रूस और यूक्रेन के बीच जमीन पर चल रहे युद्ध का असर अब अंतरिक्ष तक पहुंच गया है. रूसी सैन्य सैटेलाइट कॉसमॉस-2612 ने अपनी कक्षा बार-बार बदलकर अमेरिकी पंजीकृत व्यावसायिक रडार इमेजिंग सैटेलाइट ICEYE-X36 के बेहद करीब पहुंचने की कोशिश की है. यह सैटेलाइट यूक्रेन को रडार डेटा उपलब्ध कराता है. लगभग 550 किलोमीटर की ऊंचाई पर दोनों सैटेलाइटों के बीच की दूरी कुछ किलोमीटर या उससे भी कम हो गई है, जो अंतरिक्ष में बहुत खतरनाक माना जाता है.
खगोलशास्त्री और टीयू डेल्फ्ट के लेक्चरर मार्को लैंगब्रुक के अनुसार 17 अक्टूबर 2026 की देर शाम तक दोनों सैटेलाइट महज 1-2 किलोमीटर दूर थे. अगर उनकी मौजूदा कक्षाएं जारी रहीं तो वे कुछ मीटर के भीतर भी आ सकते थे.
लीओलैब्स जैसी ट्रैकिंग कंपनियों ने भी पुष्टि की कि रूसी सैटेलाइट जानबूझकर ICEYE-X36 की ओर बढ़ रहा है. एक दिन पहले दूरी सैकड़ों किलोमीटर थी, जो अचानक घटकर कुछ किलोमीटर रह गई. पृथ्वी की निचली कक्षा में सैटेलाइट करीब 27358 km/hr की रफ्तार से घूमते हैं. इतनी नजदीकी असामान्य और जोखिम भरी है.
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अभी तक 18 अक्टूबर सुबह तक किसी हमले की पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन विशेषज्ञ इसे बिना सहमति के रेंडेवू एंड प्रॉक्सिमिटी ऑपरेशन (आरपीओ) मान रहे हैं. यह पहली बार है जब दो एक्टिव सैटेलाइटों के बीच इतना करीबी मिलन एक पक्ष की अनुमति के बिना हुआ हो.
रूसी सैटेलाइट की गतिविधियां
कॉसमॉस-2612 समेत कई रूसी सैटेलाइट अप्रैल 2026 में लॉन्च हुए थे. मई में इनमें से कई ने अपनी कक्षा बदलकर ICEYE-X36 के साथ लगभग एक ही प्लेन में आ गए थे. अक्टूबर में कॉसमॉस-2612 ने और सटीक मैन्यूवर किए. उसने ऊंचाई बढ़ाई, इंतजार किया और फिर नीचे उतरकर लक्ष्य के करीब पहुंच गया. इसमें काफी ईंधन खर्च हुआ, जो साबित करता है कि यह आकस्मिक नहीं बल्कि योजनाबद्ध कदम था.
रूसी सैटेलाइट अब ऐसी स्थिति में है जहां से वह जासूसी कर सकता है, सिग्नल जाम कर सकता है, लेजर से सेंसर खराब कर सकता है या यहां तक कि भौतिक हमला भी कर सकता है. रूस की मंशा स्पष्ट नहीं है, लेकिन यूक्रेन को मदद पहुंचाने वाले सैटेलाइट को निशाना बनाना सैन्य रणनीति का हिस्सा लग सकता है.
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आईसीईवाईई एक फिनिश-अमेरिकी कंपनी है. इसका एक्स36 सैटेलाइट सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) तकनीक से बादल और अंधेरे में भी पृथ्वी की स्पष्ट तस्वीरें लेता है. यूक्रेन की सेना इसे युद्धक्षेत्र की खुफिया जानकारी के लिए इस्तेमाल करती है. जर्मनी समेत पश्चिमी देश भी इससे जुड़े हैं. रूस इसे अपने खिलाफ इस्तेमाल होने वाला खतरा मानता है. 2022 से ही मास्को ने व्यावसायिक सैटेलाइटों को वैध लक्ष्य बताया था.
अंतरिक्ष सुरक्षा पर व्यापक प्रभाव
यह घटना अंतरिक्ष युद्ध की नई मिसाल पेश करती है. पहले सैटेलाइट मुख्य रूप से निगरानी या संचार के लिए थे. अब वे सक्रिय रूप से एक-दूसरे का पीछा कर सकते हैं. बाहरी अंतरिक्ष संधि शांतिपूर्ण उपयोग की बात करती है, लेकिन करीबी संचालन को रोकने वाले स्पष्ट नियम कम हैं. अगर कोई सैटेलाइट नष्ट होता है तो मलबा कई अन्य सैटेलाइटों को नुकसान पहुंचा सकता है. इससे पूरी कक्षा अस्थिर हो सकती है.
अमेरिका, यूरोप और अन्य देश इसे गंभीरता से ले रहे हैं. यूक्रेन को पश्चिमी मदद का अंतरिक्ष आयाम अब सीधे चुनौती के घेरे में है. रूस अपनी क्षमता दिखाकर संदेश देना चाहता है कि वह व्यावसायिक सैटेलाइटों तक पहुंच सकता है. वहीं पश्चिमी पक्ष अपनी रक्षा व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दे रहा है.
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अंतरिक्ष अब सिर्फ वैज्ञानिक क्षेत्र नहीं रह गया है. यह भू-राजनीतिक संघर्ष का नया मोर्चा बन चुका है. ऐसे मैन्यूवर भविष्य में और बढ़ सकते हैं. देशों को व्यवहार के साझा नियम बनाने होंगे. साथ ही सैटेलाइटों को अधिक सुरक्षित और लचीला बनाना होगा. निगरानी व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी ताकि किसी भी असामान्य गतिविधि का तुरंत पता चल सके.
यह घटना याद दिलाती है कि जमीन पर चल रहे युद्ध का असर आसमान तक फैल चुका है. दोनों सैटेलाइटों की आगे की गतिविधियां तय करेंगी कि तनाव बढ़ता है या शांत रहता है.
आजतक साइंस डेस्क