राम मंदिर ट्रस्ट ने पहली बार CEO का पद बनाया है और इस जिम्मेदारी के लिए जितेंद्र मिश्र को चुना है. जितेंद्र मिश्र वही अधिकारी हैं, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वेस्टर्न एयर कमांड की कमान संभाली थी. इस ऑपरेशन में उनकी भूमिका ने उनकी पहचान मजबूत की और उन्हें सर्वोच्च युद्ध सेवा मेडल भी मिला. अब वायुसेना से रिटायर होने के कुछ ही महीनों बाद उन्हें राम मंदिर के बढ़ते प्रशासन की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
लेकिन जितेंद्र मिश्र का चयन सिर्फ ऑपरेशन सिंदूर की वजह से नहीं हुआ. 39 साल का उनका सैन्य करियर, साफ-सुथरी पेशेवर छवि और उत्तर प्रदेश से उनका जुड़ाव भी इस फैसले को समझने की अहम कड़ियां हैं. खास बात यह है कि CEO पद के लिए शुरुआती दौर में जिन नामों की चर्चा थी, उनमें जितेंद्र मिश्र नहीं थे. 16 लोगों के इंटरव्यू के बाद तीन नामों का पैनल बना और उसमें जगह बनाने के बाद आखिरकार उन्हें राम मंदिर का पहला CEO चुना गया. तो चलिए जानते हैं, जितेंद्र मिश्र के चयन की वो तीन बड़ी वजहें, जिन्होंने उन्हें राम मंदिर के पहले CEO की जिम्मेदारी तक पहुंचाया?
ऑपरेशन सिंदूर से बनी मजबूत पहचान
जितेंद्र मिश्र के चयन की सबसे पहली वजह उनकी ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी पहचान मानी जा रही है. जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, उस समय वेस्टर्न एयर कमांड की कमान जितेंद्र मिश्र के पास थी. यानी ऑपरेशन के दौरान पश्चिमी मोर्चे पर वायुसेना की बड़ी जिम्मेदारी उनके नेतृत्व में थी.
13 मई को ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आदमपुर एयर फोर्स स्टेशन पहुंचे थे, तब जितेंद्र मिश्र ने उनका स्वागत किया था. उस समय की तस्वीरें और उनका ऑपरेशन से जुड़ा रोल सार्वजनिक चर्चा में रहा. इसी वजह से रिटायरमेंट के कुछ ही समय बाद राम मंदिर ट्रस्ट की इतनी अहम जिम्मेदारी मिलना खास माना जा रहा है. इतना ही नहीं जितेंद्र मिश्र को उनके सैन्य कार्य के लिए सर्वोच्च युद्ध सेवा मेडल भी मिला है. ऐसे में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनके नेतृत्व से बनी छवि उनके चयन की सबसे अहम कड़ी मानी जा रही है.
करीब चार दशक का सैन्य अनुभव
दूसरी बड़ी वजह है उनका लंबा सैन्य अनुभव. जितेंद्र मिश्र ने करीब चार दशक भारतीय वायुसेना में बिताए हैं. इस दौरान उन्होंने अलग-अलग अहम जिम्मेदारियां संभालीं और कई स्तरों पर कमान का अनुभव हासिल किया.
राम मंदिर अब सिर्फ एक मंदिर के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. यहां हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. मंदिर से जुड़े काम, व्यवस्थाएं, आने वाले प्रोजेक्ट और पूरे परिसर के संचालन का दायरा भी बढ़ रहा है. ऐसे में ट्रस्ट को ऐसे व्यक्ति की जरूरत है, जिसे बड़े स्तर पर व्यवस्था संभालने और अलग-अलग टीमों के साथ काम करने का अनुभव हो.
सैन्य सेवा में अनुशासन, समय पर काम पूरा करना, बड़ी टीम के साथ काम करना और मुश्किल हालात में फैसले लेना रोजमर्रा की जिम्मेदारियों का हिस्सा होता है. यही अनुभव CEO की भूमिका में भी काम आ सकता है. ट्रस्ट को उम्मीद है कि जितेंद्र मिश्र का यही प्रशासनिक और कमान का अनुभव राम मंदिर की व्यवस्था को आगे बढ़ाने में मदद करेगा.
उत्तर प्रदेश से भी है कनेक्शन
तीसरी वजह जितेंद्र मिश्र का उत्तर प्रदेश से जुड़ाव है. उनका संबंध देवरिया से है. राम मंदिर अयोध्या में है और ट्रस्ट का काम उत्तर प्रदेश से जुड़ा हुआ है. ऐसे में प्रदेश से उनका रिश्ता भी उनके चयन में एक अहम कड़ी माना जा रहा है.
एक तरफ उनके पास देश की सुरक्षा से जुड़ा लंबा अनुभव है, दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश से उनका जुड़ाव है. ट्रस्ट की इस नई व्यवस्था में दोनों चीजें उपयोगी हो सकती हैं. यही वजह है कि उनके चयन को केवल सैन्य पृष्ठभूमि से जोड़कर नहीं देखा जा रहा.
जिन नामों की चर्चा थी, उनमें जितेंद्र मिश्र नहीं थे
जितेंद्र मिश्र का नाम शुरुआत से इस दौड़ में सबसे आगे नहीं था. CEO पद को लेकर शुरुआती चर्चा में पूर्व IAS योगेश्वर राम मिश्र, पूर्व IPS राजेश पांडेय, बिहार कैडर के IPS डॉ. परेश सक्सेना और IAS दिनेश सिंह जैसे नाम सामने आए थे. जितेंद्र मिश्र उस शुरुआती चर्चा में नहीं थे.
