कौन हैं 35 साल की नाजिया इलाही खान? उज्जैन के रामघाट पर किया पूर्वजों का तर्पण, बोलीं- जिंदगी का खूबसूरत दिन

उज्जैन के रामघाट पर सर्व पितृ अमावस्या के दिन 35 साल की वकील नाजिया इलाही खान ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण किया. मुस्लिम समुदाय से आने वाली नाजिया ने इस अनुष्ठान को अपने जीवन का सबसे खूबसूरत दिन बताया. जानिए कौन हैं नाजिया इलाही खान और उज्जैन में तर्पण करने के पीछे उन्होंने क्या वजह बताई.

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पेशे से वकील हैं नाजिया इलाही खान. (Photo: ITG) पेशे से वकील हैं नाजिया इलाही खान. (Photo: ITG)

संदीप कुलश्रेष्ठ

  • उज्जैन,
  • 11 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 12:23 PM IST

उज्जैन का रामघाट है. सामने शिप्रा नदी बह रही है. सर्व पितृ अमावस्या का दिन... लोग अपने पूर्वजों को याद करने और उनके लिए तर्पण करने पहुंचे थे. इसी बीच एक महिला घाट पर पहुंचती हैं. संकल्प लेती हैं. अपने पूर्वजों के लिए जल अर्पित करती हैं. पिंडदान और तर्पण की रस्में निभाती हैं. अब यहां तक की कहानी में ऐसा कुछ नहीं है, जो आपको चौंकाए. पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों के लिए यही तो करते हैं. लेकिन इस कहानी में एक बात है, जिसने इसे चर्चा में ला दिया.

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महिला का नाम है नाजिया इलाही खान. वह मुस्लिम समुदाय से आती हैं और पेशे से वकील हैं. उज्जैन पहुंचकर उन्होंने अपने पूर्वजों के लिए तर्पण किया. इसके बाद मीडिया से बातचीत में नाजिया ने कहा कि अपने पूर्वजों के लिए तर्पण करने के बाद उनका मन हल्का हो गया. उन्होंने अपनी जिंदगी के 35 साल में लिए गए फैसलों में उज्जैन आकर तर्पण करने के निर्णय को सबसे खास बताया. 

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दरअसल, नाजिया इलाही खान 10 अक्टूबर को सर्व पितृ अमावस्या के दिन मध्य प्रदेश के उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे स्थित रामघाट पर पहुंचीं थीं. यह वह दिन है, जब पितृ पक्ष के दौरान अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण करने वाले लोग धार्मिक अनुष्ठान करते हैं. हिंदू मान्यताओं में पितरों को जल अर्पित करना और उनके निमित्त श्राद्ध कर्म करना पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका है.

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नाजिया ने भी रामघाट पर संकल्प लिया. अपने पूर्वजों के लिए जलदान, तर्पण और पिंडदान की रस्में निभाईं. उन्होंने अपने पूर्वजों के लिए मोक्ष की कामना की. उनके इस अनुष्ठान में एक और बात जुड़ी थी. नाजिया ने अपने पूर्वजों द्वारा बकरीद के मौके पर जानवरों की कुर्बानी किए जाने का जिक्र किया. उन्होंने इसके लिए भी क्षमा याचना की बात कही. पूजा के बाद उन्होंने मीडिया से बातचीत की. नाजिया के मुताबिक, अनुष्ठान के बाद उनका मन हल्का हो गया. उन्होंने इस दिन को अपने जीवन का सबसे खूबसूरत दिन बताया.

यह भी पढ़ें: यूक्रेन से गया आईं एलिस, रूस-इटली-जर्मनी से भी पहुंचे लोग... विदेशी श्रद्धालुओं ने पितरों के लिए गया में किया पिंडदान

रामघाट पर तर्पण के बाद नाजिया इलाही खान ने अपने धार्मिक विचारों पर खुलकर बात की. अपनी बात समझाने के लिए उन्होंने मुगल शासक औरंगजेब का उदाहरण दिया. उन्होंने औरंगजेब के पारिवारिक संबंधों और उसके ऐतिहासिक आचरण का जिक्र करते हुए सवाल उठाए कि वह इन सब बातों से क्या सीखें. नाजिया ने कहा कि उन्होंने सनातन परंपरा में तर्पण और मोक्ष की अवधारणा को समझा है. इसी के आधार पर उन्होंने अपने पूर्वजों के लिए यह अनुष्ठान करने का फैसला लिया.

कौन हैं 35 साल की नाजिया इलाही खान?

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नाजिया इलाही खान पेशे से वकील हैं. वह सुप्रीम कोर्ट में वकालत करती हैं. उज्जैन में तर्पण करने के बाद उन्होंने मीडिया से बातचीत में अपनी धार्मिक मान्यताओं और विचारों को सामने रखा. फिलहाल उनकी चर्चा की वजह उनका उज्जैन पहुंचना और अपने पूर्वजों के लिए तर्पण करना है. नाजिया ने बातचीत के दौरान सोशल मीडिया पर ट्रोल किए जाने का भी जिक्र किया. उनका कहना था कि उनके सवालों का जवाब लोगों के पास नहीं है. उन्होंने जिन मुद्दों पर सवाल उठाए हैं, उनके समर्थन में तथ्य रखे हैं. इसी वजह से उन्हें ट्रोल किया जा रहा है.

यह भी पढ़ें: पितृ पक्ष, पूर्वज और पिंडदान... देश-दुनिया से बिहार के गया पहुंच रहे लोग, क्या है इस परंपरा की कहानी?

क्या संविधान एक मुस्लिम महिला को तर्पण करने की इजाजत देता है? नाजिया ने अपनी बात रखते हुए भारतीय संविधान का हवाला भी दिया. उन्होंने सवाल किया कि अगर वह मुस्लिम समुदाय से आती हैं, तो क्या इसका मतलब यह है कि वह तर्पण नहीं कर सकतीं? उन्होंने पूछा कि क्या संविधान उन्हें अपनी इच्छा से धार्मिक अनुष्ठान करने की अनुमति नहीं देता?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता और अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है. नाजिया ने बिहार के गया का उदाहरण भी दिया. गया में पितरों के लिए पिंडदान करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है.

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उन्होंने कहा कि वहां अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोग भी तर्पण करने पहुंचते हैं. उन्होंने कहा कि धार्मिक परंपराओं को समझने और उनका पालन करने के मामले में व्यक्ति की अपनी इच्छा भी मायने रखती है. उन्होंने कहा कि जिस तरह उन्होंने सनातन परंपरा को समझा और अपनाया है, उसके बाद आगे उनके लिए एक ही रास्ता बचा है.

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