पेपर लीक, परीक्षा में सुधार और रोजगार जैसे मुद्दे पर सड़क से लेकर संसद तक सियासी संग्राम छिड़ा हुआ है. दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन चल रहा है तो विपक्ष संसद भवन में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. विपक्ष के आक्रामक तेवर से मॉनसून सत्र चल नहीं आ पा रहा है. पेपर लीक के मुद्दे पर विपक्ष चर्चा की मांग कर रहा है तो सरकार भी चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन उसके बाद भी आखिर में सदन में चर्चा क्यों नहीं हो पा रही है, पेच कहां फंसा है?
लाखों युवाओं का भविष्य, सालों की मेहनत और परीक्षाओं की साख, नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के मुद्दे ने पूरे देश के युवाओं में उबाल पैदा कर दिया है. संसद से सड़क तक सत्तापक्ष (सरकार) और विपक्ष दोनों ही चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि वे इस बेहद गंभीर विषय पर तत्काल और खुली चर्चा चाहते हैं.
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव सहित विपक्षी नेताओं के प्रधानमंत्री के आवास पर धरना दिए जाने के बाद मोदी सरकार भी चर्चा कराने के लिए 'सहमत' हो गई है. मोदी सरकार के रजामंद होने के बाद विपक्ष ने अपने स्टैंड को बदल दिया है और अब नियम 267 के तहत चर्चा चाहती है. इस तरह से सत्तापक्ष और विपक्ष के शह-मात के खेल में चर्चा का पेच फंसा हुआ है.
पेपर लीक पर सरकार चर्चा के लिए तैयार
पेपर लीक के मुद्दे पर तेज होते आंदोलन और विपक्ष के आक्रामक तेवर के चलते सरकार संसद में चर्चा के लिए तैयार है. बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने कहा कि एनडीए सरकार पूरी तरह से युवाओं के भविष्य के लिए, चर्चा करने को तैयार है, हर सवाल का जवाब देने को तैयार है. कांग्रेस, राहुल गांधी समेत पूरा विपक्ष चर्चा से भाग रहा है, क्योंकि उनको मालूम है कि जब वे सदन के पटल पर चर्चा करने आएंगे, तो उनका दोहरा चरित्र जगजाहिर हो जाएगा.
नितिन नवीन ने कहा कि हम उनको (विपक्ष) को खुली चुनौती देते हैं कि आइए, संसद के पटल पर छात्र, युवा, NEET हर विषय पर चर्चा कीजिए. लेकिन मुझे मालूम है कि राहुल गांधी और उनका कुनबा कभी भी चर्चा के लिए सामने नहीं आएगा, क्योंकि उनका इतिहास रहा है युवाओं को भड़काने का है. एनडीए सरकार ने युवाओं के भविष्य को सही दिशा दी है. युवा स्टार्टअप, यूनिकॉर्न, आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए जाना जाता है. विपक्ष युवाओं को सिर्फ स्टोन पेल्टर के रूप में देखता है जबकि NDA सरकार और पीएम मोदी पूरी तरह युवाओं का भविष्य सुरक्षित बनाने के लिए संकल्पित हैं.
पेपर लीक पर विपक्ष की चर्चा की मांग
पेपर लीक के मुद्दे पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित विपक्षी दल के नेता लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिले और चर्चा की मांग रखी. इसके बाद राहुल गांधी सहित सभी विपक्षी दलों के नेताओं ने प्रधानमंत्री के आवास पर जाकर धरना दिया, जिसके बाद केंद्रीय राज्यमंत्री जीतेंद्र सिंह ने उनसे मिलकर कहा कि सरकार चर्चा के लिए तैयार है. मोदी सरकार के रजामंद होने के बाद राहुल गांधी ने शर्त रख दी कि पहले शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें और नियम 267 के तहत चर्चा हो.
सरकार के रुख से साफ लगता है कि वो धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं दिलाना चाह रही है, जिसके चलते ही मामला फंसा हुआ है. ऐसे में संसद में गतिरोध की सबसे बड़ी वजह अब चर्चा की नहीं बल्कि यह है कि चर्चा किस नियम के तहत और किस समय पर हो.
सत्तापक्ष और विपक्ष में क्यों फंसा पेच
पेपर लीक के मुद्दे परविपक्ष की शर्त (स्थगन प्रस्ताव / नियम 267) के तहत चर्चा कराने की है. विपक्ष चाहता है कि संसद के बाकी सारे कामकाज रोककर, 'स्थगन प्रस्ताव' या विशेष नियम के तहत केवल और केवल पेपर लीक पर ही तुरंत अलग से बहस कराई जाए. उनका मानना है कि युवाओं का यह मुद्दा आपातकालीन है, इसलिए इसे अन्य किसी विषय में मिलाया नहीं जा सकता. विपक्षी दलों की इस मांग पर सरकार तैयार नहीं है.
