पितृ पक्ष, पूर्वज और पिंडदान... देश-दुनिया से बिहार के गया पहुंच रहे लोग, क्या है इस परंपरा की कहानी?

बिहार के गया में फल्गु नदी के किनारे लोग बैठे हैं. सामने पूजा की सामग्री है, हाथों में पिंड है और मंत्रों के बीच किसी अपने को याद किया जा रहा है. इन लोगों में रूस, यूक्रेन, इटली और जर्मनी जैसे देशों से आए लोग भी हैं. आखिर गया में पिंडदान की ऐसी क्या मान्यता है कि लोग हजारों किलोमीटर दूर से यहां पहुंच रहे हैं? और पितृ पक्ष में तर्पण की ये पूरी कहानी क्या है?

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10 अक्टूबर तक होगा पूर्वजों के लिए पिंडदान. (Photo: ITG) 10 अक्टूबर तक होगा पूर्वजों के लिए पिंडदान. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • गया,
  • 04 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 2:26 PM IST

बिहार में गया की सुबह है. फल्गु नदी के किनारे लोगों की आवाजाही शुरू हो चुकी है. कोई पूजा की तैयारी कर रहा है. कोई अपने साथ आए पुरोहित से कुछ पूछ रहा है. कहीं मंत्रोच्चार हो रहा है. और फिर नजर थोड़ी देर के लिए रुकती है. क्योंकि इस भीड़ में कुछ चेहरे ऐसे हैं, जिन्हें देखकर आप शायद दोबारा देखेंगे. ये चेहरे बिहार के नहीं हैं. भाषा भी अलग है. कपड़े भी अलग हैं. लेकिन काम वही है. पितरों के लिए पिंडदान.

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रूस से लोग आए हैं. यूक्रेन से श्रद्धालु पहुंचे हैं. इटली और जर्मनी से भी लोग यहां पहुंचे. यानी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लोग बिहार के गया में फल्गु नदी के किनारे बैठे हैं. अगर सिर्फ धार्मिक पर्यटन करना होता तो बात अलग थी. लेकिन ये लोग अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान और तर्पण कर रहे हैं. यूक्रेन की एलिस जंद्रा भी गया पहुंचीं. उन्होंने कहा कि वह अपने पूर्वजों की शांति और मोक्ष की कामना से यहां आई हैं. उनके साथ दूसरे देशों के श्रद्धालु भी हैं.

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कहानी सिर्फ गया तक पहुंचने की नहीं है. कहानी उस भरोसे की है, जिसने लोगों को हजारों किलोमीटर दूर से यहां तक पहुंचा दिया. अब थोड़ा पीछे चलते हैं. पितृ पक्ष... नाम सुनते ही हमारे घरों में कई चीजें याद आ जाती हैं. पितरों का श्राद्ध. तर्पण. कौओं को भोजन. पुरोहित. पूजा-पाठ.

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आखिर पितृ पक्ष है क्या? दरअसल, यह वह समय है, जब हिंदू परंपरा में लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनके लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं. यानी जो लोग अब हमारे बीच नहीं हैं, उनके प्रति श्रद्धा जताने का समय. पितृ पक्ष की अवधि को आम तौर पर 15 दिनों का माना जाता है. इन दिनों लोग अपने परिवार के दिवंगत सदस्यों के लिए अलग-अलग धार्मिक कर्म करते हैं. 

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भारत में ऐसी परंपरा के लिए कई जगहें हैं. फिर गया का नाम इतना खास क्यों? इसका जवाब गया से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में मिलता है. गया में विष्णुपद मंदिर है. पास ही फल्गु नदी है. धार्मिक मान्यताओं में इस इलाके को पितरों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया है. इसी वजह से पितृ पक्ष आते ही गया का माहौल बदल जाता है.

देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुंचने लगते हैं. महाराष्ट्र से आए सेवक राम भी इन्हीं श्रद्धालुओं में शामिल हैं. वह अपने माता-पिता और परिवार के दूसरे दिवंगत सदस्यों के लिए पिंडदान करने पहुंचे. उनके लिए ये सिर्फ एक रस्म नहीं है. ये अपने परिवार के उन लोगों को याद करने का तरीका है, जो अब साथ नहीं हैं. यही बात शायद गया आने वाले ज्यादातर लोगों को जोड़ती है.

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गया में पिंडदान की परंपरा को बहुत पुराना और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है. अब जरा पिंडदान को समझिए. पिंड आखिर है क्या? आमतौर पर चावल, आटा और धार्मिक विधान के अनुसार तैयार की गई सामग्री से पिंड बनाया जाता है. इसे पूर्वजों को समर्पित किया जाता है. इसके साथ तर्पण होता है. जल अर्पित किया जाता है. पूर्वजों का स्मरण किया जाता है. सुनने में ये सब बहुत साधारण लग सकता है.

