उद्धव ठाकरे से छिन गई बाल ठाकरे की विरासत, क्‍यों एकनाथ शिंदे बने असली हकदार । Opinion

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव परिणामों ने यह संदेश दे दिया है कि उद्धव ठाकरे से बाला साहब ठाकरे की राजनीतिक विरासत पूरी तरह छिन गई है. उद्धव ठाकरे न केवल सत्ता पाने में असफल हुए बल्कि अपने पिता की राजनीति को कब्र में दफन करने का काम किया है. महाराष्ट्र के मतदाताओं ने यह फैसला भी सुना दिया कि पिता की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए सिर्फ बेटा होना काफी नहीं है.

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बाला साहब ठाकरे और उद्धव ठाकरे (फाइल फोटो) बाला साहब ठाकरे और उद्धव ठाकरे (फाइल फोटो)

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 25 नवंबर 2024,
  • अपडेटेड 4:59 PM IST

महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में शिवसेना (यूबीटी) का पतन हो चुका है. जनता ने पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की सेना की बजाय मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना पर भरोसा जताया है. बल्कि यूं कहें तो बेहतर होगा कि उद्धव सेना को महाराष्ट्र के लोगों ने शिवसेना मानने से ही इनकार कर दिया है. हिंदू हृदय सम्राट के नाम से पूरे भारत में मशहूर बाला साहब ठाकरे की विरासत को एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे से छीन लिया. जाहिर है कि इसके जिम्मेदार खुद उद्धव ठाकरे हैं. अपने पिता की विरासत को न बचा पाने की तोहमत तो उन पर लगनी ही है. उन्होंने राजनीति में खुद को या अपनी पार्टी को ओवर एस्टिमेट कर लिया. शायद उन्हें लगा कि जनता ठाकरे परिवार को चाहती है. ठाकरे जो चाहेंगे उसके हिसाब से जनता अपने विचार बना लेगी. यह भूल आम तौर पर वही करता है जो जनता के बीच नहीं होता. उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ने वाले सभी नेता यही कहते रहे हैं कि वो आम लोगों को छोड़िए विधायकों और सांसदों तक से नहीं मिलते हैं. आइये देखते हैं कि किस तरह उन्होंने अपने पिता के नाम और उनकी कड़ी मेहनत से तैयार की गई पार्टी का बंटाढार कर दिया.

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1- हिंदुत्‍व पर अपने पिता की विचारधारा से दूर जाना महंगा पड़ गया

जिन लोगों ने नब्बे के दशक में भारतीय राजनीति को बहुत नजदीक से देखा है उन्हें पता होगा कि देश के एकमात्र हिंदूवादी नेता बाला साहब ठाकरे होते थे. बाबरी मस्जिद के विध्वंस की जिम्मेदारी ताल ठोंककर लेने का साहस केवल उन्हीं में था. बाबरी विध्वंस के बहुत पहले 1987 में मुंबई के विले पारले के उपचुनाव में बाल ठाकरे ने एक सभा में कहा था, हम ये चुनाव हिंदुओं की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं. हमें मुस्लिम वोटों की परवाह नहीं है. यह देश हिन्दुओं का है और उनका ही रहेगा. इस चुनाव में शिव सेना उम्मीदवार रमेश प्रभु की जीत हुई थी लेकिन 1989 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने बाल ठाकरे और रमेश प्रभु दोनों को ही भड़काऊ भाषण के मामले में दोषी पाया और नतीजे को रद्द कर दिया. रमेश प्रभु ने हाई कोर्ट के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी लेकिन दिसंबर, 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरकरार रखा. सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा के तौर पर 1995 से 2001 तक बाल ठाकरे के वोट डालने पर भी प्रतिबंध लगा दिया.

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हिंदुत्व को लेकर बाल ठाकरे इतने सख्त थे जितनी आज के दौर की भी बीजेपी नहीं हुई है. उन्होंने एक बार मुसलमानों के मताधिकार को वापस लेने की मांग कर दी थी. शिव सेना ने भी साल 2015 में इसे दोहराया था. सामना में तब शिव सेना नेता संजय राउत ने लिखा, कि जब तक मुसलमानों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहेगा, उनका कोई भविष्य नहीं है. यही कारण है कि बाल ठाकरे ने मांग की थी कि मुसलमानों के वोटिंग अधिकार छीन लिए जाएं. जिस दिन मुसलमानों के वोटिंग अधिकार छीन लिए जाएंगे, उस दिन धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करने वाले लोगों का मुखौटा उजागर हो जाएगा.

इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि उद्धव ठाकरे ने अपने पिता की विचारधारा से समझौता किया पर महत्वपूर्ण बिंदुओं पर वो हमेशा हिंदुत्व के साथ रहे. जिस तरह हिंदुत्व का विरोध करने वाले अजित पवार केवल महायुति के गठबंधन में शामिल होकर हिदुओं का वोट पा गए. पर कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर हिंदुत्व के साथ खड़े होकर भी उद्धव को हिंदुओं ने नकार दिया. याद करिए संसद में वक्फ बोर्ड बिल पर शिवसेना ने कांग्रेस वाला स्टैंड नहीं लिया. इसके लिए मुसलमानों ने मातोश्री पहुंचकर उद्धव से शिकायत भी की थी. इसी तरह शिवसेना यूबीटी ने केवल एक मुस्लिम को इस बार के विधानसभा चुनावों में टिकट दिया. जबकि अजित पवार ने कई मुसलमानों को टिकट देकर भी हिंदुओं का वोट पाने में सफल रहे. उद्धव ठाकरे ने मुस्लिम शासकों के नाम पर बने जिलों का नाम बदलने वाले फैसले का भी कभी विरोध नही किया. हालांकि नाम बदलने का काम खुद ठाकरे ने अपने शासन के अंतिम दिनों में किया था. इसलिए विरोध का सवाल ही नहीं उठता था.

