जैसे ही एयरप्लेन रनवे पर पहुंचता है, एक अनाउंसमेंट लगभग हर फ्लाइट में सुनाई देता है- 'कृपया अपने मोबाइल फोन को Airplane Mode पर कर लें'. कई लोग बिना सोचे ऐसा कर देते हैं, जबकि कुछ के मन में सवाल आता है कि आज के 5G और AI वाले दौर में भी इसकी जरूरत क्यों है?
अगर कोई ऐसा नहीं करता तो क्या विमान को खतरा हो सकता है? इस सवाल का जवाब उतना सीधा नहीं है, जितना सोशल मीडिया पर बताया जाता है.
एयरप्लेन मोड में फोन में क्या बदलाव होता है?
सबसे पहले यह समझिए कि स्मार्टफोन का एयरप्लेन मोड आपके फोन का सेल्यूलर रेडियो बंद कर देता है. यानी फोन मोबाइल टावर से संपर्क करने की कोशिश नहीं करता.
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हालांकि Wi-Fi और ब्लूटूथ को जरूरत पड़ने पर बाद में दोबारा चालू किया जा सकता है. यही वजह है कि आज कई फ्लाइट्स में एयरप्लेन मोड ऑन होने के बाद भी इन-फ्लाइट Wi-Fi इस्तेमाल किया जा सकता है.
यही सेल्यूलर सिग्नल असली वजह है. जब एयरप्लेन उड़ान भर रहा होता है या लैंड कर रहा होता है, तब वह जमीन के सबसे करीब होता है. अगर बड़ी संख्या में फोन नॉर्मल मोड में रहें, तो वे लगातार आसपास के मोबाइल टावर से कनेक्ट होने की कोशिश करते हैं.
रिस्क नहीं लेना चाहती इंडस्ट्री
इससे रेडियो फ्रीक्वेंसी का शोर बढ़ सकता है. मॉडर्न विमान ऐसे सिग्नल झेलने के लिए डिजाइन किए जाते हैं, लेकिन एविएशन इंडस्ट्री सिक्योरिटी के मामले में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती.
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क्या एक फोन से विमान क्रैश हो सकता है? जवाब है नहीं. ऐसा कोई सबूत नहीं है कि सिर्फ एक यात्री का फोन विमान गिरा सकता है. FAA और EASA जैसी एजेंसियों ने भी माना है कि मॉडर्न विमान इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से होने वाली ज्यादातर इंटरफेरेंस को संभाल सकते हैं.
यही वजह है कि आज कई देशों में एयरप्लेन मोड के साथ पूरे सफर में फोन इस्तेमाल करने की परमिशन है.
फिर नियम अब भी क्यों है?
क्योंकि एविएशन में सोच हमेशा 'Better Safe Than Sorry' वाली होती है. टेक्नोलॉजी जितनी भी आगे बढ़ जाए, उड़ान के सबसे अहम चरण फेज यानी टेकऑफ और लैंडिंग के दौरान किसी भी तरह का एक्स्ट्रा रेडियो इंटरफेरेंस ऐक्सेप्ट नहीं किया जाता.
अगर सैकड़ों फोन एक साथ नेटवर्क सर्च लगें, तो पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोल के बीच रेडियो कम्युनिकेशन में हल्का शोर या 'बज़' जैसी आवाज आ सकती है. यह खतरनाक नहीं माना जाता, लेकिन इंपॉर्टेंट बातचीत के दौरान ऐसी दिक्कत कोई नहीं चाहता.
पुराने विमान हो सकते हैं प्रभावित
पिछले कुछ सालों में 5G नेटवर्क को लेकर भी यह बहस हुई थी. अमेरिका में FAA ने कुछ समय के लिए चेतावनी जारी की थी कि 5G C-Band सिग्नल कुछ पुराने विमान के रेडियो ऑल्टीमीटर को प्रभावित कर सकते हैं.
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रेडियो ऑल्टीमीटर वही सिस्टम है जो विमान को जमीन से सटीक ऊंचाई बताता है, खासकर खराब मौसम में लैंडिंग के दौरान. बाद में एयरक्राफ्ट और टेलीकॉम कंपनियों ने मिलकर कई बदलाव किए, लेकिन इस घटना ने दिखाया कि रेडियो फ्रीक्वेंसी और एविएशन के बीच संतुलन कितना महत्वपूर्ण है.
दिलचस्प बात यह है कि यूरोप में कई एयरलाइंस अब ऐसे टेक इस्तेमाल कर रही हैं, जहां विमान के अंदर ही मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जाती है. वहां एयरलाइन पहले यह मेक श्योर करती है कि विमान के सिस्टम पर इसका कोई असर न पड़े. यानी तकनीक मौजूद है, लेकिन फैसला एयरलाइन और रेगुलेटर की सुरक्षा जांच पर निर्भर करता है.
एक और वजह है जिसे लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. टेकऑफ और लैंडिंग को एविएशन की क्रिटिकल फेज ऑफ फ्लाइट माना जाता है. अगर इस दौरान कोई इमरजेंसी हो जाए, तो यात्रियों का क्रू की अनाउंसमेंट सुनना और तुरंत निर्देश मानना जरूरी होता है. इसलिए भी एयरलाइंस चाहती हैं कि पैसेंजर्स का ध्यान फोन की बजाय सेफ्टी पर रहे.
आजतक टेक्नोलॉजी डेस्क