त्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में विधान परिषद (MLC) के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव की वोटिंग संपन्न होने के बाद सबकी निगाहें नतीजे पर टिकी हुई हैं. बिहार की 8 सीटों पर 150 प्रत्याशी और यूपी की 11 एमएलसी सीटों पर 152 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला मंगलवार को होगा, जिसके लिए मतगणना शुरू हो गई है और नतीजे देर शाम तक आएंगे.
विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनावों की मतगणना की प्रक्रिया लोकसभा और विधानसभा चुनाव से काफी अलग होती है. एमएलसी चुनाव में आम तौर पर उम्मीदवार को केवल सबसे ज्यादा वोट मिलने से जीत नहीं मिलती, बल्कि वोटिंग के वरीयता क्रम और एक निश्चित कोटा के आधार पर जीत-हार तय होती है.
आम चुनाव (विधानसभा या लोकसभा) में ईवीएम की बटन दबाई जाती है और काउंटिंग के दौरान मशीन का बटन दबते ही सेकंडों में नतीजा सामने आ जाता है, लेकिन एमएलसी चुनाव की बात ही अलग है. ऐसे में फिर आखिर कैसे होती है शिक्षक और स्नातक विधान परिषद चुनाव के वोटों की गिनती? कैसे तय होता है 'कोटा' और क्या है वरीयता मत का पूरा गणित, जिससे हार-जीत तय होती है?
विधान परिषद चुनाव में भी आम चुनाव की तरह ही उम्मीदवार खड़े होते हैं, लेकिन इसमें मतदाताओं की संख्या कम होती है. इसमें ब्लॉक स्तर तक बूथ बनाए जाते हैं, लोकसभा और विधानसभा की तरह हर इलाके में बूथ नहीं बनाए जाते हैं. दूसरे चुनावों से इसकी वोटिंग प्रक्रिया भी अलग होती है. इसमें बैलेट पेपर से वोटिंग होती है और वरीयता (प्राथमिकता) के आधार पर वोट दिए जाते हैं.
मतदाता को अगर किसी प्रत्याशी को वोट डालना है, तो बूथ स्थल पर मौजूद विशेष पेन से कैंडिडेट के नाम के सामने '1' लिखना होता है. इसके बाद अगर वह किसी अन्य प्रत्याशी को भी वोट देना चाहता है, तो उसके सामने '2' लिखना होगा और इसी तरह तीसरी वरीयता दर्शाने के लिए बैलेट पेपर पर '3' इंडिकेट करना होता है.
शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में तय मतदाता को अपनी पहली, दूसरी और तीसरी वरीयता के अनुसार वोट करना होता है. पहली वरीयता के लिए वोट का कोटा तय होता है. यदि कोई उम्मीदवार पहली वरीयता का तय वोट पा लेता है, तो वह चुनाव जीत जाता है. यदि किसी उम्मीदवार को निर्धारित कोटे से अधिक प्रथम वरीयता के वोट मिलते हैं, तो उसके अतिरिक्त वोट उसकी दूसरी वरीयता के आधार पर अन्य उम्मीदवारों में बांट दिए जाते हैं.
एमएलसी चुनाव में ईवीएम की जगह बैलेट पेपर (बैलट पत्र) का इस्तेमाल होता है. वोटिंग के बाद सभी मतपेटियों को मतगणना केंद्र पर लाया जाता है.
मतगणना के लिए सभी बूथों की मतपेटियों के बैलेट पेपर एक बड़े ड्रम या टेबल पर आपस में मिला दिए जाते हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि यह पता न चल सके कि किस क्षेत्र या बूथ के लोगों ने किस प्रत्याशी को कितना वोट दिया है. इसके बाद 25-25 या फिर 50-50 बैलेट पेपरों के बंडल बनाए जाते हैं.
मतगणना के लिए पहले अवैध मतों को छांटने का काम किया जाता है. अगर किसी ने पेन की जगह पेंसिल का इस्तेमाल कर दिया, 1-2 अंक सही से नहीं लिखे या एक से ज्यादा उम्मीदवारों के आगे '1' लिख दिया, तो वो वोट अवैध घोषित कर दिया जाता है.
