ट्रंप की अपनी ही सेना पर 'सर्जिकल स्ट्राइक', ये है ईरान वॉर का नया चैप्‍टर

ईरान जंग के बीच ट्रंप ने अमेर‍िकी सेना प्रमुख रैंडी जॉर्ज को फायर कर द‍िया. टॉप आर्मी जनरल को तत्‍काल प्रभाव से र‍िटायर होने का कहकर अमेर‍िकी प्रशासन ने साफ कर द‍िया है क‍ि जंग पेंटागन नहीं, व्‍हाइट हाउस की मर्जी से लड़ी जाएगी.

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अमेरिका ने ईरान पर कार्रवाई तेज कर दी है. (Photo: AP) अमेरिका ने ईरान पर कार्रवाई तेज कर दी है. (Photo: AP)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 03 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 10:08 AM IST

ट्रंप प्रशासन ने अपनी 'तोप' का मुंह ईरानी सेना के बाद अपनी ही सेना की ओर मोड़ दिया है. अमेरिका के आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ जनरल रैंडी जॉर्ज को "तत्काल प्रभाव" से रिटायर होने के लिए कह दिया गया है. यह कोई सामान्य विदाई नहीं, बल्कि एक झटके में किया गया निष्कासन है. इससे पहले चेयरमैन ऑफ जॉइंट चीफ ऑफ स्‍टाफ जनरल सीक्यू ब्राउन को भी उनके पद से हटाया जा चुका है. दुनिया की सबसे ताकतवर सेना के दो सबसे बड़े सिरों को युद्ध के बीच में काट देना, वाशिंगटन की सत्ता के गलियारों में आए किसी भूकंप से कम नहीं है.

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घरेलू मोर्चे पर ट्रंप की इस फायरिंग को लेकर पहले से कयास लगाए जा रहे थे. खासतौर पर बेनतीजा होती ईरान जंग की झुंझलाहट और पेंटागन के भीतर सुलगते असंतोष से इसे जोड़कर देखा जा रहा है. सवाल यह है कि जब खाड़ी में युद्ध की आग धधक रही हो, तब ट्रंप प्रशासन ने इतना बड़ा जोखिम लेकर क्या संदेश दिया है? क्योंकि, इस कदम से न केवल म‍िल‍िट्री लीडरश‍िप में अस्थिरता का खतरा है, बल्कि मोर्चे पर तैनात फौज के मनोबल टूटने का भी बड़ा रिस्क है.

यूएस डिफेंस सेक्रेटरी पीट हेग्सेथ ने रैंडी जॉर्ज से व्यक्तिगत रूप से रिटायर होने के लिए कहा है. पेंटागन के प्रवक्ता शीन पारनेल ने इस खबर पर मुहर लगाते हुए कहा कि 41वें चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ से पद छोड़ने और तत्काल रिटायर होने के लिए कहा गया है. याद रहे कि जनरल जॉर्ज को 2023 में जो बाइडन द्वारा इस पद पर नियुक्त किया गया था. ट्रंप के समर्थकों के लिए वे 'बाइडन काल के अवशेष' थे.

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टॉप आर्मी जनरलों की इस 'फायरिंग' की गहराई को समझने के लिए हमें इसे तीन प्रमुख रणनीतिक चश्मों से देखना होगा:

1. ईरान युद्ध का बदलता गियर: 'स्टोन एज' की ओर कदम

युद्ध के बीच में आर्मी चीफ को हटाना आत्मघाती भी हो सकता है और क्रांतिकारी भी. विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे ट्रंप के दो साफ संकेत हैं:

तेज और आक्रामक कार्रवाई : ट्रंप ने हाल ही में (1 अप्रैल) कड़े शब्दों में कहा था कि वे ईरान को "स्टोन एज" (Stone Age) में भेजने की ताकत रखते हैं और अगले 2-3 हफ्तों में इस अभियान को निर्णायक मोड़ पर ले जाना चाहते हैं. पुराने जनरलों पर अक्सर 'अत्यधिक सावधानी' बरतने और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के जाल में उलझने का आरोप लगता रहा है. ट्रंप को ऐसे 'वॉर फाइटर्स' चाहिए जो उनके दहशत और दबदबा वाले हमले की योजना को बिना झिझक और बिना किसी कानूनी दुविधा के लागू कर सकें.

ग्राउंड इन्वेजन (जमीनी हमले) की आहट: अमेरिकी डिफेंस सेक्रेटरी पीट हेगसेथ ने हालिया बयानों में ग्राउंड फोर्सेस भेजने की संभावना से इनकार नहीं किया है. रक्षा गलियारों में चर्चा है कि जनरल जॉर्ज जैसे अनुभवी अधिकारी शायद जमीनी हमले के भारी जोखिमों और हताहतों की संख्या को लेकर प्रशासन से असहमत थे. ट्रंप प्रशासन अब अपनी पसंद के उन 'वॉर सपोर्टर' जनरलों को कमान सौंपना चाहता है जो ईरान की सरजमीं पर अमेरिकी बूट्स उतारने के पक्षधर हों.

