अमेरिका ने अपनी ही नौसेना को दिया 'बिना आंख' वाला F35 फाइटर जेट, भारत के लिए क्या होगा?

पेंटागन ने छह F35 फाइटर जेट बिना रडार के डिलीवर कि. नया रडार 2028 में आएगा. ट्रंप ने भारत को भी यह जेट ऑफर किया था. प्रोग्राम की देरी और महंगा होने से इस पर फैसला नहीं हुआ.

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पेंटागन ने मरीन कॉर्प्स को 6 एफ-35 फाइटर जेट बिना रडार के डिलिवर किए. (Photo: ITG) पेंटागन ने मरीन कॉर्प्स को 6 एफ-35 फाइटर जेट बिना रडार के डिलिवर किए. (Photo: ITG)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 27 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:11 PM IST

अमेरिका की सबसे एडवांस स्टेल्थ फाइटर जेट F35 की कहानी अब एक बड़े घोटाले और देरी की मिसाल बन गई है. पेंटागन ने हाल ही में मरीन कॉर्प्स को छह F35 फाइटर जेट बिना रडार के डिलीवर कर दिए हैं. नया एएन/एपीजी-85 रडार सिस्टम अप्रैल 2028 तक प्रोडक्शन शुरू नहीं होगा. 

F35 जॉइंट प्रोग्राम ऑफिस के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल ग्रेगरी मासिएलो ने सीनेट की सुनवाई में साफ कहा कि बिना रडार वाले ये जेट्स पूरी तरह मिशन कैपेबल नहीं माने जा सकते. यह बात इतनी सच्ची है कि इसे कोई छिपा नहीं सकता. दुनिया का सबसे महंगा फाइटर प्रोग्राम, जो अब तक 400 बिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च कर चुका है, अब बिना आंखों वाले विमानों को डिलीवर कर रहा है.

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ट्रंप ने हाल ही में व्हाइट हाउस में डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर्स को बुलाकर मिसाइल स्टॉक की कमी पर सवाल किए. उसी समय पेंटागन F35 जैसे जेट्स बिना मुख्य हिस्से के दे रहा है. भारत के संदर्भ में यह खबर बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रंप ने भारत की यात्रा के दौरान और पहले कई बार भारतीय वायुसेना (IAF) को F35 ऑफर किया था.

प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के समय ट्रंप ने कहा था कि वे भारत को F35 स्टेल्थ फाइटर उपलब्ध कराने का रास्ता तैयार कर रहे हैं. यह ऑफर भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों को ऊंचाई देने वाला था लेकिन अब इस प्रोग्राम की समस्याएं भारत के लिए सोचने वाली बात हैं.

F35 प्रोग्राम की महंगाई और समस्याएं 

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F35 लाइटनिंग II को दुनिया का सबसे एडवांस्ड स्टेल्थ फाइटर माना जाता है. इसमें एक से ज्यादा रोल हैं - जमीन पर हमला, हवा में लड़ाई और टोही. लेकिन इसका कुल खर्च अब 2 ट्रिलियन डॉलर के आसपास पहुंच गया है, जो इसे इतिहास का सबसे महंगा हथियार प्रोग्राम बनाता है. एक जेट की कीमत 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा है, लेकिन रखरखाव, अपग्रेड और लाइफ साइकिल कॉस्ट इसे और महंगा बनाती है.

अब नया AN/APG-85 रडार पुराने APG-81 की जगह लेने वाला था. यह ज्यादा पावरफुल AESA रडार है, जो बेहतर टारगेट डिटेक्शन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमता देता है. लेकिन नाक के अंदर माउंटिंग सिस्टम में बदलाव की वजह से पुराना रडार फिट नहीं हो पा रहा. 

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इसलिए लॉकहीड मार्टिन ने कुछ जेट्स नाक में बैलास्ट लगाकर डिलीवर किए. मरीन कॉर्प्स ने इंतजार किया, लेकिन अब छह जेट्स बिना रडार के उनके पास हैं. जनरल मासिएलो ने माना कि ये जेट्स ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं, लेकिन असली लड़ाई में पूरी क्षमता नहीं दिखा सकते.