इसके बाद ट्रस्ट ने इस पद के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ाई. कुल 16 लोगों के इंटरव्यू हुए. इन इंटरव्यू के बाद तीन नामों का पैनल तैयार किया गया. इस पैनल में जितेंद्र मिश्र भी शामिल थे. आखिरकार ट्रस्ट ने उन्हीं के नाम पर मुहर लगा दी. यानी उनका चयन अचानक सामने आए किसी नाम का फैसला नहीं था. शुरुआती चर्चा से बाहर रहने के बाद वह चयन प्रक्रिया के अंतिम चरण तक पहुंचे और फिर पहले CEO के तौर पर चुने गए.
राम मंदिर ट्रस्ट में क्यों बनाई गई CEO की पोस्ट?
राम मंदिर ट्रस्ट में CEO का पद पहली बार बनाया गया है. इसके पीछे मंदिर के काम के लगातार बढ़ते दायरे को अहम माना जा रहा है. मंदिर निर्माण के साथ अब यहां श्रद्धालुओं की व्यवस्था, मंदिर संचालन, रखरखाव, नए प्रोजेक्ट और अयोध्या के विकास से जुड़े काम भी हैं. ट्रस्ट के सामने आने वाले समय में भी कई बड़ी जिम्मेदारियां हैं. ऐसे में रोजमर्रा के प्रशासन और बड़े प्रोजेक्ट के बीच तालमेल बनाए रखना जरूरी होगा. CEO की भूमिका इसी व्यवस्था को मजबूत करने की है.
ट्रस्ट की ओर से CEO की जिम्मेदारियों को लेकर एक SOP भी तैयार की जाएगी. इसमें यह तय किया जाएगा कि CEO के पास कौन-कौन से अधिकार होंगे और उनकी जिम्मेदारी का दायरा क्या रहेगा. आगे जरूरत पड़ने पर संयुक्त CEO या डिप्टी CEO की नियुक्ति भी की जा सकती है.
चढ़ावा चोरी विवाद के बाद ट्रस्ट में बड़ा फेरबदल
CEO का यह नया पद अचानक नहीं बना, बल्कि इसके पीछे हाल के दिनों में हुआ बड़ा प्रशासनिक फेरबदल है. जून के महीने में जब मंदिर के चढ़ावे से जुड़े रुपयों में हेराफेरी का विवाद उठा, तब जांच के लिए SIT बनाई गई. मुकदमा दर्ज हुआ और आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया.
इस विवाद के तुरंत बाद ट्रस्ट की पूरी व्यवस्था बदलने लगी. जुलाई में चंपत राय और अनिल मिश्रा ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद 6 और 22 जुलाई की बैठकों में तय हुआ कि पूरे कामकाज को नए सिरे से ढाला जाए. इसी कड़ी में जगदीश आफले को पहला सचिव चुना गया, जबकि मुश्किल वक्त में कृष्ण मोहन ने अंतरिम महासचिव बनकर कमान संभाली. अब अयोध्या में 2 सितंबर को हुई बैठक में स्वामी गोविंद देव गिरि को ट्रस्ट का नया महासचिव बनाया गया. इससे उनकी भूमिका पहले से ज्यादा मजबूत हुई है. वहीं महेश भागचंदका को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई.
कृष्ण मोहन ने अंतरिम महासचिव के तौर पर मुश्किल दौर में ट्रस्ट का काम संभाला. गोविंद देव गिरि ने भी उनके काम की सराहना की. उन्होंने कहा कि अब नियमित महासचिव की जिम्मेदारी तय करने का समय आ गया है.
इसी बैठक में ट्रस्ट में तीन नए सदस्यों को भी शामिल किया गया. शिकोहाबाद की डॉ. निर्मला यादव, अयोध्या के मदन मोहन पांडेय और दिल्ली के महेश भागचंदका अब ट्रस्ट का हिस्सा हैं. डॉ. निर्मला यादव ट्रस्ट की पहली महिला सदस्य बनी हैं. वहीं, मदन मोहन पांडेय रामलला की ओर से राम जन्मभूमि मामले में अदालत में कानूनी लड़ाई लड़ चुके हैं. जबकि महेश भागचंदका का संबंध अशोक सिंघल के परिवार से बताया जाता है.
सेना जैसा अनुशासन, मंदिर में भरोसा बनाए रखने की कोशिश?
जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति को इसी पूरे बदलाव के संदर्भ में भी देखा जा रहा है. राम मंदिर ट्रस्ट अब अपने प्रशासन को ज्यादा व्यवस्थित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. ऐसे समय में करीब 40 साल की सैन्य सेवा वाले व्यक्ति को पहला CEO बनाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि ट्रस्ट प्रशासन में अनुशासन और बेहतर प्रबंधन को प्राथमिकता देना चाहता है.
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नेतृत्व, लंबा सैन्य अनुभव और उत्तर प्रदेश से जुड़ाव, ये तीनों बातें जितेंद्र मिश्र के चयन की कहानी को समझने में अहम हैं. अब असली परीक्षा यह होगी कि वायुसेना में बड़े ऑपरेशन संभालने का उनका अनुभव राम मंदिर जैसी बड़ी और लगातार बढ़ती व्यवस्था को चलाने में कितना काम आता है.
aajtak.in