प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किर्गिस्तान यात्रा सिर्फ एक सामान्य दौरा नहीं मानी जा रही है. इस यात्रा के दौरान बिश्केक में उन्होंने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान और किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सदिर जापारोव से अलग-अलग मुलाकातें कीं.
ऊपर से देखने पर ये तीनों मुलाकातें अलग-अलग लग सकती हैं, लेकिन असल में इनके पीछे भारत की एक बड़ी और सोची-समझी रणनीति छिपी हुई है. यह रणनीति पश्चिम एशिया से शुरू होकर ईरान, दक्षिण कॉकस और फिर मध्य एशिया तक फैली हुई है.
इसी बीच सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच हुए एक नए रक्षा समझौते ने भी दुनिया भर के विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है, जिसे कुछ लोग अनौपचारिक तौर पर 'मक्का गैंग' का नाम दे रहे हैं. सवाल यह उठ रहा है कि क्या भारत अपनी डिप्लोमेसी के जरिए इस नए समीकरण का जवाब तैयार कर रहा है.
‘मक्का गैंग’ के नए रक्षा समझौते का क्या है मतलब?
बात शुरू करते हैं उस नए समझौते से, जो सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच हुआ है. यह एक तरह का सामूहिक रक्षा समझौता है, यानी अगर इनमें से किसी एक देश पर मुसीबत आती है तो बाकी देश भी साथ खड़े रहेंगे. यह समझौता पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की राजनीति के लिए काफी बड़ी बात मानी जा रही है.
पाकिस्तान के लिए यह सिर्फ एक कूटनीतिक जीत नहीं है, बल्कि इससे उसे एक साथ सऊदी अरब और तुर्किए जैसे ताकतवर देशों से रक्षा संबंध मजबूत करने का मौका मिलता है. तुर्किए के लिए यह पश्चिम एशिया में अपनी पकड़ बढ़ाने का एक और जरिया है, वहीं सऊदी अरब इसके जरिए बदलती हुई क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में अपने लिए नए विकल्प खोल रहा है.
यह भी पढ़ें: सोना न खरीदें, विदेशों में शादी से बचें... 7.8% जीडीपी बूस्टर के बीच PM मोदी का स्वदेशी मंत्र
भारत किसी एक गुट में क्यों नहीं बंधना चाहता?
अब इस पूरी तस्वीर में भारत कहां खड़ा है, यह समझना जरूरी है. भारत इस घटनाक्रम को नजरअंदाज नहीं कर सकता, लेकिन भारत की खासियत यह है कि वह किसी एक गुट में शामिल होकर अपनी आजादी सीमित नहीं करना चाहता. इसके बजाय भारत अलग-अलग ताकतवर देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत बना रहा है. बिश्केक में ईरान और आर्मीनिया के साथ हुई बातचीत को इसी सोच का हिस्सा माना जा रहा है.
ईरान के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी कितनी अहम?
सबसे पहले बात करते हैं ईरान की. भारत और ईरान के रिश्ते सिर्फ पुरानी दोस्ती और संस्कृति तक सीमित नहीं हैं. आज इन रिश्तों के केंद्र में कनेक्टिविटी और रणनीतिक पहुंच है. ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि यह बंदरगाह पाकिस्तान को बीच में लाए बिना भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का रास्ता देता है.
इसके अलावा ईरान खुद पश्चिम एशिया के सबसे अहम देशों में गिना जाता है. वहां चल रहे तनाव और अमेरिका, इजरायल जैसे देशों के साथ खिंचाव के बावजूद भारत का ईरान से बातचीत जारी रखना यह दिखाता है कि भारत अपनी आजाद विदेश नीति पर चल रहा है.
पीएम मोदी और राष्ट्रपति पेजेश्कियान की बातचीत में पश्चिम एशिया के हालात के साथ-साथ दोनों देशों के आपसी रिश्तों पर भी चर्चा हुई. एक तरफ भारत अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान जैसे देश से भी संवाद बनाए हुए है. यही भारत की डिप्लोमेसी की सबसे बड़ी खूबी है, कि वह किसी एक खेमे में बंधकर नहीं चलता, बल्कि अपने फायदे के हिसाब से कई रास्ते खुले रखता है.
आर्मीनिया भारत के लिए क्यों अहम हो गया है?
अब बात करते हैं आर्मीनिया की, जो इस पूरी तस्वीर का दूसरा अहम हिस्सा है. पिछले कुछ सालों में भारत और आर्मीनिया के रिश्ते तेजी से गहरे हुए हैं, खासकर रक्षा क्षेत्र में. भारत आर्मीनिया को हथियार और रक्षा उपकरण देता है, जिससे दोनों देश एक दूसरे के लिए अहम रक्षा साझेदार बन गए हैं. लेकिन आर्मीनिया का महत्व सिर्फ रक्षा तक सीमित नहीं है.
आर्मीनिया दक्षिण कॉकस में स्थित है, जो यूरोप, पश्चिम एशिया और मध्य एशिया के बीच एक अहम जंक्शन बनता जा रहा है. यहां अजरबैजान, तुर्किए, ईरान और रूस जैसे देशों के हित कभी टकराते हैं तो कभी आपस में जुड़ते भी हैं.
भारत के लिए आर्मीनिया के साथ अच्छे रिश्ते इसलिए जरूरी हैं क्योंकि नई दिल्ली दक्षिण कॉकस में अपनी मौजूदगी बढ़ाना चाहती है. सबसे खास बात यह है कि भारत, ईरान और आर्मीनिया के बीच तीनों मिलकर काम करने की जमीन पहले से ही तैयार है.