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2- सावरकर पर समझौता करके मराठा स्वाभिमान वाले नेता की इमेज खराब हुई

कभी राष्ट्रभक्त विनायक दामोदर सावरकर के हिंदुत्व जैसा ही शिवसेना का हिंदुत्व हुआ करता था. यूं कहा जा सकता है कि आरएसएस के हिंदुत्व से जहां बीजेपी प्रभावति है वहीं सावरकर के हिंदुत्व का प्रभाव शिवसेना पर रहा है. पर कांग्रेस के समर्थन से मिले मुख्यमंत्री पद के चलते उद्धव ठाकरे ने सावरकर के अपमान को कभी अपना अपमान नहीं माना. राहुल गांधी अपने हर भाषण में सावरकर की इज्जत को तार-तार करते रहे और उद्धव ठाकरे गठबंधन धर्म निभाते रहे. पीएम मोदी ने इन चुनावों में उद्धव ठाकरे को एक चैलेंज दिया था कि एक बार सावरकर की तारीफ कांग्रेस नेताओं से उद्धव ठाकरे करवा कर देखें. यही नहीं उन्होंने यह भी चैलेंज दिया कि एक बार राहुल गांधी बाला साहब ठाकरे को हिंदू हृदय सम्राट कह कहकर बोल दें. बीजेपी ने इस तरह इस मुद्दे को भुनाया कि उद्धव ठाकरे को जवाब देना मुश्किल हो गया था. सावरकर पर समझौता करने का असर ये हुआ कि लोगों ने शिंदे सेना को असली शिवसेना मान लिया.

3- पालघर के साधुओं की हत्या पर ढुलमुल रवैया

16 अप्रैल, साल 2020 में दो साधुओं और उनके ड्राइवर की लिंचिंग के दौरान हत्या कर दी गई थी. प्रदेश के मुख्यमंत्री उस दौरान उद्धव ठाकरे थे. उनकी सरकार कांग्रेस और एनसीपी के समर्थन से चल रही थी. यह घटना कथित तौर पर बच्चा चोरी का शक जताते हुए पालघर इलाके के गढ़चिंचले गांव में हुई थी. जहां दो साधुओं कल्पवृक्ष और सुशील गिरी समेत ड्राइवर को पीट पीट कर भीड़ ने मार डाला था. इस घटना के बात उद्धव सरकार से जिस तरह के एक्शन की उम्मीद थी वह नहीं लिया गया.विपक्ष की मांग थी कि उद्धव सरकार को मामले की सीबीआई जांच कराए. लेकिन उद्धव सरकार ने ऐसा नहीं करते हुए इसे महज पुलिस जांच से ही सिमटा दिया.

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उद्धव ठाकरे से अलग होने के बाद शिंदे गुट ने दांव खेलते हुए पालघर मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट से कराने की ठान ली. शिंदे सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा कि महाराष्ट्र सरकार पालघर मामले की जांच सीबीआई से कराना चाहती है. इसी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए सरकार को सीबीआई जांच की इजाजत दे दी है. 

4- कांग्रेस के पिछलग्‍गू बने

बाल ठाकरे ने शिवसेना का गठन ही 1966 में कांग्रेस पार्टी के विरोध में किया था वही शिवसेना जब बार-बार कांग्रेस पार्टी की ओर महत्वपूर्ण मुद्दों पर कांग्रेस की ओर मुंह ताकते देखती है तो आम जनता और बाला साहब की आत्मा दोनों को कष्ट जरूर होता होगा. उद्धव ठाकरे ने बीजेपी का साथ छोड़ कर कांग्रेस और एनसीपी से हाथ इसलिए ही मिलाया था ताकि उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल सके. जाहिर है कि बीजेपी को यह मंजूर नहीं था. पूर्व में भी जब भी शिवसेना-बीजेपी गठबंधन की सरकार बनी तो फार्मूला यही था कि जिसके ज्यादा विधायक होंगे, मुख्यमंत्री उसी पार्टी का होगा.

लिहाजा 1995 में मुख्यमंत्री पद शिवसेना को मिला और 2014 में मुख्यमंत्री पद बीजेपी के खाते में गया. पर उद्धव ठाकरे की अति महत्वाकांक्षा का नतीजा है कि आज उनसे न केवल सत्ता दूरी हुई बल्कि पार्टी भी हाथ से निकल गई.जब तक बाला साहब ठाकरे जिंदा थे उनसे मिलने बड़े बड़ा नेता मातोश्री ही आता था. स्वयं बीजेपी नेता अमित शाह भी मातोश्री ही जाते थे. पर कांग्रेस के साथ गठबंधन में आने के बाद उद्धव ठाकरे सोनिया से मिलने दिल्ली जाने लगे. एक समय था दुनिया का सबसे बड़ा स्टार माइकल जैक्सन भारत आते हैं और सीधे मातोश्री पहुंचते हैं. मातोश्री का रुतबा भी उद्धव ठाकरे ने खत्म केवल गांधी फैमिली के चलते खत्म करना पड़ा.

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