लेकिन जो व्यक्ति किसी अपने पूर्वज की तस्वीर सामने रखकर ये कर रहा है, उसके लिए शायद ये उतना साधारण नहीं है. क्योंकि उस वक्त पूजा की थाली के सामने सिर्फ एक पिंड नहीं होता. एक पूरी याद होती है. किसी के पिता की. किसी की मां की. किसी के दादा की. किसी की दादी की. किसी ऐसे व्यक्ति की भी, जिसे उसने शायद देखा तक नहीं. फिर भी उसका नाम परिवार में बचा हुआ है. और उसी नाम के साथ कोई हजारों किलोमीटर दूर से गया पहुंचता है.

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गया में पितृ पक्ष के दौरान आपको भारत का छोटा सा नक्शा दिखाई देता है. महाराष्ट्र से कोई आया है. राजस्थान से कोई. उत्तर प्रदेश से कोई. असम से कोई. बिहार के अलग-अलग जिलों से लोग हैं. और अब इस तस्वीर में दूसरे देशों के लोग भी दिखाई दे रहे हैं. रूस. यूक्रेन. इटली और जर्मनी... देश बदल गए. भाषा बदल गई. लेकिन फल्गु के किनारे बैठकर अपने पूर्वजों को याद करने की भावना एक जैसी दिखाई देती है.

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गया जिला प्रशासन ने भी पितृ पक्ष के दौरान बड़ी संख्या में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षा और दूसरी व्यवस्थाएं की हैं. विदेशी श्रद्धालुओं के पिंडदान वाले स्थान पर भी सुरक्षा व्यवस्था की गई है. 

अब एक सवाल और... क्या ये सिर्फ एक धार्मिक आयोजन है? या इसके पीछे कुछ और भी है? दरअसल, गया आने वाले हर व्यक्ति की वजह अलग हो सकती है. किसी को पिंडदान करना था. किसी ने परिवार की पुरानी परंपरा निभाने के लिए यात्रा की. किसी के लिए ये धार्मिक आस्था है. और किसी के लिए अपने पूर्वजों से जुड़ने का तरीका.

विदेश से आए लोगों की मौजूदगी इस कहानी को और खास बना देती है. क्योंकि जब कोई व्यक्ति अपने देश से इतनी दूर आकर किसी परंपरा में शामिल होता है, तो मन में सवाल आता है कि उसे इस परंपरा तक लेकर कौन आया? उसने गया के बारे में कैसे जाना? और सबसे बड़ी बात, पितरों के लिए पिंडदान करने की इच्छा उसके मन में कैसे पैदा हुई? इन सवालों के जवाब हर श्रद्धालु की अपनी कहानी में मिल सकते हैं.

''...पुरोहित लोकनाथ गौड़ के मुताबिक, अलग-अलग देशों से विदेशी महिलाएं भी यहां आई हैं. उनका दावा है कि कई लोग सनातन परंपरा से जुड़े. इस घटनाक्रम की सबसे खूबसूरत तस्वीर शायद सबसे पहले रिश्ते की है. एक इंसान अपने पूर्वज को याद कर रहा है. बस. यही पितृ पक्ष का सबसे सीधा अर्थ भी समझा जा सकता है. हम जिस परिवार का हिस्सा हैं, उसकी शुरुआत हमसे नहीं हुई. हमसे पहले भी लोग थे. उन्होंने परिवार बनाया. जमीन बनाई. रिश्ते बनाए. कहानियां छोड़ीं. और फिर एक दिन चले गए. पीछे रह गए उनके नाम. उनकी तस्वीरें. उनकी यादें...''

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पितृ पक्ष उन यादों को एक धार्मिक रूप में सामने लाने का मौका देता है. और गया उस परंपरा का एक बड़ा केंद्र है. इसलिए इन दिनों अगर आप गया की तस्वीरें देखें और फल्गु नदी के किनारे बैठे हजारों लोगों को देखें, तो वहां सिर्फ भीड़ मत देखिए. उस भीड़ में कोई अपने पूर्वज को याद कर रहा है.

और शायद कोई रूस या यूक्रेन से आया व्यक्ति भी अपने उन पूर्वजों को याद कर रहा है, जिनसे उसका रिश्ता पीढ़ियों पुराना है. गया की ये कहानी देश से निकलकर दुनिया तक पहुंच जाती है. और फल्गु के किनारे बैठा एक सवाल सबको जोड़ देता है. हमसे पहले जो लोग इस दुनिया में थे, उनके लिए हम क्या कर सकते हैं? पितृ पक्ष में बहुत से लोगों का जवाब है. उन्हें याद कर सकते हैं. तर्पण कर सकते हैं. पिंडदान कर सकते हैं.

और शायद यही वजह है कि हर साल पितृ पक्ष आते ही हजारों लोग गया की तरफ चल पड़ते हैं. कोई कुछ सौ किलोमीटर से. कोई हजारों किलोमीटर से. मंजिल एक. गया... और सामने एक प्राचीन परंपरा. पितरों की याद. और फल्गु नदी के किनारे किया जाने वाला पिंडदान. यही पितृ पक्ष की कहानी है. एक ऐसी परंपरा, जिसमें वर्तमान अपने अतीत से मिलता है. और बिहार का गया इस मुलाकात का सबसे बड़ा पड़ाव बन जाता है.

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(इनपुट- पंकज कुमार)

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