अमेरिका और कनाडा कभी बेहद करीबी सहयोगी माने जाते थे, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के दौर में दोनों देशों के रिश्तों में तल्खी लगातार बढ़ी है. पहले ट्रंप ने कनाडा के पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो पर निशाना साधा. अब मौजूदा प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ भी उनका टकराव जारी है. ट्रंप की एक AI-जेनरेटेड मीम ने इस विवाद को फिर सुर्खियों में ला दिया है.
तस्वीर में ट्रंप अमेरिका की हॉकी जर्सी पहनकर बर्फ पर खड़े हैं. कनाडा की जर्सी पहने कार्नी नीचे गिरे नजर आते हैं. इस पर लिखा है, "उठो, गवर्नर, नहीं तो तुम पूरा खेल हार जाओगे!" यह सिर्फ एक मीम नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच चल रही आर्थिक और राजनीतिक रस्साकशी का प्रतीक बन गया.
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ट्रंप कनाडा को 51वां राज्य क्यों कहते हैं?
ट्रंप लंबे समय से कनाडा को अमेरिका का '51वां राज्य' बताते रहे हैं. कार्नी कनाडा के प्रधानमंत्री हैं, लेकिन ट्रंप उन्हें 'गवर्नर कार्नी' कहकर संबोधित करते हैं. इसके पीछे राजनीतिक संदेश साफ है- ट्रंप कनाडा की स्वतंत्र पहचान और अमेरिकी निर्भरता के मुद्दे को एक साथ निशाना बनाते हैं. यानी जिस व्यक्ति को कनाडा का प्रधानमंत्री होना चाहिए, उसे अमेरिकी राज्य का गवर्नर बताकर ट्रंप उसकी राजनीतिक हैसियत पर ही सवाल खड़ा करने की कोशिश करते हैं.
दोनों देशों के बीच टैरिफ विवाद इस तनाव का सबसे बड़ा आर्थिक कारण है. ट्रंप प्रशासन ने कनाडाई सामानों पर भारी टैरिफ लगाने की नीति अपनाई. इसके जवाब में कार्नी सरकार ने भी अमेरिकी कृषि उत्पादों, ऑटोमोबाइल और स्टील पर करीब 28 अरब डॉलर के जवाबी टैरिफ लगाए. इसका सीधा असर दोनों देशों के कारोबार और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है. खासकर ऑटो और स्टील सेक्टर दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए अहम हैं. लंबे समय तक टकराव रहने पर कीमतें और व्यापारिक अनिश्चितता बढ़ सकती है.
सिर्फ व्यापार नहीं, संप्रभुता का भी सवाल
विवाद का दूसरा पहलू कनाडा की संप्रभुता है. ट्रंप की '51वें राज्य' वाली बयानबाजी ने कनाडा में राष्ट्रीय गौरव और संप्रभुता का मुद्दा मजबूत किया है. कार्नी के ट्रंप को कड़ा जवाब देने से उनकी राजनीतिक लोकप्रियता बढ़ी है और विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी भी इस मुद्दे पर सरकार के साथ खड़ी दिखाई दी. ट्रंप पर कनाडाई डॉलर को लेकर भी दबाव बनाने के आरोप हैं. उनका मानना है कि कमजोर कनाडाई डॉलर से कनाडाई कंपनियों को अमेरिकी बाजार में फायदा मिलता है.
ट्रूडो से कार्नी तक क्यों जारी है टकराव?
ट्रंप की रणनीति सिर्फ मौजूदा सरकार से बातचीत तक सीमित नहीं रही. पहले ट्रूडो के साथ उनके रिश्ते लगातार खराब हुए और अब कार्नी भी उसी दबाव का सामना कर रहे हैं. कार्नी ने अमेरिकी दबाव के सामने झुकने के बजाय जवाबी टैरिफ और कड़े राजनीतिक रुख को चुना है. यही वजह है कि अमेरिका-कनाडा विवाद अब सिर्फ व्यापारिक बातचीत नहीं रह गया है. इसमें राष्ट्रीय संप्रभुता, आर्थिक हित और राजनीतिक प्रतिष्ठा तीनों जुड़े हुए हैं.
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भारत और दुनिया पर असर
अमेरिका-कनाडा टकराव बढ़ता है तो ऑटोमोबाइल, स्टील और दूसरी सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है. वैश्विक बाजारों में भी अनिश्चितता बढ़ सकती है. भारत के लिए इसमें चुनौती के साथ अवसर भी है. अगर अमेरिका कनाडा से कुछ आयात कम करता है तो भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में जगह बनने की संभावना हो सकती है.
कुल मिलाकर ट्रंप और कनाडा के बीच विवाद को सिर्फ 'ट्रंप बनाम कार्नी' की लड़ाई समझना अधूरा होगा. इसके पीछे टैरिफ, मुद्रा, व्यापार, संप्रभुता और उत्तरी अमेरिका की आर्थिक ताकत का बड़ा सवाल जुड़ा है. यही वजह है कि ट्रूडो के बाद कार्नी के साथ ट्रंप की तकरार भी दोनों देशों के रिश्तों के लिए बड़ा टेस्ट बन गई है.
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