'रिजीम' और राष्ट्र में फर्क: लोकतांत्रिक आंदोलन का अधिकार या व्यवस्था को चुनौती?

SIR प्रक्रिया और चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष का प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा है. लेकिन बांग्लादेश या नेपाल की तर्ज पर 'रिजीम चेंज' जैसे शब्दों का इस्तेमाल खतरनाक है. भारत में सरकार बदलने का संवैधानिक रास्ता सिर्फ चुनाव है, व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की बयानबाजी राष्ट्र की संस्थाओं को कमजोर करती है.

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‘रिजीम चेंज’ पर मचा सियासी घमासान (Photo-ITG) ‘रिजीम चेंज’ पर मचा सियासी घमासान (Photo-ITG)

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 19 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 6:42 AM IST

SIR प्रक्रिया, मतदाता सूची से नाम हटाने और चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज को लेकर विपक्ष, कॉकरोच जनता पार्टी सड़क पर है. चुनाव आयोग और सरकार पर हर तरह से दबाव बनाने की कोशिश हो रही है. केवल धरना प्रदर्शन ही नहीं संवैधानिक दायरे में रहते हुए अन्य प्रयास भी हो रहे हैं. जैसे केरलम विधानसभा में प्रस्ताव पास किया गया है और साथ ही सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं भी दाखिल की गईं हैं. लेकिन जब आंदोलनकारी 'रिजीम चेंज' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने लगते हैं, तो भाषा संस्थागत जवाबदेही से आगे निकलकर व्यवस्था को ही चुनौती देने जैसी लगने लगती है.

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‘रिजीम’ का आलोचनात्मक अर्थ अक्सर दमनकारी या अलोकतांत्रिक शासन से जुड़ा होता है और ‘रिजीम चेंज’ का प्रचलित अर्थ तख्तापलट या हिंसक उथल-पुथल है, जैसा बांग्लादेश या नेपाल में देखा गया. राष्ट्र उससे कहीं बड़ा और स्थायी है और संविधान, संस्थाओं और नागरिकों की निरंतरता पर टिका है. सरकारें बदलती हैं, राष्ट्र बना रहता है.

लेकिन इस बहस में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि विपक्ष का काम ही सत्तारूढ़ दलों के खिलाफ मुद्दे खड़े करके जन-दबाव बनाना रहा है. 1974-77 का जेपी आंदोलन इसका स्पष्ट उदाहरण है. जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में इमरजेंसी विरोधी आंदोलन ने इंदिरा गांधी सरकार को सड़कों और चुनावों के जरिए चुनौती दी. मुद्दे भ्रष्टाचार, अधिनायकवाद और लोकतंत्र की बहाली के थे, लेकिन मकसद तत्कालीन सरकार को बदलना ही था.

1977 के चुनाव में जनता पार्टी की जीत ने यह साबित किया कि लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता परिवर्तन संभव है. इसमें कुछ भी असंवैधानिक नहीं था. आंदोलन ने संवैधानिक रास्ते चुनाव का इस्तेमाल किया और इमरजेंसी खत्म होने के बाद संस्थाएं फिर से मजबूत हुईं.

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अन्ना आंदोलन: भ्रष्टाचार के खिलाफ जन-दबाव

इसी तरह 2011-12 का अन्ना हजारे आंदोलन मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम था. लोकपाल की मांग और ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के बैनर तले लाखों लोग सड़कों पर आए. आंदोलन का सीधा लक्ष्य कांग्रेस नीत सरकार पर दबाव डालना और उसकी विश्वसनीयता को कमजोर करना था. नतीजा हुआ कि 2014 के चुनाव में भाजपा की जीत हुई. अन्ना आंदोलन ने भी संवैधानिक ढांचे के भीतर काम किया.

शांतिपूर्ण प्रदर्शन, जन-जागरण और अंततः मतदाताओं का फैसला. दोनों मामलों में विपक्षी ताकतों ने मौजूदा मुद्दों को हथियार बनाकर सरकार बदलने की कोशिश की. यह लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है. विपक्ष का काम ही सत्ताधारी दल को जवाबदेह बनाना और वैकल्पिक सरकार का रास्ता तैयार करना है. जब तक यह चुनाव, संसद और न्यायपालिका के जरिए होता है, तब तक इसमें कोई संवैधानिक दोष नहीं है.

सवाल पूछना अधिकार, जवाबदेही जरूरी

वर्तमान संदर्भ में भी ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग इसी श्रेणी में आ सकती है. यदि आरोपों में दम है, तो संस्थागत सुधार, महाभियोग या अगले चुनाव में जनता का फैसला वैध रास्ते हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया जानबूझकर कठिन बनाई गई है, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी. ताकि संस्था राजनीतिक दबाव से मुक्त रहे. इस्तीफा मांगना और जन-दबाव बनाना लोकतांत्रिक अधिकार है. लेकिन जब भाषा ‘रिजीम चेंज’ की ओर मुड़ती है और बांग्लादेश जैसे उदाहरणों का जिक्र होने लगता है, तो फर्क धुंधला हो जाता है.

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जेपी और अन्ना आंदोलन सरकार बदलने के लिए थे, व्यवस्था उखाड़ने के लिए नहीं. उन्होंने संविधान को नकारा नहीं, बल्कि उसकी रक्षा का दावा किया. आज कुछ बयानों में सड़क पर दबाव से तत्काल बदलाव और विदेशी तर्ज पर प्रेरणा की बातें आ रही हैं, जो ऐतिहासिक मिसालों से अलग हैं. किरेन रिजिजू और अन्य नेताओं का कहना सही है कि भारत में सत्ता परिवर्तन चुनावों से ही होगा.

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दोनों पक्षों को भाषा नियंत्रित रखनी होगी. विपक्ष को याद रखना चाहिए कि पिछले आंदोलन सफल इसलिए हुए क्योंकि वे संवैधानिक सीमाओं में रहे और अंत में मतदाताओं ने फैसला किया. सत्ताधारी दल को भी आलोचना को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताकर खारिज नहीं करना चाहिए. एसआईआर जैसी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता जरूरी है. सोशल मीडिया पर अतिरंजना एक तरफ ‘वोट चोरी’, दूसरी तरफ ‘विदेशी साजिश’ संस्थाओं को कमजोर करती है. रिजीम और राष्ट्र का फर्क यही है कि सरकार बदलना लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन राष्ट्र की बुनियादी संस्थाओं को चुनौती देना उसकी कमजोरी. ज्ञानेश कुमार मामले में तथ्यों की जांच हो, संवैधानिक प्रक्रिया चले. ऐतिहासिक आंदोलनों ने साबित किया कि विपक्ष मुद्दों पर संघर्ष करके सरकार बदल सकता है. यह असंवैधानिक नहीं. लेकिन उसे रिजीम चेंज की बयानबाजी में बदलने से बचना होगा, ताकि राष्ट्र की संस्थाएं मजबूत रहें.

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