मेले में रंग-बिरंगे झूले देखकर आपके मन में भी कभी न कभी सवाल आया होगा कि आखिर इन्हें लगाने और चलाने वालों की कमाई कितनी होती है? सोशल मीडिया पर इन दिनों झूला संचालक की कमाई से जुड़ा एक वीडियो चर्चा में है. इसमें झूले के कारोबार का ऐसा गणित बताया गया कि लोग कहने लगे कि यह तो लाखों रुपये कमाने वाला बिजनेस है. हालांकि, टिकट से होने वाली पूरी बिक्री को सीधे मुनाफा मानना सही नहीं है.
40 लाख तक की लागत, 70-80 लोग एक बार में
वायरल वीडियो में 'dhandhaonground' नाम के इंस्टाग्राम प्रोफाइल से झूले के कारोबार को लेकर जानकारी साझा की गई. इसमें झूला संचालक ने बताया कि एक बड़े नाव वाले झूले को तैयार करने में करीब 40 लाख रुपये तक की लागत आ सकती है. इस झूले पर एक बार में करीब 70 से 80 लोग बैठ सकते हैं.
अब कमाई का गणित समझिए. संचालक के मुताबिक, एक दिन में करीब 1,000 से 1,500 लोग झूले पर बैठते हैं. अगर एक व्यक्ति से टिकट के लिए 100 रुपये लिए जाएं तो 1,000 लोगों पर 1 लाख रुपये की टिकट बिक्री होती है. 1,500 लोग बैठें तो यही रकम करीब 1.5 लाख रुपये तक पहुंच सकती है.
यानी सिर्फ टिकट बिक्री का हिसाब देखें तो एक झूले से रोजाना लाखों रुपये का कारोबार संभव नजर आता है. लेकिन यहीं एक बड़ा सवाल है- क्या ये पूरी रकम झूला संचालक की कमाई है?
क्या सच में इतनी कमाई होती है
वायरल वीडियो में मेले लोगों ने इस दावे पर सवाल उठाया. इसमें मेले में झूले लगाने के किराये का जिक्र नहीं है. इसके अलावा बिजली, कर्मचारियों की मजदूरी, डीजल, ट्रांसपोर्ट, झूले की मरम्मत और मेंटेनेंस जैसे खर्च भी होते हैं. झूला संचालक कई बार अलग-अलग शहरों के मेलों और धार्मिक आयोजनों में अपना पूरा सेटअप लेकर जाते हैं. ऐसे में एक जगह से दूसरी जगह मशीनरी पहुंचाने का खर्च भी कारोबार का अहम हिस्सा है.
2 लाख की बिक्री का मतलब 2 लाख मुनाफा नहीं
मान लीजिए किसी दिन झूले की टिकट बिक्री 2 लाख रुपये हुई. इसका मतलब यह नहीं कि संचालक ने 2 लाख रुपये कमा लिए. इसमें से मेले की जगह का किराया, बिजली, स्टाफ, ट्रांसपोर्ट, ईंधन, मरम्मत और दूसरे ऑपरेशनल खर्च घटेंगे. इसके बाद जो रकम बचेगी, वही वास्तविक कमाई या मुनाफे के करीब होगी.
यही वजह है कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले 'झूला वाला रोज लाखों कमाता है' जैसे दावों को सिर्फ टिकट के गणित से नहीं समझा जा सकता. झूले का कारोबार देखने में जितना आसान लगता है, उसका असली बिजनेस मॉडल उतना ही बड़ा है. इसमें भारी शुरुआती निवेश, लगातार खर्च और मेले की भीड़-भाड़, टिकट रेट और आयोजन की अवधि जैसे कई फैक्टर कमाई तय करते हैं.
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