दुर्गा पूजा का नाम आते ही मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं, सजे हुए पंडाल और कोलकाता की रौनक याद आने लगती है. पश्चिम बंगाल में मां दुर्गा की प्रतिमाएं बनाने की परंपरा सदियों पुरानी है. इन प्रतिमाओं को तैयार करने में मूर्तिकार अपनी कला और मेहनत के साथ कई पारंपरिक रीति-रिवाजों का भी पालन करते हैं. इन्हीं में एक ऐसी परंपरा है, जो अक्सर लोगों के मन में सवाल पैदा करती है. क्या आप जानते हैं कि बंगाल में मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए रेड लाइट एरिया के घरों की चौखट से मिट्टी भी लाई जाती है? इसके अलावा, दुर्गा प्रतिमा की सजावट में इस्तेमाल होने वाली एक खास शैली का संबंध डाक सेवा से भी है.
मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने की शुरुआत कैसे होती है?
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता का कुम्हारटोली इलाका दुर्गा प्रतिमाएं बनाने के लिए प्रसिद्ध है. यहां पीढ़ियों से मूर्तिकार मां दुर्गा और उनके परिवार की प्रतिमाएं तैयार करते आ रहे हैं. दुर्गा पूजा से कई महीने पहले ही प्रतिमाओं को बनाने का काम शुरू हो जाता है.
परंपरागत रूप से प्रतिमा बनाने की प्रक्रिया रथयात्रा के दिन होने वाली 'पाटा पूजा' से शुरू होती है. इसमें प्रतिमा बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले लकड़ी के ढांचे की पूजा की जाती है. इसके बाद बांस से प्रतिमा का आधार तैयार किया जाता है और उसमें पुआल भरकर शरीर का आकार दिया जाता है.
फिर इस ढांचे पर मिट्टी की परतें चढ़ाई जाती हैं. मूर्तिकार चेहरे, हाथों और शरीर के अलग-अलग हिस्सों को बारीकी से आकार देते हैं. प्रतिमा सूखने के बाद उस पर रंग किया जाता है और वस्त्र, आभूषण और अन्य सजावटी चीजें लगाई जाती हैं. इस पूरी प्रक्रिया में कारीगरों की कुशलता के साथ पारंपरिक मान्यताओं का भी खास महत्व होता है.
रेड लाइट एरिया की मिट्टी से क्यों बनाई जाती है मां दुर्गा की प्रतिमा?
दुर्गा प्रतिमा के निर्माण से जुड़ी सबसे चर्चित परंपराओं में से एक है वेश्यालय के दरवाजे की मिट्टी का इस्तेमाल. बंगाल में इसे 'पुण्य माटी' यानी पवित्र मिट्टी कहा जाता है. यह मिट्टी आमतौर पर रेड लाइट इलाके में स्थित किसी घर की चौखट से ली जाती है और प्रतिमा बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली दूसरी मिट्टी में मिलाई जाती है.
कोलकाता का सोनागाछी इलाका इस परंपरा के संदर्भ में अक्सर चर्चा में रहता है. हालांकि, यह समझना जरूरी है कि इस मिट्टी का इस्तेमाल हर प्रतिमा में अनिवार्य रूप से होता हो, ऐसा नहीं है. अलग-अलग मूर्तिकारों और परंपराओं में इसके पालन का तरीका अलग हो सकता है.
इस प्रथा के पीछे कई तरह की मान्यताएं और व्याख्याएं प्रचलित हैं. एक मान्यता के अनुसार, जब कोई व्यक्ति वेश्यालय में प्रवेश करता है, तो वह अपनी अच्छाइयां और पुण्य घर की चौखट पर छोड़ देता है. इसी लोकविश्वास के आधार पर वहां की मिट्टी को पुण्य माटी कहा जाता है.
वहीं, इस परंपरा को सामाजिक नजरिये से भी देखा जाता है. समाज में जिन महिलाओं को अक्सर भेदभाव और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है, उनके घर की मिट्टी को देवी की प्रतिमा में शामिल करना एक प्रतीकात्मक संदेश देता है. यह परंपरा इस सवाल पर भी विचार करने का अवसर देती है कि समाज में किसी व्यक्ति को सम्मान और स्वीकार्यता देने का आधार क्या होना चाहिए.
