दिया है.
सुलह की कोशिशें भी रहीं नाकाम
अप्रैल 2026 में चीन ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सुलह कराने की कोशिश भी की, लेकिन वह कोशिश नाकाम रही क्योंकि पाकिस्तान जमीनी हालात बदलने को तैयार नहीं है. भले ही पाकिस्तान अभी फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की ग्रे लिस्ट से बाहर है, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था दिवालिया होने के बहुत करीब पहुंच चुकी है.
दुनिया अब यह समझ चुकी है कि पाकिस्तान को दी जाने वाली कोई भी आर्थिक मदद आखिर में उसकी सेना और आतंकी ढांचे को ही पालने में खर्च हो जाती है.
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‘गुड आतंकवाद’ की नीति का उल्टा असर
पाकिस्तान ने जिस गुड टेररिज्म को भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ हथियार बनाकर पाला था, वह आज एक ऐसा राक्षस बन गया है जो अपने ही बनाने वाले को निगलने लगा है. आतंकवाद को कभी अच्छा या बुरा बांटकर नहीं देखा जा सकता, उसकी कोई सीमा नहीं होती और वह किसी का वफादार नहीं होता.
जब तक पाकिस्तान की सेना अपनी पुरानी सोच को पूरी तरह छोड़कर सही रास्ते पर नहीं आती, तब तक कराची, पेशावर और रावलपिंडी में हिंसा इसी तरह जारी रहेगी. अफगानिस्तान के साथ चल रही यह जंग साबित करती है कि नफरत बोने वाले कभी शांति की फसल नहीं काट सकते.
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