इसके बाद मुख्य मतगणना की प्रक्रिया शुरू की जाती है. मतगणना में सबसे पहले बैलेट पेपर में पहली वरीयता के वोटों की गिनती की जाती है. प्रत्येक उम्मीदवार के खाते में उसके पक्ष में दर्ज अंक '1' वाले वैध मतपत्रों की संख्या जोड़ी जाती है. ऐसे में कुल वैध मतों और भरी जाने वाली सीटों की संख्या के अनुसार जीतने के लिए आवश्यक कोटा तय किया जाता है.
एमएलसी चुनाव में जीत दर्ज करने के लिए सबसे ज्यादा वोट पाना ही काफी नहीं होता, बल्कि एक निश्चित 'कोटा' हासिल करना अनिवार्य होता है. यह कोटा निर्वाचन क्षेत्र में पड़े कुल वैध वोटों के आधार पर तय किया जाता है.
इसके लिए कुल वैध वोटों को 2 से विभाजित करके उसमें 1 जोड़ा जाता है. उदाहरण के तौर पर, यदि किसी विधान परिषद के निर्वाचन क्षेत्र में कुल 20 हजार वैध वोट पड़े हैं, तो जीतने के लिए कम से कम 10,001 वोट हासिल करने होंगे:
यानी इस प्रणाली के तहत उम्मीदवार को विजयी घोषित होने के लिए निर्धारित कोटा प्राप्त करना जरूरी है. यदि किसी उम्मीदवार को पहली गिनती में ही निर्धारित 'कोटा' के बराबर या उससे ज्यादा वोट मिल जाते हैं, तो उसे उसी समय विजेता घोषित कर दिया जाता है.
अगर पहले दौर की गिनती के बाद भी कोई प्रत्याशी 'कोटा' तक नहीं पहुंच पाता, तो फिर मुकाबला और दिलचस्प होने के साथ-साथ पेचीदा हो जाता है. इसके बाद अगली प्रक्रिया अपनाई जाती है.
एलिमिनेशन और वोटों के ट्रांसफर की प्रक्रिया
एमएलसी चुनाव में जब कोई भी प्रत्याशी प्रथम वरीयता के आधार पर कोटा हासिल नहीं कर पाता, तब सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम, लागू होता है. इस प्रक्रिया में सबसे कम प्रथम वरीयता पाने वाले प्रत्याशी को दौड़ से बाहर कर दिया जाता है. बाहर हुए प्रत्याशी के वोटों के बैलेट पेपर निकाले जाते हैं और देखा जाता है कि उन मतदाताओं ने द्वितीय वरीयता ('2' नंबर) का वोट किसे दिया है.
इसके बाद उन बैलेट पेपरों के '2' नंबर वाले वोट संबंधित बाकी उम्मीदवारों के खाते में जोड़ दिए जाते हैं. वोट जोड़ने के बाद फिर देखा जाता है कि क्या कोई प्रत्याशी 'कोटा' तक पहुंचा; अगर नहीं, तो फिर से सबसे कम वोट पाने वाले अगले उम्मीदवार को बाहर किया जाता है और उसके '2' या '3' नंबर के वोट बाकी प्रत्याशियों में ट्रांसफर किए जाते हैं.
यह प्रक्रिया तब तक चलती है, जब तक सभी सीटों के लिए उम्मीदवार निर्वाचित न हो जाएं या लागू निर्वाचन नियमों के अनुसार परिणाम तय न हो जाए.
फिर नतीजा कब और कैसे आता है?
यह एलिमिनेशन और वोट ट्रांसफर का सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक या तो कोई उम्मीदवार निर्धारित 'कोटा' हासिल न कर ले, या फिर मैदान में बाकी बचे उम्मीदवारों को पछाड़कर आखिर में केवल एक प्रत्याशी शेष न रह जाए. इसी कारण स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की काउंटिंग की प्रक्रिया काफी लंबी चलती है और काफी समय लगता है.
वरीयता के आधार पर काउंटिंग क्यों?
असल में शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या कम होती है, जिस वजह से वोटिंग भी कम होती है. ऐसे में निष्पक्षता के लिए यह प्रक्रिया अपनाई गई है. यदि प्रथम वरीयता में उम्मीदवार विजयी नहीं हुआ तो फिर दूसरी वरीयता तक की काउंटिंग होती है और उसमें भी फैसला नहीं हुआ तो फिर तीसरी वरीयता की काउंटिंग की जाती है.
एमएलसी चुनाव में सबसे खास बात होती है कि वोटर वरीयता के आधार पर वोट करते हैं और काउंटिंग भी उसी के आधार पर होती है. नतीजे भी उसी आधार पर तय होते हैं.
कुबूल अहमद