200 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें हाई रिस्क पर, नेपाल में अलर्ट मिलता तो बच सकती थीं सैकड़ों जानें

नेपाल की तबाही ने हिमालय के बढ़ते खतरे की ओर फिर ध्यान खींचा है. 200 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें हाई रिस्क पर हैं और बाढ़ की लहर मिनटों में नीचे पहुंच सकती है. ऐसे में समय पर अलर्ट ही बड़ा बचाव बन सकता है.

Advertisement
इस तरह के अर्ली वॉर्निंग सिस्टम हिमालयी इलाकों में लगाए जाते हैं. (Photo: International Journal of Disaster Risk Reduction) इस तरह के अर्ली वॉर्निंग सिस्टम हिमालयी इलाकों में लगाए जाते हैं. (Photo: International Journal of Disaster Risk Reduction)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 11 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:52 PM IST

नेपाल के रसुवा जिले में 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ ने भोटेकोशी-त्रिशूली घाटी में भारी तबाही मचा दी. 9 सितंबर तक सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, इस आपदा में 1300 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है. 5000 से ज्यादा लोग अब भी लापता बताए गए हैं. बाढ़ में घरों के साथ सड़कें, पुल और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट भी बुरी तरह प्रभावित हुए.

Advertisement

यह बाढ़ ल्हेंदे खोला नदी में आई तेज लहर के बाद आई, जो भोटेकोशी नदी की सहायक नदी है. ऊंचाई वाले इलाके में बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आया. इससे नदी का रास्ता कुछ समय के लिए रुक गया. इसके बाद पानी और मलबा अचानक तेजी से नीचे आया और लोगों को संभलने का ज्यादा समय नहीं मिला.

यह भी पढ़ें: 55 सीसीटीवी फुटेज और ब्लैक SUV बताएंगे, कहां से आए पांच ओरंगुटान?

सिर्फ 5 से 30 मिनट में पहुंच सकती है बाढ़

वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों में ग्लेशियर और बर्फ टूटने से अचानक बाढ़ आ सकती है. कई बार बर्फ, चट्टान और मलबा नदी का रास्ता रोक देते हैं. इसके बाद जब यह रास्ता टूटता है, तो पानी बहुत तेजी से नीचे आता है.

Advertisement

ऐसी बाढ़ की लहर कई जगहों पर सिर्फ 5 से 30 मिनट में नीचे रहने वाली बस्तियों तक पहुंच सकती है. यानी लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाने के लिए बहुत कम समय मिलता है. ऐसे में पहले से अलर्ट मिलना बेहद जरूरी है.

ऐसे अर्ली वॉर्निंग सिस्टम भारत में कई स्थानों पर लगे हैं. (Photo: International Journal of Disaster Risk Reduction)

200 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें हाई रिस्क पर

हिंदू-कुश हिमालय दुनिया के बड़े बर्फीले इलाकों में शामिल है. यहां से निकलने वाली नदियां एशिया के 10 बड़े नदियों को पानी देती हैं. लेकिन बढ़ते तापमान की वजह से ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं. ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ भी तेजी से पिघल रही है.

इससे नई ग्लेशियल झीलें बन रही हैं और कुछ जगहों पर बर्फ और चट्टानों की स्थिति भी कमजोर हो रही है. हिमालय में 200 से ज्यादा ग्लेशियल झीलों को बहुत ज्यादा जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक छोटी झीलों से भी बड़ा खतरा पैदा हो सकता है.

यह भी पढ़ें: एक बाढ़ ने बदल दिया नेपाल! 15 दिन बाद दिखी तबाही की असली तस्वीर

पिछले साल भी आई थी बड़ी बाढ़

भोटेकोशी नदी में 8 जुलाई 2025 को भी बड़ी बाढ़ आई थी. उस समय ऊपरी इलाके में एक ग्लेशियल झील का करीब 0.31 वर्ग किलोमीटर हिस्सा तेजी से कम हुआ था. बाढ़ में नेपाल-चीन फ्रेंडशिप ब्रिज बह गया था. सड़कें, गाड़ियां और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट भी प्रभावित हुए थे. इस घटना में कम से कम 9 लोगों की मौत हुई और 19 लोग लापता हुए थे.

Advertisement
ऐसे काम करता है अर्ली वॉर्निंग सिस्टम. (Graphics: International Journal of Disaster Risk Reduction)

सेंसर और सैटेलाइट से मिल सकता है अलर्ट

नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और चीन के कुछ हिस्सों में ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों पर नजर रखने के लिए सेंसर, कैमरे और सैटेलाइट का इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन अभी इनकी पहुंच काफी कम है. 5,000 मीटर से ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में सेंसर लगाना और उनकी देखभाल करना आसान नहीं है. 

इसके अलावा नेपाल में कई नदियों का ऊपरी हिस्सा सीमा पार है. इसलिए नेपाल और चीन के बीच समय पर डेटा शेयर करना भी जरूरी है. अगर ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों पर लगातार नजर रखी जाए और खतरा दिखते ही नीचे रहने वाले लोगों को अलर्ट भेजा जाए, तो ऐसी बाढ़ में जान-माल के नुकसान को काफी कम किया जा सकता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »