शुभेंदु अधिकारी क्या बीजेपी को हिमंता बिस्वा सरमा जितना फायदा दिला पाएंगे?

शुभेंदु अधिकारी के रूप में बीजेपी को एक और आक्रामक नेता मिल गया है, जो उसके कोर एजेंडे में पूरी तरफ फिट है. बिल्कुल हिमंता बिस्वा सरमा की तरह. फर्क बस यह है कि हिमंता बिस्वा सरमा अपनी अहमियत दर्ज करा चुके हैं, लेकिन शुभेंदु अधिकारी अभी कुछ मोर्चों पर खुद को साबित करना है.

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बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा. (Photo: PTI) बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा. (Photo: PTI)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 08 मई 2026,
  • अपडेटेड 12:19 PM IST

शुभेंदु अधिकारी भी देश के उन नेताओं की फेहरिस्त में शुमार हो गए हैं, जिनकी बदौलत बीजेपी को अपनी सत्ता के विस्तार में समय समय पर मदद मिली है. अब तक इस सूची में सबसे ऊपर तो हिमंता बिस्वा सरमा ही रहे हैं, अगर आगे चलकर शुभेंदु अधिकारी टॉप पोजीशन हासिल कर पाते हैं, तो यह उनकी अपनी काबिलियत होगी. 

हिमंता बिस्वा सरमा की ही तरह शुभेंदु अधिकारी ने भी बीजेपी को उसके कट्टर राजनीतिक विरोधी से छीनकर सत्ता दिला दी है. जो काम हिमंता बिस्वा सरमा ने 2016 में किया था, ठीक वही काम शुभेंदु अधिकारी ने दस साल बाद किया है. 2026 में. 

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लेकिन, सत्ता दिलाने के बाद भी तब हिमंता बिस्वा सरमा को बीजेपी ने मुख्यमंत्री नहीं बनाया था. बीजेपी ने पहले से ही सर्बानंद सोनवाल को असम में प्रोजेक्ट कर रखा था. हिमंता बिस्वा सरमा को पूरे पांच साल सर्बानंद सोनवाल के साथ काम करते हुए इंतजार करना पड़ा - जाहिर है, बीजेपी इम्तिहान ले रही थी और हिमंता बिस्वा सरमा को खुद को साबित करना पड़ रहा था.

हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस से झटक कर बीजेपी को सत्ता दिला दी थी, वही काम अब शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल करके किया है. शुभेंदु अधिकारी को भी इस काम में पांच साल लग गए. शुभेंदु अधिकारी ने बीजेपी को सत्ता तो दिलाई ही, ममता बनर्जी को दो-दो बार सीधे मुकाबले में शिकस्त भी दी है - पश्चिम बंगाल में बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार तो शुभेंदु अधिकारी ही हैं, लेकिन जब तक घोषणा नहीं हो जाती, कुछ भी कहना मुश्किल होगा.

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कॉमन बात ये है कि दोनों ही नेता आक्रामक राजनीति करते हैं, और बीजेपी के कोर एजेंडे में पूरी तरह फिट बैठते हैं - लेकिन, फिलहाल तो सवाल यही है कि क्या शुभेंदु अधिकारी भी बीजेपी को हिमंता बिस्वा सरमा जितना फायदा दिला पाएंगे?

घुसपैठियों के मुद्दे पर

पश्चिम बंगाल चुनाव कैंपेन के दौरान शुभेंदु अधिकारी कह रहे थे, बांग्लादेश से दो तरह के लोग पश्चिम बंगाल आए हैं... हिंदू अपना धर्म बचाने आए हैं, वे घुसपैठिए नहीं हैं... वे रिफ्यूजी हैं... उन्होंने इस्लाम नहीं अपनाया है... वे अपना धर्म बचाने आए हैं... वे रिफ्यूजी के तौर पर आए हैं, और जो लोग बांग्लादेश से गैर-कानूनी तरीके से यहां घुसे हैं... वे मेरी मां, बहनों, बेटियों को लव जिहाद के जाल में फंसा रहे हैं. 

बीजेपी के लिए वोट मांगने पश्चिम बंगाल पहुंचे हिमंता बिस्वा सरमा का दावा था, असम में 100 फीसदी बाड़ लगाई जा चुकी है... और त्रिपुरा में काम प्रगति पर है, जबकि पश्चिम बंगाल एकमात्र ऐसा राज्य है जहां बाड़ नहीं लगाई जा रही है.

ममता बनर्जी को सीधे टार्गेट करते हुए हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा, इस चुनाव में हर भारतीय का हित जुड़ा है... घुसपैठ का असर सिर्फ पश्चिम बंगाल और असम तक सीमित नहीं है... ये झारखंड, बिहार और अन्य राज्यों में भी फैल रहा है. हिमंता बिस्वा सरमा ने एक और दावा किया, असम में मुस्लिम आबादी लगभग 40 फीसदी तक पहुंच चुकी है... अगर घुसपैठ पर रोक नहीं लगाई गई तो अगले दो दशकों के भीतर दोनों राज्य अपना हिंदू बहुसंख्यक दर्जा खो देंगे.

