दशहरे पर मुझे याद है कि इंतज़ार बस इस बात का होता था कि कब शाम होते ही मेला घूमने जाएंगे. रामलीला मैदान के बाहर बाज़ार होगा, वहां कुछ दुकानें होंगी, कुछ खाने को मिलेगा और कुछ खेलने को. फिर रावण दहन होगा और रामलीला देखते हुए घर लौटना होगा.
मेले हमारे सामाजिक ताने-बाने का एक बहुत जरूरी हिस्सा रहे हैं. बचपन की यादों में मेलों का मतलब एक अलग ही दुनिया होती थी, जहां लकड़ी के झूलों की घरघराहट, चाट-पकौड़ों की खुशबू और मिट्टी के खिलौने खरीदने की खुशी हुआ करती थी. लेकिन वक्त के साथ मेलों की यह पूरी तस्वीर अब बदल चुकी है. मेले मॉडर्न हो चुके हैं, सुविधा के हिसाब से भी और दुविधा के हिसाब से भी.
आज मेले में मज़े कम हैं और खुद को, परिवार को सुरक्षित करने की चिंता ज्यादा है. पहले के मेलों और आज के मेलों में सबसे बड़ा फर्क उनके स्वरूप और माहौल का है.
पहले मेले पारिवारिक हुआ करते थे. परिवार के सभी सदस्य, छोटे बच्चे और बुजुर्ग एक साथ मिलकर मेले में जाते थे. वहां सुरक्षा का एक भाव था, एक अपनापन था. बच्चे अपनी पसंद के खिलौने और गुब्बारे खरीदने के लिए उत्साहित रहते थे, तो बड़े लोग पूरे मेले में शांति से घूमते थे. वह मेला सिर्फ खरीदारी या घूमने की जगह नहीं था, बल्कि वह सामाजिक मेल-मिलाप का एक जीवंत माध्यम था जहां लोग एक-दूसरे से मिलते थे और अपनेपन की भावना को महसूस करते थे.
पापा के पुराने दोस्त, बाबा के गांव के लोग, त्योहार पर शहर से घर लौटे हुए बच्चे, मेला उन सभी के मिलने की जगह थी, शायद तभी इसका नाम मेला पड़ गया.
लेकिन आज का दौर पूरी तरह बदल चुका है. आज के मेले आनंद और उल्लास की जगह भीड़, लड़ाई और डर का पर्याय बनते जा रहे हैं. मेले में कदम रखते ही सबसे पहला ख्याल मन में यही आता है कि कहीं किसी से कोई बवाल न हो जाए, कोई बात पर भिड़ न जाए.
आज का मेला परिवार के साथ सुकून के कुछ पल बिताने की जगह एक ऐसी चुनौती बन गया है जहां हर वक्त जेब कटने, बच्चों के खोने या किसी अनचाहे झगड़े का डर बना रहता है. कानून-व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन की कमी के कारण मेले अब असुरक्षित महसूस होने लगे हैं. घर से मेले में जाने और वापस आने तक में एक डर है कि कोई किसी को छेड़ ना दे.
इस बदलाव के पीछे एक और बहुत बड़ी वजह है, और वो है सोशल मीडिया का पागलपन. आज के मेलों में जाने वाले लोग मेले का मज़ा लेने या वहां के माहौल को महसूस करने के लिए नहीं जाते, बल्कि उनका पूरा फोकस रील्स बनाने, फोटो खींचने और वीडियो शूट करने पर होता है. हर कोई यह दिखाने में व्यस्त है कि वह कहां गया है और क्या कर रहा है.
इस वर्चुअल दुनिया की अंधी दौड़ ने वास्तविक जीवन के अनुभवों को पूरी तरह से पीछे छोड़ दिया है. लोग अपने आसपास की खूबसूरती या मेलों की असली संस्कृति को देखने के बजाय मोबाइल की स्क्रीन में ही उलझे रहते हैं.
हाल ये है कि शहरों से लेकर गांवों तक मेलों का पूरा फोकस अब बदल गया है. पहले गांव के मेलों में एक सादगी और अपनापन होता था, लेकिन अब वहां भी वही दिखावा, भीड़भाड़ और नौटंकी हावी हो चुकी है. संस्कृति और परंपरा के नाम पर अब केवल दिखावा बचा है. लोग अपनों के साथ समय बिताने के बजाय लाइक्स और व्यूज के पीछे भाग रहे हैं.
ये बदलाव केवल मेलों का नहीं, बल्कि हमारे लाइफस्टाइल का है. हम धीरे-धीरे एक ऐसी दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं जहां सब कुछ सतही और दिखावटी हो गया है. मेले भीड़ और तमाशे का हिस्सा बन रहे हैं, नई पीढ़ी और परिवार अब सोसाइटियों और फ्लैट्स में ही त्योहार मनाना पसंद करते हैं, क्यूंकि बाहर कौन कितना सेफ है इसकी गारंटी नहीं है.
मेले का ज़िंदा रहना ज़रूरी है. क्योंकि ये हम ज़मीन से जोड़ते हैं, अपने पुरखों से जोड़ते हैं. मेलो में भेदभाव नहीं होता, क्यूंकि कोई झूला किसी बच्चे से उसकी जाति नहीं पूछता, उसकी सैलरी नहीं पूछता. अगर मेले और त्योहार सिर्फ सोसाइटी में मनेंगे, तो आने वाली पीढ़ी से हम बहुत कुछ छीन लेंगे. इसलिए ज़रूरी है कि हम मेलों को ज़िंदा करें, उन्हें सुरक्षित करें और ऐसा माहौल दें जहां हर कोई अपने परिवार के साथ जा सके.
मोहित ग्रोवर