अल-नीनो इफेक्ट... यूरोप में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, 800 शहरों में बरस रही है आग

यूरोप में इस समय रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह क्लाइमेट चेंज और अल-नीनो है. अगर यही हाल रहा तो आने वाले सालों में ऐसी गर्मी और देखने को मिलेगी.

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पेरिस में एक पानी के होज के सामने खुद को ठंडा करती है महिला. (File Photo: AFP) पेरिस में एक पानी के होज के सामने खुद को ठंडा करती है महिला. (File Photo: AFP)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 27 जून 2026,
  • अपडेटेड 1:10 PM IST

यूरोप के कई देश इस समय भीषण गर्मी झेल रहे हैं. ब्रिटेन, फ्रांस और दूसरे देशों में जून के तापमान ने कई पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. वैज्ञानिकों ने कहा है कि अगर क्लाइमेट चेंज नहीं होता, तो इस बार की इतनी तेज गर्मी पड़ना लगभग नामुमकिन था. उनका कहना है कि पिछले 20 साल में रात के समय पड़ने वाली खतरनाक गर्मी का खतरा करीब 100 गुना बढ़ गया है. ऐसे में उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर धरती का तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले सालों में हालात और खराब हो सकते हैं.

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वैज्ञानिकों ने बताया कि जिन इलाकों का अध्ययन किया गया, वहां जून में इससे पहले इतनी तेज गर्मी कभी नहीं देखी गई. ब्रिटेन में जून का सबसे ज्यादा तापमान रिकॉर्ड किया गया. कई जगहों पर गर्मी की वजह से लोगों की मौत हुई, बिजली सप्लाई पर असर पड़ा और स्कूल भी बंद करने पड़े. उनका कहना है कि अगर ऐसी ही गर्मी 1976 में पड़ती, तो तापमान आज के मुकाबले करीब 3.5 डिग्री सेल्सियस कम होता.

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800 से ज्यादा शहरों में देखा गया असर

वैज्ञानिकों ने यूरोप के 800 से ज्यादा शहरों का डेटा देखा. इनमें से करीब 45 फीसदी शहरों में जून के आखिर में सबसे ज्यादा गर्मी का असर दर्ज हुआ है या होने का अनुमान है. जब शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा नहीं रख पाता, तो इसे हीट स्ट्रेस कहा जाता है. इससे हीट स्ट्रोक और दूसरी दिक्कतों का खतरा बढ़ जाता है.

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इस बार सबसे बड़ी परेशानी यह है कि रात में भी तापमान ज्यादा बना हुआ है. आमतौर पर रात को मौसम ठंडा हो जाता है, जिससे शरीर को आराम मिल जाता है. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा. फ्रांस के कई इलाकों में एक हफ्ते से ज्यादा समय तक रात का तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा. कुछ जगहों पर रात में भी तापमान करीब 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया.

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क्या अल-नीनो इसकी वजह है?

आमतौर पर अल-नीनो की वजह से दुनिया के कई हिस्सों में तापमान बढ़ जाता है. लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार यूरोप की रिकॉर्ड गर्मी के पीछे अल-नीनो की बड़ी भूमिका नहीं है. उनके मुताबिक, इसकी सबसे बड़ी वजह क्लाइमेट चेंज है. 

कोयला, तेल और गैस जैसे ईंधनों के इस्तेमाल से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें धरती का तापमान लगातार बढ़ा रही हैं. इसी वजह से दुनिया का औसत तापमान औद्योगिक दौर से पहले के मुकाबले करीब 1.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर ग्रीनहाउस गैसें कम नहीं हुईं, तो आने वाले सालों में ऐसी हीटवेव और ज्यादा देखने को मिलेगी. उन्होंने यह भी बताया कि 2022 में यूरोप में गर्मी की वजह से 60 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी. इसलिए इस तरह की गर्मी को हल्के में नहीं लेना चाहिए.

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यूरोप की यह रिकॉर्ड गर्मी सिर्फ आज की परेशानी नहीं है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह क्लाइमेट चेंज का साफ संकेत है. अगर अभी से कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में दुनिया के कई हिस्सों में ऐसी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और ज्यादा देखने को मिल सकती है.

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