सरकार पेपर लीक के मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है और उसकी मंशा सामान्य नियम के तहत चर्चा कराने की है. सरकार का कहना है कि विपक्ष सामान्य नियम के तहत पेपर लीक का मुद्दा जितने चाहे समय तक उठाए, सरकार हर सवाल का जवाब देने को तैयार है. इसी गतिरोध में चर्चा नहीं हो पा रही है, क्योंकि दोनों की मंशा सियासी नैरेटिव सेट करने की है.
राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने दो टूक कह दिया है कि पहले शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हो, इसके बाद चर्चा होगी. विपक्ष ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि हम नियम 267 के तहत चर्चा चाहते हैं. सरकार विपक्षी की शर्तों पर चर्चा के लिए तैयार नहीं हैं. राज्यसभा में नेता सदन जेपी नड्डा ने विपक्ष के व्यवहार को गैर जिम्मेदाराना बताया.
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी लोकसभा में विपक्ष को कठघरे में खड़ा किया. उन्होंने कहा कि विपक्ष जैसे ही शर्तें रखता है, सब समझ जाते हैं कि वह चर्चा से भाग रहा है. इन सबके बीच बहस का केंद्र बनकर उभरा है नियम 267. सरकार भी चर्चा के लिए तैयार है, इसके लिए कई नियमों का विकल्प भी है, लेकिन विपक्ष राज्यसभा में नियम 267 के तहत ही चर्चा की मांग पर क्यों अड़ा हुआ है?
'क्रेडिट' और 'नैरेटिव' की जंग में उलझा
पेपर लीक पर संसद में चर्चा के लिए शह-मात की लड़ाई हो रही है. नियमों की इस लड़ाई के पीछे राजनीतिक क्रेडिट और नैरेटिव तय करने का खेल छिपा है. विपक्ष सरकार को 'नियम 267' या विशेष बहस के लिए झुका देता है, तो इसे विपक्ष की बड़ी नैतिक और राजनीतिक जीत माना जाएगा, इससे यह संदेश जाएगा कि विपक्ष ने केंद्र सरकार को घुटनों पर ला दिया और संसद की पूरी कार्यवाही रोककर युवाओं के मुद्दे को केंद्र में ला खड़ा किया.
सरकार यह संदेश नहीं देना चाहती कि वह विपक्ष के दबाव में आ गई है या संसद की तय कार्यसूची पर उसका नियंत्रण छूट रहा है. ऐसे में अलग से बहस होने पर पूरा फोकस केवल सरकार की प्रशासनिक विफलताओं और शिक्षा मंत्रालय पर रहेगा, जबकि सामान्य नियम के तहत चर्चा होने पर सरकार अपनी उपलब्धियां भी गिना सकेगी और कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों पर भी निशाना साध सकेगी.
नियम 267 के तहत चर्चा पर क्यों अड़ा विपक्ष?
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि नियम 267 के तहत चर्चा होती है, तो विपक्ष सीजेपी प्रोटेस्ट में छात्रों पर लाठीचार्ज को 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' बताने की अपनी रणनीति में सफल रहेगा. इस नियम के तहत चर्चा होती है, तो चर्चा के बाद वोटिंग का प्रावधान भी है. अगर वोटिंग होती है, तो हर दल की लाइन क्लियर होती है. उन्होंने कहा कि विपक्ष के इसी नियम के तहत चर्चा की मांग पर अड़ने के पीछे एक प्रमुख वजह यह भी है कि छात्र-युवा तक यह संदेश जाए कि उनके प्रोटेस्ट और उस पर हुए लाठीचार्ज को लेकर किस दल की लाइन क्या है.
अरविंद सिंह ने कहा कि एनडीए की सरकार के समय ही नोटबंदी पर इसी नियम के तहत संसद में चर्चा हुई थी. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के दौरान भी विपक्ष की डिमांड स्वीकार करते हुए सरकार ने इस नियम के तहत चर्चा कराई थी. कुल मिलाकर छह से सात मौके ऐसे आए हैं, जब राज्यसभा में किसी विषय पर नियम 267 के तहत चर्चा हुई है.
राज्यसभा की रूल बुक का नियम 267 स्थगन प्रस्ताव से संबंधित है. इस नियम के तहत अगर किसी विषय पर चर्चा को सभापति अनुमति देते हैं, तो उस दिन के लिए सदन की कार्यसूची में दर्ज सभी विषयों पर कार्य स्थगित हो जाता है. यानी प्रश्नकाल, शून्यकाल समेत सभी कार्य स्थगित कर दिए जाते हैं और सदन में केवल उसी विषय पर चर्चा होती है, जिस विषय पर स्थगन प्रस्ताव के नोटिस को चर्चा के लिए सभापति की ओर से अनुमति मिली होती है.
कुबूल अहमद