नेपाल में आए फ्लैश फ्लड ने कैलाश मानसरोवर यात्रा की परेशानियों को फिर से उजागर कर दिया है. इस प्राकृतिक आपदा में कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर निकले दर्जनों यात्रियों की मौत हो गई है. प्राचीन काल से संन्यासी और भक्त हिमालय के अलग-अलग दर्रो जैसे लिपुलेख और नाथू ला से पैदल मानसरोवर जाते थे.
कैलाश तिब्बत में है और इसकी ऊंचाई 22,000 फीट है. हालांकि ये माउंट एवरेस्ट से छोटा है. लेकिन इसका धार्मिक महत्व शिखर को छूता है.
चार दिशाओं से चार तरह का दिखने वाला पिरामिड आकार का ये पहाड़ न सिर्फ़ देखने में अद्भुत है, बल्कि हिंदू, बौद्ध धर्म के लिए पवित्र आस्था का केंद्र भी है.
कैलाश तिब्बती जनमानस और लोक कथाओं में सासों की तरह रचा बसा है. तिब्बती लोग इसे खांग रिनपोछे यानी कि बर्फ का कीमती गहना कहते हैं. इसके पास दो जुड़वां झीलें हैं. मानसरोवर झील, जहां हर साल भारत से लोग जाते हैं. इसके बगल में ही है राक्षस ताल, जो खारे पानी का है. दोनों बिल्कुल पास हैं, लेकिन पानी कभी नहीं मिलता.
मानसरोवर झील और कैलाश पर्वत के बीच की दूरी लगभग 30 से 40 किलोमीटर है. सड़क मार्ग से ये दूरी करीब 30-35 किलोमीटर तक है. कैलाश पर्वत मानसरोवर के उत्तर में स्थित है. तीर्थयात्री आमतौर पर पहले मानसरोवर जाते हैं, वहां स्नान/दर्शन करते हैं, फिर दारचेन पहुंचकर कैलाश की परिक्रमा शुरू करते हैं.
कैलाश का रास्ता क्यों बंद हुआ?
1950-51 में जब तिब्बत पर चीन ने कब्जा किया तो कैलाश मानसरोवर यात्रा बंद हो गई. कई रिपोर्ट में बताया जाता है कि 1935 से कैलाश मानसरोवर यात्रा बंद थी.
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार 1930 में लगभग 730 भारतीय तीर्थयात्रियों ने इस पवित्र पर्वत की यात्रा की थी. 1950 में तिब्बत पर चीन के कब्ज़े तक तीर्थयात्रियों की संख्या सैकड़ों में ही रही; इसके बाद 1951 में कैलाश यात्रा पहले यूरोपियनों के लिए और फिर 1959 में भारतीयों के लिए बंद कर दी गई.
1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद तो सीमा पूरी तरह तनाव का क्षेत्र बन गई और भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए कैलाश का रास्ता बंद हो गया. यानी कैलाश भारतीयों की आस्था में मौजूद था, लेकिन वहां पहुंचने का रास्ता भू-राजनीति ने बंद कर दिया था.
इसके बाद इस मामले में रोल आता है बीजेपी के सीनियर नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी का.
1961-62 के भारत चीन जंग की कड़वाहट धीरे धीरे संबंधों की गर्माहट में घुलने लगी. 1970 के दशक के आखिर में भारत-चीन संबंधों में धीरे-धीरे बदलाव के संकेत मिलने लगे.
इसी पृष्ठभूमि में एंट्री होती है सुब्रह्मण्यम स्वामी की
हॉर्वर्ड में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर सुब्रह्मण्यम स्वामी की चीनी भाषा पर अच्छी खासी पकड़ थी. सुब्रह्मण्यम स्वामी कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि तब चीन के उप प्रधानमंत्री रहे देंग शियाओ पिंग से उनकी अच्छी पटती थी.
1978 में स्वामी जनता पार्टी के सांसद थे. 1978 में वे बीजिंग गए, इस दौरान उन्होंने देंग शियाओ पिंग कैलाश मानसरोवर की यात्रा का मुद्दा उठाया. रिपोर्ट के मुताबिक पहली बार में तो देंग शियाओ पिंग को इस पर्वत के बारे में जानकारी ही नहीं थी. लेकिन उन्होंने स्वामी से वादा किया कि वे इस बारे में जांच करवाएंगे. जब स्वामी 1980 में फिर से चीन आए तो उन्हें चीन की ओर से बताया गया कि इस जगह की सड़कें की मरम्मत और मंदिर का काम पूरा करने के बाद इसे खोल दिया जाएगा.
अप्रैल 1981 में स्वामी देंग शियाओ पिंग से फिर से मिले. इस बार चीन के विदेश मंत्रालय ने बताया कि यात्रा की तैयारी पूरी हो गई है.
दो महीने बाद चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि यात्रा की तैयारी पूरी हो गई है.
एक इंटरव्यू में स्वामी ने कहा था, "चीन से हमारी बहुत दोस्ती थी, देंग शियाओ पिंग उस समय थे, अब नहीं हैं, उन्होंने मुझसे कहा कि तुम कुछ बताओ जो तुम्हें पसंद हो, मैं दे दूंगा. तो मैंने कहा कि आप मानसरोवर खोल दीजिए. उन्होंने बाद में इस रूट को खोल दिया."
स्वामी ने एक कार्यक्रम में इस यात्रा के दौरान अपने अनुभवों को बताया था. उन्होंने चीनी सरकार ने कहा था कि इस यात्रा का पहला तीर्थ यात्री उन्हें होना पड़ेगा. तो वे इस पर तैयार हो गए.
इसके बाद जुलाई 1981 में सुब्रह्मण्यम स्वामी की अगुआई में 60 तीर्थयात्रियों का दल अल्मोड़ा और लिपुलेख के रास्ते से कैलाश मान सरोवर की यात्रा के लिए रवाना हुआ.
सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इंटरव्यू के दौरान बताया कि देंग शियाओ पिंग ने उनसे कहा था कि वे इस यात्रा में सिर्फ हिन्दुओं को ही आने की इजाजत देंगे. क्योंकि ये हिन्दुओं का पवित्र स्थल है. स्वामी के मुताबिक देंग शियाओ पिंग ने उनसे कहा था कि वे इसे टूरिज्म के लिहाज से विकसित नहीं होने देंगे.
आज यात्रा भारत सरकार द्वारा दो मार्गों लिपुलेख और नाथू ला से कैलाश मानसरोवर की यात्रा आयोजित होती है.
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