मानसून सत्र के पहले NDA का मिशन दो तिहाई बहुमत, शरद पवार के 8 सांसदों पर नजर

मानसून सत्र की शुरुआत से पहले सत्ताधारी एनडीए दो तिहाई बहुमत का आंकड़ा जुटाने के मिशन में जुटा हुआ है. पहले टीएमसी और फिर उद्धव ठाकरे की पार्टी में बगावत के बाद अब नजर शरद पवार की पार्टी पर है.

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शरद पवार की पार्टी के सांसद भी कांग्रेस में विलय की चर्चा से बेचैन (Photo: ITG) शरद पवार की पार्टी के सांसद भी कांग्रेस में विलय की चर्चा से बेचैन (Photo: ITG)

हिमांशु मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 02 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 12:41 PM IST

संसद का मॉनसून सत्र शुरू होने वाला है और इससे पहले सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) दो तिहाई बहुमत जुटाने की जुगत में जुटा हुआ है. पहले तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों के पाला बदल और फिर उद्धव ठाकरे की पार्टी के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे की पार्टी में शामिल होने के बाद अब एनडीए की नजर शिवसेना (यूबीटी) की गठबंधन सहयोगी शरद पवार की पार्टी के सांसदों पर है.

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सूत्रों की मानें तो एनसीपी (शरद पवार) के लोकसभा में आठ सांसद एनडीए के संपर्क में हैं. हालांकि, इसे लेकर अभी कुछ भी तय नहीं है कि इस सांसदों का ठिकाना कौन सी पार्टी होगी. एनडीए की अगुवाई कर रही भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इन सांसदों को लेने के लिए तैयार नहीं है. बीजेपी नेतृत्व ने इनमें से किसी को मंत्री पद देने के कयास भी खारिज कर दिए हैं.

शरद पवार की पार्टी के सांसद भविष्य में सुनेत्रा परिवार की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में जा सकते हैं. एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की संभावनाएं फिलहाल नकारी जा रही हैं. एनसीपी (शरद पवार) के सांसदों की बगावत के पीछे पार्टी के कांग्रेस में विलय के कयासों को वजह बताया जा रहा है. कहा जा रहा है कि कांग्रेस में विलय की अटकलों से शरद पवार की पार्टी के सांसदों में बेचैनी है.

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शरद पवार की पार्टी के सांसद 2029 के लोकसभा चुनाव में अपने टिकट को लेकर सशंकित हैं. एनसीपी (एसपी) के कुछ सांसदों का यह भी कहना है कि केंद्र में एनडीए की सरकार है ही, महाराष्ट्र में भी एनडीए ही सत्ता में है. ऐसे में उनको अपने क्षेत्र की समस्याओं का समाधान कराने, विकास कार्य कराने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

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इन सबके बीच चर्चा इस बात की है कि शरद पवार की अगुवाई वाली पार्टी के सांसदों का समर्थन किस तरह से एनडीए ले सकता है, इसकी संभावनाएं तलाशी जा रही हैं. इस पूरी कवायद के पीछे महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए जरूरी दो तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिशें हैं.

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