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पूर्वी भारत में, विशेष रूप से असम और बंगाल के हिसाब से देखें तो शुभेंदु अधिकारी और हिमंता बिस्वा सरमा, ऐसे दो चेहरे हैं जो कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों के सेक्युलरिज्म जिसे बीजेपी 'अल्पसंख्यक तुष्टिकरण' कहती है, ये दोनों खुलकर चैलेंज करते हैं. 

घुसपैठियों के मुद्दे पर हिमंता बिस्वा सरमा का कहना रहा है, 'लातों के भूत बातों से नहीं मानते... हम तब असम से उन घुसपैठियों को बाहर निकालते हैं, जब वे खुद से नहीं जाते.'

अस्मिता के मुद्दे पर

जैसे हिमंता बिस्वा सरमा असमिया अस्मिता की बात करते हैं, शुभेंदु अधिकारी भी बंगाली अस्मिता का मुद्दा ममता बनर्जी को काउंटर करने के लिए जोर शोर से उठाते रहे, और बीजेपी का बचाव भी करते रहे. 

जब ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस नेताओं ने बंगाली अस्मिता और खान-पान पर बीजेपी की सरकार बनने पर पाबंदी लग जाने की आशंका जताई तो शुभेंदु अधिकारी मोर्चे पर डटे रहे. यह शुभेंदु अधिकारी का आगे डट कर खड़ा हो जाना ही रहा, जो बीजेपी नेतृत्व को बाहरी करार दिए जाने का बचाव भी था, और काउंटर भी. 

शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी पर बंगाली अस्मिता को ही कुचल डालने का आरोप लगाया था. लोगों ने शुभेंदु अधिकारी की बातों पर ममता बनर्जी से ज्यादा ही भरोसा किया, तभी तो पूरे बंगाल के साथ साथ भवानीपुर में भी तृणमूल कांग्रेस की हार पक्की कर दी. 

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हिमंता बिस्वा सरमा भी कहते रहे हैं, असम असमियों का है, किसी के लिए शरणार्थी शिविर नहीं है. हिमंता बिस्वा सरमा ने तो चुनाव के दौरान यहां तक कहा था कि असम के मुसलमानों से उनको कोई दिक्कत नहीं है, वो तो सिर्फ बांग्ला बोलने वाले मियां मुस्लिमों के खिलाफ हैं. 

हिंदुत्व के मुद्दे पर

हिंदुत्व के मुद्दे पर भी दोनों ही आक्रामक रूप अख्तियार कर लेते हैं, जबकि दोनों ही दूसरे दलों से बीजेपी में आए हैं. हिमंता बिस्वा सरमा कांग्रेस से बीजेपी में आए हैं, और शुभेंदु अधिकारी तो तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के करीबी लोगों में ही गिने जाते रहे हैं. असम में कांग्रेस की सरकार और तरुण गोगोई को मुख्यमंत्री बनाने में कभी हिमंता बिस्वा सरमा की बड़ी भूमिका हुआ करती थी. 

भवानीपुर से चुनाव जीतने के बाद शुभेंदु अधिकारी का कहना था, मैं हिंदू वोटों से जीता, इसलिए मैं सिर्फ हिंदुओं के लिए काम करूंगा, मुसलमानों के लिए नहीं... वे सब टीएमसी को वोट देते हैं.

शुभेंदु अधिकारी हों या फिर हिमंता बिस्वा सरमा - अब तो दोनों के भाषण सुनकर लगता ही नहीं कि कोई पहले किसी और पार्टी में रहा हो. शायद यही वजह है कि बीजेपी दोनों को इतनी अहमियत देती है, जो पहले सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक बैकग्राउंड के नेताओं को ही मिला करता था. 

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विकास के मुद्दे पर

अगर बीजेपी शुभेंदु अधिकारी को पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनाती है, तो वैसी ही उम्मीद करनी चाहिए जैसी हिमंता बिस्वा सरमा से अपेक्षा रही है, और असम के मुख्यमंत्री ने अपनी बातों और एक्शन दोनों से खुद को साबित भी किया है. 

हिमंता बिस्वा सरमा और शुभेंदु अधिकारी दोनों ही बीजेपी शासन के डबल इंजन मॉडल के बेहतरीन नुमाइंदे हैं, जो 'मनसा-वाचा-कर्मणा' संघ और बीजेपी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वाले विकास के मॉडल को जमीन पर उतारने की दक्षता रखते हैं. 

हिमंता बिस्वा सरमा तो संघ और बीजेपी के कोर एजेंडे को जमीन पर लागू भी कर चुके हैं, और अगर मौका मिलता है तो शुभेंदु अधिकारी से भी बीजेपी नेतृत्व को ऐसी अपेक्षा होगी - अब अगर बीजेपी को पूर्वी भारत में मजबूत और स्थाई आधार चाहिए, तो ये दोनों ही नेता उसके लिए बेहतरीन और और आक्रामक योद्धा साबित हो सकते हैं.

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