महाकाल की नगरी उज्जैन में आज तक के धर्म संसद के मंच पर संतों ने हिस्सा लिया. सेशन 'महाकाल की नगरी में कुंभ' में देश के प्रमुख संतों ने कुंभ की परंपरा, धर्म के वास्तविक अर्थ और युवाओं को जोड़ने के मुद्दे पर खुलकर अपने विचार रखे. इस चर्चा में स्वामी डॉ. सुमंगदानंद गिरि जी महाराज, महामंडलेश्वर स्वामी शैलेशानंद गिरि और महामंडलेश्वर विशाल दास जी महाराज शामिल हुए.
उज्जैन के माउंटतीर्थ पीठ के परमाध्यक्ष स्वामी डॉ. सुमंगदानंद गिरि जी महाराज ने कुंभ के बदलते स्वरूप पर चिंता जताते हुए कहा कि आज हम अमृत तत्व को भूलकर केवल कुंभ की भौतिक व्यवस्थाओं में उलझ कर रह गए हैं, उन्होंने याद दिलाया कि कुंभ की परंपरा संतों के आगमन और कल्पवास से शुरू हुई थी. यह आयोजन मूल रूप से संतों की साधना के लिए था, जहां वे साधना से प्राप्त आध्यात्मिक अनुभूतियों को एकत्र करते थे. समाज संतों के रहने-खाने की व्यवस्था करता था और संत समाज को धर्म का संदेश देते थे, जिससे पूरे समाज का लाभ होता था.
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धर्म अनुभव और विज्ञान है, इसे सस्ता न बनाएं
युवाओं को धर्म से जोड़ने के सवाल पर स्वामी सुमंगदानंद जी ने कहा कि हमारा धर्म पूर्णतः वैज्ञानिक है और अनुभव का विषय है. जब तक यह विज्ञान-सम्मत रूप युवाओं तक नहीं पहुंचेगा, तब तक बात नहीं बनेगी, धर्म को आसान और सस्ता बनाने की प्रवृत्ति पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि महादेव पर केवल एक लोटा जल, बेलपत्र या 200 रुपये का धतूरा चढ़ा देना ही धर्म नहीं है, हमने धर्म को बहुत सस्ता बना दिया है, जबकि धर्म की गहराई इससे कहीं अधिक है.
उज्जैन तीर्थाटन का केंद्र है, टूरिज्म का नहीं
कुंभ में आ रहे बदलावों पर जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी शैलेशानंद गिरि ने कहा कि अगर कोई केवल मनोरंजन के लिए जाता है तो वह पर्यटन है, हमारे धार्मिक स्थल मनोरंजन या टूरिज्म के केंद्र नहीं हो सकते, उज्जैन तीर्थाटन की भूमि है. उन्होंने कहा कि आज युवाओं के मन में ढेरों सवाल हैं, लेकिन उनका जवाब देने वाला कोई नहीं है और संसद से लेकर सड़क तक लोग सार्थक चर्चा से भाग रहे हैं.
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धर्म को सत्ता और ब्रांडिंग का जरिया न बनाएं
स्वामी शैलेशानंद गिरि ने आगे कहा कि आज Gen Z, मलेनियल्स और Gen Alpha सभी पीढ़ियों को एक साथ मिलकर काम करने की जरूरत है, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि यदि हम धर्म को केवल सत्ता प्राप्ति का रास्ता या अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग का मुद्दा बना लेंगे, तो इससे धर्म का मूल उद्देश्य खत्म हो जाएगा.
संतों के लिए कुंभ की उपयोगिता पर बात करते हुए निर्वाणी अनी अखाड़ा के महामंडलेश्वर विशाल दास जी महाराज ने कहा कि कुंभ केवल एक धार्मिक मेला नहीं, बल्कि संतों का पवित्र समागम है, यह वह मंच है जहां ज्ञान, अध्यात्म और समाज कल्याण के लिए विचारों का गहन मंथन होता है.
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