यूपी की सियासत में हर छोटी-बड़ी बात का असर पड़ता है. बांकीपुर-दतिया उपचुनाव के नतीजे सिर्फ दो सीटों की हार नहीं हैं. ये बीजेपी की गलतियों से उभरी उन दरारों को उजागर कर रहे हैं जो अगर यूपी में भी दोहराई गईं तो भारी पड़ सकती हैं. बांकीपुर और दतिया ने साफ दिखा दिया कि जहां पार्टी खुद को मजबूत समझती है, वहां भी जमीन खिसकने में देर नहीं लगती.
पहले बांकीपुर की बात. ये बिहार की वो शहरी सीट थी जो तीन दशक से ज्यादा समय से भाजपा का किला मानी जाती रही. 1995 से लगातार पार्टी यहां जीतती चली आई. नौ महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में भी भारी अंतर से पार्टी ने जीत दर्ज की थी. लोग इसे पार्टी की पकड़ का प्रतीक मानते थे. लेकिन उपचुनाव में वही किला एक झटके में हाथ से निकल गया. करीब बीस हजार वोटों के अंतर से हार हुई. ये हार अचानक नहीं आई. धीरे-धीरे स्थानीय असंतोष बढ़ता रहा, संगठन में ढिलाई आई और लोगों का भरोसा कमजोर पड़ता गया. पुरानी जीतों और बड़े पदों के सहारे वोट मांगने की आदत ने जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर दिया. नतीजा ये निकला कि एक ऐसा गढ़, जिसे अपराजेय माना जाता था, एक नए चेहरे के सामने ढह गया.
अब दतिया की कहानी. मध्य प्रदेश की ये सीट भी सत्ताधारी पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का मुद्दा बन चुकी थी. सरकार अपने कब्जे में होने के बावजूद बीजेपी को यहां लगातार दूसरी बार हार झेलनी पड़ी. करीब छह हजार वोटों के अंतर से सीट गई. लेकिन असली कमजोरी नतीजों से पहले ही दिख गई. पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा जैसे एक वरिष्ठ और प्रभावशाली स्थानीय चेहरे को टिकट न देने से पूरा संगठन हिल गया. समर्थक सड़कों पर उतर आए, विरोध प्रदर्शन हुए, इस्तीफे दिए गए और पार्टी के अंदर की लड़ाई सबके सामने आ गई. जो सीट देखने में मजबूत लग रही थी, वह आंतरिक दरार की वजह से हाथ से छिटक गई. ये साबित करता है कि बाहर की ताकत अंदर की एकता के बिना टिक नहीं पाती.
यूपी के लिहाज से ये दोनों हार चेतावनी हैं. पूरा राज्य कई ऐसी सीटों से भरा पड़ा है जहां पार्टी मजबूत नजर आती है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग होती है. बीजेपी के लिए उन कमजोरियों पर गौर करना जरूरी है जो यूपी चुनाव में भारी पड़ सकती हैं.
पहली कमजोरी फीडबैक सिस्टम की है. बांकीपुर और दतिया दोनों जगह स्थानीय नाराजगी पहले से मौजूद थी. लेकिन ऊपर तक सही जानकारी नहीं पहुंची या पहुंचकर भी नजरअंदाज कर दी गई. यूपी में बूथ स्तर से लेकर जिला स्तर तक असंतोष के संकेत अक्सर दब जाते हैं. अगर फीडबैक सिस्टम कमजोर रहा तो पार्टी को पता ही नहीं चलेगा कि कहां जमीन खिसक रही है.
दूसरी कमजोरी उम्मीदवार चयन की है. दतिया में टिकट का फैसला स्थानीय समीकरणों को नजरअंदाज करके लिया गया. नतीजा आंतरिक विद्रोह के रूप में निकला. यही नजारा बांकीपुर में भी देखने को मिला. जहां नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर चुनाव से पहले न सिर्फ उम्मीदवार बदले गए, बल्कि अंत में एक कमजोर प्रत्याशी ही उतारा गया. यूपी में जाति, क्षेत्र और स्थानीय प्रभाव बहुत मायने रखते हैं. अगर उम्मीदवार चयन सिर्फ ऊपर की पसंद पर आधारित रहा और जमीनी ताकत को नजरअंदाज किया गया तो कई सीटें आसानी से फिसल सकती हैं.
तीसरी कमजोरी नेतृत्व के फैसलों में है. बड़े फैसले स्थानीय हकीकत से कटकर लिए गए. यूपी जैसे जटिल राज्य में नेतृत्व अगर सिर्फ दिल्ली या लखनऊ की नजर से फैसले लेता रहा तो मैदान में लड़ाई कमजोर पड़ेगी. स्थानीय नेताओं को साथ न लेना और उनकी नाराजगी को हल्के में लेना महंगा साबित हो सकता है.
चौथी कमजोरी कम्युनिकेशन और नैरेटिव बनाने की है. जो भाजपा हाल ही में बंगाल जैसे मुश्किल राज्य को जीतकर आई है, वह आसान से दिख रहे दो उपचुनाव में अपना नैरेटिव मजबूती से नहीं बना पाई. विपक्ष ने स्थानीय मुद्दों और असंतोष को भुनाने में सफलता पाई. यूपी में विपक्ष पहले से ही कई नैरेटिव तैयार कर रहा है. राम मंदिर चंदा चोरी, जातिगत असंतोष और भी न जाने क्या क्या. अगर पार्टी सिर्फ पुराने नारों पर निर्भर रही और नए सवालों का जवाब नहीं दे पाई तो नैरेटिव की लड़ाई हार जाएगी.
पांचवी और सबसे खतरनाक कमजोरी हार को हल्के में लेने का रवैया है. भाजपा के अधिकृत प्रवक्ता कह रहे हैं कि दतिया में हमारी हार का अंतर पहले से कम हुआ है... ये पहले से कांग्रेस की सीट थी... आदि-आदि. उपचुनाव की हार को अक्सर स्थानीय कारण बताकर टाल दिया जाता है. लेकिन बांकीपुर और दतिया ने दिखाया कि ये हार सिर्फ स्थानीय नहीं थीं. इनमें संगठनात्मक और आंतरिक कमजोरियां साफ झलक रही थीं. यूपी चुनाव से पहले अगर इन संकेतों को हल्के में लिया गया तो बड़ी परीक्षा में वही गलतियां दोहराई जाएंगी.
यूपी के लिए बीजेपी को क्या सबक मिले
पूरा यूपी कई बांकीपुर और दतिया जैसी सीटों से भरा पड़ा है. हर जगह की अपनी चुनौतियां हैं. जहां देखने में भाजपा मजबूत नजर आती है, वहां चुनाव में मुकाबला आसान नहीं होता. पार्टी को विपक्ष की रणनीति और उसके नैरेटिव से तो लड़ना ही है, लेकिन बांकीपुर और दतिया बता रहे हैं कि असली लड़ाई अपने घर के भीतर से शुरू करनी होगी. अगर आंतरिक दरार, कमजोर फीडबैक, गलत उम्मीदवार चयन और आत्मसंतुष्टि का रवैया बना रहा तो यूपी में भी वही कहानी दोहराई जा सकती है. समय अभी है, सबक सीखने का. वरना ये छोटी हार बड़ी कीमत वसूल सकती हैं.
धीरेंद्र राय