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2. क्या ट्रंप कमजोर पड़ रहे हैं या शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं?

विपक्ष और लिबरल मीडिया इसे ट्रंप की घबराहट बता रहे हैं, लेकिन राजनीतिक और कूटनीतिक नजरिए से इसे 'कमजोरी' नहीं बल्कि 'कठोर नियंत्रण' के रूप में देखा जा रहा है.

विपक्ष का 'राजनीतिकरण' वाला तर्क: डेमोक्रेट्स और कई सैन्य विश्लेषक इसे सेना का "राजनीतिकरण" कह रहे हैं. उनका तर्क है कि युद्ध के दौरान शीर्ष नेतृत्व बदलना यह दिखाता है कि व्हाइट हाउस और पेंटागन के बीच तालमेल पूरी तरह खत्म हो चुका है. यह सेना के भीतर गुटबाजी पैदा कर सकता है.

ट्रंप का 'सफाई' अभियान: ट्रंप इसे कमजोरी नहीं, बल्कि 'सफाई' कह रहे हैं. उनका संदेश साफ है क‍ि वे किसी भी ऐसे अधिकारी को बर्दाश्त नहीं करेंगे जो उनके आदेशों या उनकी युद्ध नीति पर सवाल उठाए या 'वेट एंड वॉच' की पॉलिसी अपनाए. यह उनकी शक्ति प्रदर्शन की वह शैली है, जहां वे खुद को एकमात्र निर्णायक कमांडर-इन-चीफ के रूप में स्थापित कर रहे हैं.

3. 'यूनिफाइड कमांड' और 'बमों से बातचीत' की रणनीति

यह बदलाव महज पदों का फेरबदल नहीं, बल्कि ट्रंप की 'यूनिफाइड कमांड' रणनीति का हिस्सा है. इसके प्रमुख पिलर कुछ इस तरह हैं:

निष्ठा (Loyalty) सबसे ऊपर: ट्रंप उन जनरलों को चुन-चुनकर हटा रहे हैं जो पिछले प्रशासन के समय नियुक्त हुए थे. वे चाहते हैं कि पेंटागन में केवल वही लोग हों जो उनके "अमेरिका फर्स्ट" विजन और ईरान के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' वाले रवैये के प्रति 100% वफादार हों.

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डराकर झुकाना (Negotiating with Bombs): रक्षा सचिव हेगसेथ का यह बयान कि वे "बमों के जरिए बातचीत" में विश्वास रखते हैं, इस नई रणनीति का केंद्र है. नेतृत्व में यह अचानक बदलाव ईरान के नेतृत्व के लिए एक मनोवैज्ञानिक संदेश भी है—कि अब उनके सामने वह अमेरिका नहीं है जो मेज पर बैठकर समझौता करेगा, बल्कि वह अमेरिका है जो हमला करने के लिए अपनी पूरी लीडरशिप बदल चुका है.

4. ऐतिहासिक जोखिम और अस्थिरता का डर

इतिहास गवाह है कि जब भी किसी राष्ट्र ने सक्रिय युद्ध के दौरान अपने कमांडरों को बदला है, उसके परिणाम अक्सर विनाशकारी रहे हैं. वियतनाम से लेकर इराक युद्ध तक, कमांड और कंट्रोल में जरा सी भी देरी या भ्रम हजारों सैनिकों की जान ले सकता है.

जनरल रैंडी जॉर्ज और सीक्यू ब्राउन जैसे अधिकारियों को हटाने से सेना के मध्य और निचले स्तर के अधिकारियों में असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है. यदि नए नियुक्त जनरल केवल 'जी-हुजूरी' के आधार पर आए और उनके पास जमीनी हकीकत का अनुभव कम हुआ, तो ईरान जैसे भौगोलिक रूप से कठिन देश में अमेरिका बड़ी मुसीबत में फंस सकता है.

5. ट्रंप का 'ज्‍यादा र‍िस्‍क, ज्‍यादा फायदा' वाला जुआ

यह ट्रंप की कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक बेहद जोखिम भरी रणनीति है. वे सैन्य नेतृत्व के पुराने ढांचे को ध्वस्त कर युद्ध को अपने कट्टरपंथी हिसाब से खत्म करना चाहते हैं. ट्रंप जुआ खेल रहे हैं. एक तरफ ईरान है और दूसरी तरफ उनकी अपनी सेना की स्वायत्तता.

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इस 'फायरिंग' ने साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में खाड़ी क्षेत्र में बारूद की गंध और तेज होने वाली है. ट्रंप ने अपनी तोपें लोड कर ली हैं, और अब उनके निशाने पर केवल दुश्मन देश नहीं, बल्कि वे तमाम 'बाधाएं' भी हैं जो उनके और उनकी 'जीत' के बीच खड़ी हैं. देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह 'नई लीडरशिप' ट्रंप को वह निर्णायक जीत दिला पाएगी जिसका वादा वे अमेरिकी जनता से कर रहे हैं, या फिर यह बदलाव अमेरिकी सैन्य इतिहास का एक काला अध्याय साबित होगा.

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