यहां 75 दिन तक मनाया जाता है दशहरा, फिर भी क्यों नहीं जलाते रावण का पुतला? वजह है खास

छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा करीब 75 दिनों तक मनाया जाता है. देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां रावण का पुतला नहीं जलाया जाता. इस त्योहार का मुख्य केंद्र मां दंतेश्वरी की पूजा, विशाल रथ यात्रा और आदिवासी समाज की सदियों पुरानी परंपराएं हैं. जानिए बस्तर दशहरे की शुरुआत कैसे हुई और यह बाकी जगहों से इतना अलग क्यों है.

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जानिए बस्तर दशहरे की शुरुआत कैसे हुई और यह बाकी जगहों से इतना अलग क्यों है. ( Photo: ITG) जानिए बस्तर दशहरे की शुरुआत कैसे हुई और यह बाकी जगहों से इतना अलग क्यों है. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 21 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 9:47 AM IST

भारत में दशहरा आते ही रावण के बड़े-बड़े पुतले, आतिशबाजी और उनके दहन की तस्वीरें सामने आने लगती हैं. मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था और बुराई पर अच्छाई की जीत हुई थी. लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा मनाने का तरीका बिल्कुल अलग है. यहां न रावण का पुतला जलाया जाता है और न ही यह त्योहार सिर्फ एक दिन का होता है. बस्तर दशहरा करीब 75 दिनों तक चलता है. इस दौरान देवी-देवताओं की पूजा होती है, विशाल रथ निकाला जाता है और आदिवासी समाज की सदियों पुरानी परंपराएं देखने को मिलती हैं.

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बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में मनाया जाता है. इसका मुख्य केंद्र जगदलपुर शहर है. इसे भारत के सबसे लंबे समय तक चलने वाले पारंपरिक त्योहारों में से एक माना जाता है. इसकी परंपरा करीब 600 साल पुरानी है. ऐतिहासिक मान्यताओं के मुताबिक, इसकी शुरुआत 15वीं सदी में बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल के दौरान हुई थी. यह त्योहार सावन महीने की हरियाली अमावस्या से शुरू होता है. इसके बाद लगभग ढाई महीने तक अलग-अलग धार्मिक रस्में निभाई जाती हैं. इस दौरान बस्तर के कई गांवों से लोग अपने देवी-देवताओं की परंपराओं के साथ शामिल होते हैं. पूजा-पाठ, रथ निर्माण, देवी-देवताओं का स्वागत और पारंपरिक आयोजनों के बाद इस त्योहार का समापन होता है.

यहां रावण का पुतला क्यों नहीं जलाया जाता?
बस्तर दशहरे की सबसे खास बात यही है कि यहां रावण दहन नहीं होता. देश के ज्यादातर हिस्सों में दशहरा भगवान राम और रावण की कथा से जुड़ा है, लेकिन बस्तर में इस त्योहार का मुख्य केंद्र मां दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा है. बस्तर के लोगों के लिए यह पर्व उनकी आस्था, आदिवासी संस्कृति और पुरानी परंपराओं से जुड़ा हुआ है. इसलिए यहां दशहरा मनाने का तरीका भी अलग है. इसका मुख्य उद्देश्य रावण के वध का जश्न मनाना नहीं, बल्कि देवी की आराधना करना और समाज की पुरानी परंपराओं को आगे बढ़ाना है. मां दंतेश्वरी को बस्तर क्षेत्र की आराध्य देवी माना जाता है. उनकी पूजा और उनसे जुड़ी परंपराएं इस त्योहार में खास जगह रखती हैं. यही वजह है कि बस्तर दशहरा को देश के दूसरे दशहरा आयोजनों से अलग पहचान मिली हुई है.

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जंगल से लाई जाती है पवित्र लकड़ी, फिर बनता है रथ
बस्तर दशहरे की शुरुआत पाट जात्रा नाम की रस्म से होती है. इसमें जंगल से लाई गई लकड़ी की पूजा की जाती है. इस रस्म को रथ बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत से जुड़ा माना जाता है. इसके बाद स्थानीय कारीगर पारंपरिक तरीके से विशाल रथ तैयार करते हैं. इस काम में बस्तर के लोगों की खास भूमिका होती है. रथ बनाना केवल एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही कला और परंपरा को आगे बढ़ाने का तरीका भी है. त्योहार के दौरान कई दूसरी रस्में भी निभाई जाती हैं. इनमें काछन गादी, जोगी बिठाई और मावली परघाव जैसी परंपराएं शामिल हैं. काछन गादी में काछन देवी की पूजा की जाती है. वहीं, मावली परघाव में देवी मावली के आगमन और स्वागत की परंपरा निभाई जाती है.

विशाल रथ को देखने उमड़ते हैं लोग
बस्तर दशहरे के दौरान रथ यात्रा खास आकर्षण होती है. पारंपरिक तरीके से तैयार किए गए बड़े रथ को खींचने में स्थानीय लोग हिस्सा लेते हैं. रथ से जुड़ी कई रस्में होती हैं, जिनमें भीतर रैनी और बाहर रैनी भी शामिल हैं. इन परंपराओं के दौरान बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं. यहां आने वाले लोग सिर्फ धार्मिक आयोजन ही नहीं देखते, बल्कि बस्तर की पारंपरिक कला, लोक संस्कृति और सामुदायिक जीवन को भी करीब से समझते हैं. इस त्योहार में अलग-अलग इलाकों से देवी-देवताओं के प्रतीक और उनके प्रतिनिधि भी शामिल होते हैं. इससे यह पर्व बस्तर के गांवों और समुदायों को आपस में जोड़ने का काम करता है.

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दशहरे के आखिर में लगता है मुरिया दरबार
बस्तर दशहरे का एक अहम हिस्सा मुरिया दरबार है. पुराने समय में यह ऐसा मंच था, जहां अलग-अलग समुदायों के प्रतिनिधि और स्थानीय लोग अपनी समस्याएं राजा के सामने रखते थे. राजा उनकी बातें सुनते थे और लोगों की परेशानियों पर चर्चा होती थी. समय के साथ इस परंपरा का स्वरूप बदला है, लेकिन इसका सामाजिक महत्व बना हुआ है. आज भी यह आयोजन लोगों की समस्याओं, उनकी जरूरतों और समुदाय से जुड़े मुद्दों को सामने रखने का माध्यम है. इस तरह बस्तर दशहरा केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है. यह त्योहार धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोगों के सामाजिक जीवन और उनकी सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है.

बस्तर दशहरा क्यों है खास?
बस्तर दशहरा बताता है कि भारत में एक ही त्योहार को अलग-अलग जगहों पर अलग तरीके से मनाया जा सकता है. कहीं दशहरा रावण दहन के लिए जाना जाता है, तो कहीं यह देवी की पूजा, विशाल रथ यात्रा और आदिवासी परंपराओं का प्रतीक है. करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह आयोजन बस्तर की सदियों पुरानी संस्कृति को आज भी जीवित रखे हुए है. यहां रावण का पुतला न जलाना किसी कमी का संकेत नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की अलग धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है. यही वजह है कि बस्तर दशहरा देश के सबसे अनोखे त्योहारों में गिना जाता है.

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