चाबहार से यूरोप तक नया रास्ता बनाने की तैयारी?
चाबहार बंदरगाह, इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और आर्मीनिया की 'क्रॉसरोड्स ऑफ पीस' योजना को जोड़ने पर पहले भी तीनों देशों के बीच बातचीत हो चुकी है. अगर इसे नक्शे पर देखें तो एक नया रास्ता दिखता है, भारत से ईरान, फिर आर्मीनिया, फिर दक्षिण कॉकस और वहां से यूरोप और मध्य एशिया तक. यह सिर्फ सड़क, रेल या बंदरगाह की बात नहीं है, बल्कि भारत के प्रभाव को बढ़ाने की एक बड़ी योजना है.
मध्य एशिया में क्यों बढ़ा रहा भारत अपना फोकस?
अब सवाल उठता है कि इसमें किर्गिस्तान कहां फिट बैठता है. दरअसल भारत पिछले कुछ सालों से मध्य एशिया को अपनी विदेश नीति में ज्यादा तवज्जो दे रहा है. इस क्षेत्र के पांच देशों, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते लगातार बढ़ रहे हैं.
किर्गिस्तान में पीएम मोदी की मौजूदगी इसी बड़ी योजना का हिस्सा है. मध्य एशिया भारत के लिए ऊर्जा, कनेक्टिविटी, सुरक्षा और व्यापार, चारों नजरिए से बेहद अहम है. अफगानिस्तान की स्थिति, आतंकवाद, कट्टरपंथ, चीन की बढ़ती मौजूदगी और रूस के साथ बदलते समीकरणों ने इस पूरे इलाके की अहमियत और बढ़ा दी है.
चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत की रणनीति क्या है?
इस पूरी कहानी में चीन का जिक्र भी जरूरी है. चीन अपनी बेल्ट एंड रोड परियोजना के जरिए मध्य एशिया से लेकर पाकिस्तान और मध्य पूर्व तक अपना असर बढ़ा चुका है. पाकिस्तान चीन का करीबी साथी है. ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि वह इस पूरे इलाके में अपने रिश्ते और विकल्प मजबूत रखे. लेकिन भारत का तरीका चीन जैसा सिर्फ निर्माण और निवेश तक सीमित नहीं है.
भारत का मॉडल कनेक्टिविटी, रक्षा, डिप्लोमेसी और विकास साझेदारी को मिलाकर बना है. ईरान के साथ चाबहार, आर्मीनिया के साथ रक्षा सहयोग और मध्य एशिया के साथ रणनीतिक जुड़ाव, ये सभी अलग-अलग नीतियां नहीं हैं, बल्कि इन्हें साथ में देखने पर भारत की बड़ी योजना साफ नजर आती है.
क्या ‘मक्का गैंग’ के जवाब में भारत बनाएगा अपना गठबंधन?
तो क्या भारत सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के इस नए समझौते के जवाब में कोई अपना गठबंधन बनाएगा. फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा है. भारत की ताकत शायद इसी में है कि वह किसी गुट में शामिल होने के बजाय जरूरत के हिसाब से अलग-अलग देशों से साझेदारी करता है. अमेरिका से रक्षा और तकनीक, रूस से रक्षा और ऊर्जा, ईरान से कनेक्टिविटी, आर्मीनिया से रक्षा सहयोग और मध्य एशिया से रणनीतिक जुड़ाव, भारत एक साथ कई दिशाओं में अपने हित साध रहा है. यही आजाद विदेश नीति आज भारत की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है.
यह भी पढ़ें: 'अंतहीन युद्ध से युद्ध के अंत की ओर बढ़ें', बिश्केक में पुतिन से मिलकर बोले पीएम मोदी
बिश्केक से भारत ने दिया क्या बड़ा संदेश?
इसलिए बिश्केक की इन मुलाकातों को अलग-अलग घटनाएं मानना शायद सही नहीं होगा. ईरान से बातचीत पश्चिम एशिया के लिए संकेत है, आर्मीनिया से बातचीत दक्षिण कॉकस के लिए संकेत है और किर्गिस्तान से जुड़ाव मध्य एशिया के लिए संकेत है. इन तीनों को साथ जोड़कर देखा जाए तो साफ पता चलता है कि भारत अब सिर्फ दुनिया में हो रही घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रह गया है, बल्कि वह खुद अपने लिए नए रास्ते और मौके तैयार कर रहा है.
पीएम मोदी की किर्गिस्तान यात्रा के दौरान ईरान, आर्मीनिया और किर्गिस्तान के नेताओं से हुई मुलाकातें भारत की बड़ी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं. यह उस समय हो रहा है जब सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच एक नया रक्षा समझौता हुआ है. भारत इस समझौते का जवाब किसी गठबंधन से नहीं, बल्कि ईरान के चाबहार बंदरगाह, आर्मीनिया के साथ रक्षा सहयोग और मध्य एशिया के साथ बढ़ते रिश्तों के जरिए दे रहा है. भारत, ईरान और आर्मीनिया मिलकर एक नया कनेक्टिविटी रास्ता भी तैयार कर सकते हैं, जो यूरोप और मध्य एशिया तक जाएगा. यह सब भारत की आजाद और संतुलित विदेश नीति को दिखाता है.
aajtak.in