मिल्कीपुर सीट के समीकरणों में ऐसा क्या है जो उपचुनाव टलने पर सपा फ्रंटफुट पर खेल रही है?

मिल्कीपुर विधानसभा सीट के लिए उपचुनाव टलने पर सपा आक्रामक हो गई है. फैजाबाद जिले की मिल्कीपुर विधानसभा सीट के समीकरणों में ऐसा क्या है जो सपा फ्रंटफुट पर आ गई है?

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अखिलेश यादव (फाइल फोटो) अखिलेश यादव (फाइल फोटो)

बिकेश तिवारी

  • नई दिल्ली,
  • 16 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 12:19 PM IST

उत्तर प्रदेश की 10 विधानसभा सीटें रिक्त हैं. इन 10 में से 9 सीटों के लिए उपचुनाव कार्यक्रम का ऐलान चुनाव आयोग ने कर दिया है लेकिन एक सीट बाकी रह गई- अयोध्या की मिल्कीपुर. मिल्कीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव अभी नहीं कराने के फैसले के पीछे चुनाव आयोग ने पूर्व विधायक और 2022 के चुनाव में इस सीट से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के उम्मीदवार रहे पूर्व विधायक बाबा गोरखनाथ की ओर से हाईकोर्ट में दायर याचिका पेंडिंग होने का तर्क दिया गया है. इसे लेकर समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस ने बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए चुनाव आयोग पर भी निशाना साधा है.

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सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शायराना पोस्ट करते लिए कहा है, "जिसने जंग टाली है, समझो उसने जंग हारी है." वहीं, सपा प्रवक्ता फकरुल हसन चांद ने चुनाव आयोग की ओर दिया गया तर्क खारिज करते हुए आरोप लगाया है कि वह बीजेपी के पक्ष में काम कर रहा है. उन्होंने कानपुर की सीसामऊ सीट का मामला भी कोर्ट में होने का जिक्र करते हुए कहा कि इरफान सोलंकी ने अपनी सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी है और ये याचिका भी अभी पेंडिंग है लेकिन चुनाव आयोग ने इस सीट पर उपचुनाव का ऐलान कर दिया है. सपा प्रवक्ता ने चुनाव आयोग पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया है. वहीं, यूपी कांग्रेस ने बीजेपी को निशाने पर लिया है.

यूपी कांग्रेस के प्रवक्ता अंशु अवस्थी ने कहा है कि एक देश एक चुनाव का राग अलापने वाली बीजेपी उपचुनाव भी एक साथ नहीं करा पाई. मिल्कीपुर में साथ चुनाव न कराकर बीजेपी ने लोकतंत्र और संविधान की हत्या की है. उन्होंने इसे अयोध्या का अपमान बताते हुए कहा कि लोगों का मतदान का मौलिक अधिकार छीना गया है. मिल्कीपुर की जनता बीजेपी को बड़ी हार देकर इसका हिसाब करेगी. मिल्कीपुर विधानसभा सीट अवधेश प्रसाद के इस्तीफे से रिक्त हुई है जो हालिया लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट से सांसद चुने गए थे. सपा से लेकर कांग्रेस तक, मिल्कीपुर सीट पर अभी उपचुनाव नहीं कराने के फैसले को लेकर हमलावर हो गई हैं.

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मिल्कीपुर विधानसभा क्षेत्र में सीएम योगी से लेकर बीजेपी के तमाम बड़े नेताओं के कार्यक्रम भी हो चुके हैं. ऐसे में बात सीएम योगी के इस सीट को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लेने से लेकर सामाजिक समीकरणों तक की हो रही है. सवाल उठ रहे हैं कि मिल्कीपुर सीट के समीकरणों में ऐसा क्या है जो उपचुनाव टलने को लेकर सपा और कांग्रेस अब फ्रंटफुट पर आ गए हैं? इसे चार पॉइंट में समझा जा सकता है.

1- बीजेपी के लिए टफ सपा का गढ़

मिल्कीपुर विधानसभा सीट के पिछले चुनाव नतीजे देखें तो यह सीट बीजेपी के लिए टफ नजर आती है. बीजेपी मिल्कीपुर सीट के लिए हुए पांच चुनावों में महज एक बार ही विजय पा सकी है. चार बार उसे शिकस्त का सामना करना पड़ा है. शायद यही वजह है कि सीएम योगी ने पार्टी की सबसे टफ सीटों में से एक मिल्कीपुर के उपचुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है. यह सीट सपा का गढ़ रही है और पार्टी के उम्मीदवार पांच में से तीन चुनावों में मिल्कीपुर से जीते हैं. बसपा के खाते में भी मिल्कीपुर सीट एक बार आई है.

2- जातीय समीकरण सपा के मुफीद

मिल्कीपुर विधानसभा सीट के जातीय समीकरणों की बात करें तो यह सपा के मुफीद है. इस विधानसभा क्षेत्र में अनुमानों के मुताबिक करीब 36 फीसदी सामान्य वर्ग के मतदाता हैं. यहां ओबीसी वर्ग के 34, अनुसूचित जाति के 20 फीसदी और 9 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं. जातीय आधार पर देखें तो 2022 के विधानसभा चुनाव में मिल्कीपुर विधानसभा क्षेत्र में कुल 3 लाख 69 हजार मतदाता थे.

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अनुमानों के मुताबिक इस विधानसभा क्षेत्र में करीब 60 हजार ब्राह्मण, 55-55 हजार यादव और पासी, 30 हजार मुस्लिम, 25 हजार ठाकुर मतदाता हैं. यादव और मुस्लिम सपा के परंपरागत वोटर माने जाते हैं और पासी जाति का भी समर्थन पार्टी की जीत की संभावनाएं बढ़ा देता है.

3- मिल्कीपुर में उपचुनाव की हिस्ट्री

मिल्कीपुर विधानसभा सीट 2008 के परिसीमन के बाद सुरक्षित हो गई थी. 2007 के यूपी चुनाव तक यह सीट सामान्य थी. इस सीट पर उपचुनावों का इतिहास देखें तो ऐसा दो बार हुआ है और दोनों ही बार सपा उम्मीदवारों को जीत मिली है. 1998 में फैजाबाद सीट से सांसद चुने जाने के बाद मित्रसेन यादव के इस्तीफे से रिक्त हुई मिल्कीपुर सीट पर पहली बार उपचुनाव हुए थे.

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इस पहले उपचुनाव में सपा के रामचंद्र यादव विधायक निर्वाचित हुए थे. इस सीट पर दूसरी बार उपचुनाव की नौबत 2004 में आई जब आनंद सेन यादव ने विधायकी से इस्तीफा देकर बसपा का दामन थाम लिया था. तब हुए उपचुनाव में भी जीत सपा के ही हाथ लगी और उम्मीदवार रामचंद्र यादव ही थे. मिल्कीपुर सीट पर उपचुनाव में सपा की जीत का ट्रेंड रहा है और पार्टी अब तक इस सीट पर एक भी उपचुनाव नहीं हारी है.

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4- मोरल एज की फाइट

मिल्कीपुर उपचुनाव के बहाने एक लड़ाई मोरल एज की भी लड़ी जा रही है. फैजाबाद लोकसभा सीट पर हार के बाद सपा नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल हाई है. सपा उपचुनाव में भी बीजेपी को शिकस्त देकर मोरल एज लेने की कोशिश में है और बीजेपी भी लोकसभा चुनाव का बदला लेकर यह साबित करने के लिए जोर लगा रही है कि आम चुनाव के नतीजे महज तुक्का थे.

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