हालांकि, इन व्याख्याओं को धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के रूप में ही समझना चाहिए. इनके पीछे बताई जाने वाली कहानियों को किसी प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता.
गंगा की मिट्टी से कैसे तैयार होती है दुर्गा प्रतिमा?
दुर्गा प्रतिमा बनाने के लिए आमतौर पर नदी के किनारे की चिकनी मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है. कुम्हारटोली में गंगा-हुगली नदी क्षेत्र की मिट्टी का विशेष महत्व है. मूर्तिकार जरूरत के अनुसार अलग-अलग प्रकार की मिट्टी मिलाकर प्रतिमा को मजबूत और आकार देने योग्य बनाते हैं.
कुछ पारंपरिक विधियों में कई तरह की मिट्टी का मिश्रण तैयार किया जाता है. इसके बाद पुआल से बने ढांचे पर मिट्टी की मोटी परत चढ़ाई जाती है. पहली परत सूखने पर दूसरी परत लगाई जाती है, जिससे प्रतिमा के शरीर, चेहरे और हाथों को सही आकार दिया जा सके.
चेहरे और हाथों की बारीक बनावट पर खास ध्यान दिया जाता है. इसके बाद प्रतिमा को सफेद रंग की शुरुआती परत दी जाती है और फिर अलग-अलग रंगों से सजाया जाता है.
प्रतिमा की आंखें बनाने की रस्म को 'चोख्खुदान' कहा जाता है. इसे मां दुर्गा की प्रतिमा को प्रतीकात्मक रूप से जीवंत करने की प्रक्रिया माना जाता है. कई परंपराओं में महालया के दिन आंखें बनाने की विशेष अहमियत होती है.
मां दुर्गा की सजावट का डाक सेवा से क्या है संबंध?
दुर्गा प्रतिमा से जुड़ी एक और दिलचस्प परंपरा है 'डाकेर साज'. बंगाल में प्रतिमाओं की पारंपरिक सजावट की विभिन्न शैलियों में इसका खास स्थान है. इसका नाम बांग्ला शब्द 'डाक' से जुड़ा है, जिसका अर्थ डाक सेवा होता है.
पुराने समय में प्रतिमाओं की सजावट के लिए इस्तेमाल होने वाली कुछ सामग्री डाक के जरिए मंगाई जाती थी. इसी वजह से इस सजावट शैली को 'डाकेर साज' कहा जाने लगा. इसमें मुख्य रूप से सुनहरी चमक और जरी जैसे सजावटी तत्वों का इस्तेमाल किया जाता रहा है.
इसके अलावा, प्रतिमाओं को सजाने के लिए शोलापिथ और मिट्टी से बनी सजावटी आकृतियों का भी इस्तेमाल होता है. शोलापिथ एक हल्की, मुलायम वनस्पति सामग्री है, जिससे बेहद बारीक और सुंदर सजावट तैयार की जाती है. वहीं, मिट्टी की सजावट में मूर्तिकार कपड़ों जैसी आकृतियां, आभूषण और अन्य डिजाइन बनाते हैं.
आज दुर्गा पूजा के पंडालों में आधुनिक थीम और नई तकनीकों का खूब इस्तेमाल होता है, लेकिन पारंपरिक सजावट की ये शैलियां बंगाल की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई हैं.
सिर्फ प्रतिमा नहीं, परंपरा और संस्कृति की कहानी है दुर्गा पूजा
मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने की प्रक्रिया केवल मिट्टी को आकार देने तक सीमित नहीं है. इसमें कारीगरों की पीढ़ियों से चली आ रही कला, धार्मिक मान्यताएं और स्थानीय संस्कृति एक साथ दिखाई देती हैं.
रेड लाइट एरिया की मिट्टी से जुड़ी परंपरा सामाजिक बहिष्कार और सम्मान जैसे सवालों को सामने लाती है, जबकि डाकेर साज बंगाल की पुरानी कलात्मक परंपराओं और डाक व्यवस्था के ऐतिहासिक संबंध की झलक दिखाता है.
इसलिए अगली बार जब आप दुर्गा पूजा के पंडाल में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा के दर्शन करें, तो उसके रंगों और सजावट के साथ-साथ उस मेहनत, शिल्पकला और सांस्कृतिक इतिहास पर भी गौर करें, जो उसे खास बनाता है.
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