यह समस्या सिर्फ रडार तक सीमित नहीं. F35 प्रोग्राम लंबे समय से देरी, कॉस्ट ओवररन और कम तैयार दरों से जूझ रहा है. कई रिपोर्ट्स कहती हैं कि तैयार जेट्स का छोटा प्रतिशत ही पूरी तरह मिशन तैयार रहता है. ट्रंप ने कॉन्ट्रैक्टर्स से मिसाइल स्टॉक की कमी पर जवाब मांगा, जो दिखाता है कि अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री सप्लाई चेन की दिक्कतों से गुजर रही है.

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ट्रंप का भारत दौरा और F35 ऑफर 

ट्रंप ने भारत यात्रा के दौरान और इससे पहले मोदी के व्हाइट हाउस दौरे पर F35 का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि अमेरिका भारत को अरबों डॉलर के हथियार बेचेगा और F35 का रास्ता भी खोलेगा. यह ऑफर भारत को क्वाड और इंडो-पैसिफिक में चीन के खिलाफ मजबूत बनाने का संकेत था. भारत के पास अभी राफेल, Su-30MKI जैसे जेट्स हैं, लेकिन पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ फाइटर IAF को नई ताकत दे सकता था. 

भारत ने हालांकि इस ऑफर को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि ट्रेड टेंशन और टैरिफ की वजह से भारत ने दिलचस्पी नहीं दिखाई. भारत Make in India पर जोर देता है. रूस, फ्रांस के साथ लंबे संबंध रखता है. F35 खरीदने पर अमेरिकी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, रखरखाव और इस्तेमाल पर सख्त शर्तें लगती हैं, जो भारत को पसंद नहीं आतीं. ट्रंप का ऑफर दिखाता है कि अमेरिका भारत को रणनीतिक पार्टनर मानता है.

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भारत अगर F35 खरीदता तो क्या होता? 

एक तरफ यह IAF को स्टेल्थ टेक्नोलॉजी, बेहतर सेंसर और नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर देता. पाकिस्तान और चीन के एयर डिफेंस को चीरने में मदद करता. लेकिन दूसरी तरफ, बिना रडार वाले जेट्स की डिलीवरी, देरी और भारी खर्च भारत के बजट पर बोझ बन सकता था. भारत एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट AMCA जैसे अपने प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है. F35 जैसी विदेशी टेक्नोलॉजी खरीदने से पहले इन समस्याओं को समझना जरूरी है.

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F35 प्रोग्राम की समस्याएं अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री की कमजोरियों को उजागर करती हैं. सप्लाई चेन, प्रोडक्शन डिले और कॉस्ट कंट्रोल में दिक्कतें हैं. ट्रंप इन मुद्दों पर ध्यान दे रहे हैं, लेकिन समाधान आसान नहीं. भारत के लिए यह सबक है कि कोई भी हथियार परफेक्ट नहीं होता. रडार, सॉफ्टवेयर, इंजन और रखरखाव सब पर निर्भर रहना पड़ता है.

F35 2028 तक नया रडार मिलने के बाद बेहतर हो सकता है, लेकिन फिलहाल यह प्रोग्राम चुनौतियों से भरा है. भारत को ट्रंप के ऑफर पर फिर से सोचना चाहिए, लेकिन अपनी शर्तों पर. संयुक्त उत्पादन, टेक्नोलॉजी शेयरिंग और लागत प्रभावी डील जरूरी है. 

यह मामला सिर्फ एक जेट का नहीं, बल्कि आधुनिक युद्ध और रक्षा खरीद की जटिलताओं का है. भारत जैसे देश को मजबूत एयर फोर्स चाहिए, लेकिन बिना आंखों वाला विमान नहीं. ट्रंप की यात्रा और ऑफर ने नए द्वार खोले, लेकिन फैसला सावधानी से लेना होगा. F35 की कहानी जारी है - महंगा, शक्तिशाली लेकिन अभी सही नहीं. 

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