60 साल में 5 से 102 हुईं हीट स्टॉर्म, 367 दिन तक धरती को झुलसाती रही गर्मी

दुनिया में गर्मी का पैटर्न तेजी से बदल रहा है. 60 साल पहले साल में औसतन 5 हीट स्टॉर्म आती थीं, अब यह आंकड़ा 102 है. सबसे बड़ी हीट स्टॉर्म 367 दिन तक चली और धरती के 85% हिस्से तक पहुंची.

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जंगल मे आग लगने का मतलब तापमान में बढ़ोतरी हुई है. (Photo: Getty) जंगल मे आग लगने का मतलब तापमान में बढ़ोतरी हुई है. (Photo: Getty)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 21 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 12:24 PM IST

धरती पर भीषण गर्मी की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. पहले गर्मी की बड़ी लहरें कुछ इलाकों तक ही सीमित रहती थीं, लेकिन अब ये दुनिया के बड़े हिस्से तक फैल रही हैं. 1960 के दशक में हर साल औसतन 5 बड़ी हीट स्टॉर्म आती थीं, लेकिन इस दशक में इनकी औसत संख्या बढ़कर 102 हो गई है. तापमान के आंकड़ों के विश्लेषण में यह बात सामने आई है. सबसे बड़ी हीट स्टॉर्म 2023 से 2024 के बीच 367 दिन तक चली और धरती के करीब 85 फीसदी हिस्से तक पहुंच गई.

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इन बड़ी गर्मी की घटनाओं का असर सिर्फ तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है. लंबे समय तक गर्मी पड़ने से लोगों की सेहत पर खतरा बढ़ता है. इससे सूखा पड़ सकता है और जंगलों में आग लगने का खतरा भी बढ़ सकता है. इसी तरह, एक ही समय में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हुई कई बड़ी घटनाओं का संबंध भी एक ही हीट स्टॉर्म से सामने आया है.

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क्या है हीट स्टॉर्म?

हीट स्टॉर्म गर्मी की एक बहुत बड़ी लहर होती है, जो लंबे समय तक चलती है. धरती के बड़े हिस्से में फैल जाती है. जब किसी इलाके में लगातार 5 दिन या उससे ज्यादा समय तक तापमान सामान्य से बहुत अधिक रहता है, तो उसे हीट वेव यानी गर्मी की लहर कहा जाता है.

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हालांकि, हर देश में हीट वेव को पहचानने का तरीका अलग है. अमेरिका में आम तौर पर दो या उससे ज्यादा दिन की असामान्य गर्मी को हीट वेव कहा जाता है, जबकि कुछ देशों में इसके लिए तीन दिन की अवधि तय है. तापमान की सीमा भी हर जगह अलग होती है. इस वजह से अलग-अलग देशों में गर्मी की घटनाओं की तुलना करना मुश्किल होता है.

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इस अध्ययन में हीट स्टॉर्म के लिए एक अलग पैमाना तय किया गया है. जब गर्मी की कोई लहर अपने सबसे बड़े स्तर पर धरती के कम से कम 1 फीसदी हिस्से तक फैल जाती है, तो उसे हीट स्टॉर्म कहा जाता है. इस तरीके से बड़े इलाके में फैलने वाली गर्मी की घटनाओं का पता लगाया जा सकता है.

60 साल में कितना बदल गया गर्मी का हाल?

1960 के दशक में उस समय की सबसे बड़ी हीट स्टॉर्म 46 दिन तक चली थी. यह धरती के करीब 6 फीसदी हिस्से तक पहुंची थी. इसका असर अटलांटिक महासागर, लैटिन अमेरिका के कुछ हिस्सों और पश्चिमी अफ्रीका में देखा गया था. 1990 के दशक तक गर्मी की ऐसी बड़ी लहरें दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी फैलने लगी थीं. फिर भी एशिया और उत्तरी अमेरिका के बड़े इलाके इनसे बचे हुए थे. 

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अब हालात काफी बदल गए हैं. इस दशक की सबसे बड़ी हीट स्टॉर्म 367 दिन तक चली और धरती के करीब 85 फीसदी हिस्से तक पहुंची. इससे पता चलता है कि गर्मी की बड़ी घटनाएं अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा बड़े इलाके को प्रभावित कर रही हैं.

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एक ही हीट स्टॉर्म से कई देशों में नुकसान

2023-2024 के दौरान चली इस बड़ी हीट स्टॉर्म का असर कई देशों में देखा गया. फिलीपींस के कुछ इलाकों में तापमान 38 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. वहां कई स्कूलों में एयर कंडीशनर नहीं हैं. ऐसे में बच्चों को तेज गर्मी में पढ़ाई करने में परेशानी हुई. कुछ बच्चों की तबीयत भी बिगड़ गई.

अमेरिका के लुइसियाना में लंबे समय तक गर्मी पड़ने और सूखे के कारण जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ गईं. अगस्त 2023 में वहां करीब 600 आग की घटनाएं हुईं. बाद में एक दलदली इलाके में सुलगती आग से घना धुआं और कोहरा फैल गया. इसके कारण सड़क पर 158 से ज्यादा गाड़ियां आपस में टकरा गईं. इस हादसे में सात लोगों की मौत हो गई.

इसी दौरान लीबिया के डेरना शहर के पास दो बांध टूट गए. भारी बारिश के बाद आई बाढ़ ने बड़े इलाके में तबाही मचाई. सऊदी अरब में हज के दौरान मक्का की ग्रैंड मस्जिद के पास तापमान 51.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. इस दौरान 1,300 से ज्यादा जायरीनों की मौत हुई.

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अल-नीनो  का भी पड़ता है असर

धरती पर बढ़ती गर्मी के पीछे जलवायु परिवर्तन एक बड़ी वजह है. इसके अलावा अल-नीनो  जैसी मौसमी घटनाएं भी दुनिया के तापमान को प्रभावित करती हैं. अल-नीनो  के दौरान प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में समुद्र का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. इसका असर दुनिया के कई इलाकों के मौसम पर पड़ता है और कुछ जगहों पर गर्मी बढ़ सकती है.

1990 के दशक से 2020 के दशक तक दुनिया में गर्मी की बड़ी घटनाओं का फैलाव बढ़ा है. हालांकि, हीट स्टॉर्म की संख्या और उनके बढ़ते आकार को सिर्फ अल-नीनो  से नहीं समझा जा सकता. इसके लिए धरती के बढ़ते औसत तापमान और दूसरे मौसमी कारणों को भी देखना जरूरी है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इंसानों की गतिविधियों से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसें बढ़ रही हैं. ये गैसें धरती की गर्मी को बाहर निकलने से रोकती हैं. इससे औसत तापमान बढ़ता है और लंबे समय तक भीषण गर्मी पड़ने का खतरा बढ़ जाता है. अल-नीनो  जैसी घटनाएं इस गर्मी को कुछ समय के लिए और बढ़ा सकती हैं.

गर्मी का असर लोगों की सेहत, खेती, पानी की उपलब्धता और जंगलों पर भी पड़ता है. लंबे समय तक सूखा रहने से जंगलों में आग का खतरा बढ़ सकता है. हीट स्टॉर्म की पहचान करने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि गर्मी कितने बड़े इलाके में फैल रही है और इससे लोगों को कितना नुकसान हो रहा है.

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