पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा की अपनी अलग पहचान है, लेकिन आसनसोल के हीरापुर इलाके के धेनुआ गांव में होने वाली दुर्गापूजा अपनी अनोखी परंपरा के लिए खास है. दामोदर नदी के किनारे कालीकृष्ण आश्रम में यहां महालया के दिन ही आगमनी दुर्गा पूजा के दौरान सप्तमी, अष्टमी, नवमी और विसर्जन समेत प्रमुख अनुष्ठान एक ही दिन में पूरे किए जाते हैं.
स्थानीय मान्यता के मुताबिक इस विशेष पूजा की परंपरा संत तेजानंद ब्रह्मचारी से जुड़ी है. बताया जाता है कि दामोदर नदी के किनारे वर्ष 1937 में आश्रम की स्थापना हुई थी, जबकि वर्ष 1979 से यहां विशेष आगमनी दुर्गा पूजा की परंपरा को व्यापक रूप से आगे बढ़ाया गया.
क्या है पूजा की पौराणिक मान्यता
इस पूजा की सबसे बड़ी खासियत यहां की देवी प्रतिमा भी है. आम तौर पर मां दुर्गा की प्रतिमा के साथ गणेश, कार्तिक, लक्ष्मी और सरस्वती दिखाई देते हैं, लेकिन धेनुआ की इस प्रतिमा में ये स्वरूप नहीं होते. यहां मां दुर्गा के साथ उनकी दो सखियां जया और विजया तथा सिंह का स्वरूप दिखाई देता है.
स्थानीय मान्यता और पौराणिक कथा के अनुसार, जब मृत्युलोक में बीमारी और असुरों का आतंक बढ़ा था, तब मां दुर्गा स्वर्ग से धरती पर आई थीं. मां की रक्षा के लिए जया और विजया ने भी उनके साथ आने का संकल्प लिया था. इसी मान्यता के आधार से पर यहां मां के साथ जया और विजया की पूजा की जाती है.
पूजा से जुड़े नारायण दत्त बताते हैं कि यह पूजा साल में एक बार होती है और श्रद्धालु पूरे साल इसका इंतजार करते हैं. उनके मुताबिक, सप्तमी, अष्टमी, नवमी जैसी अलग-अलग तिथियों के अनुष्ठान एक ही दिन में पूरे किए जाते हैं और इसे मां का विशेष आशीर्वाद माना जाता है.
वहीं, परिमल भंडारी बताते हैं कि इस पूजा को लेकर लोगों में पूरे साल उत्साह बना रहता है. महालया के दिन यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. पूजा खत्म होने के बाद लोग अगले साल फिर इस आयोजन का इंतजार शुरू कर देते हैं. उनके मुताबिक, आसपास के इलाकों के अलावा आसनसोल, दुर्गापुर, पश्चिम और पूर्व बर्धमान, बांकुड़ा, पुरुलिया और झारखंड से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.
दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु
दामोदर नदी के किनारे पुराने शिव मंदिर के पास होने वाली यह पूजा स्थानीय आस्था और परंपरा का अनोखा संगम है. महालया के दिन पितृपक्ष की समाप्ति और देवी पक्ष की शुरुआत के साथ यहां मां दुर्गा का आगमन होता है और पूरा इलाका भक्ति के रंग में रंग जाता है.
यही वजह है कि धेनुआ की यह आगमनी दुर्गा पूजा आसनसोल ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और झारखंड तक के श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है.
अनिल गिरी