परिसीमन पर क्यों उबल रहा दक्षिण भारत, समझें- नेताओं को कौन-सी चिंताएं खाए जा रहीं

केंद्र सरकार द्वारा महिला आरक्षण को नए परिसीमन से जोड़ने के फैसले ने देश में उत्तर-दक्षिण विवाद को हवा दे दी है. तमिलनाडु और तेलंगाना समेत दक्षिण के राज्यों ने इसे अपनी राजनीतिक शक्ति कम करने की साजिश बताया है. स्टालिन ने काला झंडा फहराने और रेवंत रेड्डी ने आर्थिक योगदान के आधार पर सीटों के बंटवारे की मांग की है.

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परिसीमन में दक्षिण भारत में उबाल. (photo: ITG) परिसीमन में दक्षिण भारत में उबाल. (photo: ITG)

मौसमी सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 16 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:29 PM IST

दक्षिण भारतीय राज्यों ने मोदी सरकार द्वारा महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने के कदम के तीखा विरोध करते हुए मोर्चा खोल दिया है. ये मुद्दा अब उत्तर और दक्षिण के बीच बड़ा राजनीतिक टकराव बनता जा रहा है. तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक के नेताओं ने केंद्र सरकार पर संघीय ढांचे पर हमला करने का आरोप लगाते हुए एकजुट मोर्चा बनाने की अपील की है.दक्षिण का आरोप है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व में सजा दी जा रही है. साथ ही विपक्ष ने भी परिसीमन आयोग को मिलने वाली शक्तियों पर चिंता जताई है.

डीएमके ने परिसीमन विधेयक, 2026 को अवैध और देश के संघीय ढांचे पर हमला बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इसे असंवैधानिक बताया है और व्यापक आंदोलन की धमकी दी है.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने एक कड़े वीडियो संदेश में प्रधानमंत्री मोदी पर सीधा हमला किया. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार दक्षिण के राज्यों के साथ दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार कर रही है. स्टालिन ने परिसीमन विधेयक 2026 को अवैध और संघीय ढांचे पर हमला बताते हुए इसे तुरंत रद्द करने की मांग की है. उन्होंने कहा कि अब  आ वक्त गया है कि तमिलनाडु दिल्ली की भाजपा सरकार को अपनी ताकत दिखाएं.

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रेवंत रेड्डी ने जताई चिंता

इसी तरह तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भी परिसीमन 2026 का विरोध किया है. उन्होंने सभी दक्षिणी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा है. उन्होंने कहा कि जनसंख्या को प्रतिनिधित्व का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता. रेवंत रेड्डी ने चेतावनी दी कि प्रस्तावित बदलाव लंबे वक्त तक संघीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं.

उन्होंने चिंताएं जताई कि प्रस्तावित परिसीमन से क्षेत्रीय असंतुलन और बढ़ेगा. ये प्रस्ताव जनसंख्या नियंत्रण और बेहतर शासन करने वाले राज्यों को सजा मिलेने जैसा है. उन्होंने ये भी कहा कि समय के साथ संसद में दक्षिणी राज्यों की आवाज और प्रभाव का कम होना है.

रेवंत रेड्डी का नया फॉर्मुला

रेड्डी ने प्रस्ताव दिया कि लोकसभा सीटों का 50% आवंटन जनसंख्या के आधार पर और बाकी 50% राज्यों के आर्थिक योगदान (GSDP) और प्रदर्शन मानकों के आधार पर होना चाहिए.

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कर्नाटक ने भी जताई चिंता

कर्नाटक सरकार ने भी परिसीमन की टाइमिंग और पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं. मंत्री प्रियांक खड़गे ने केंद्र से पूछा कि बिना नई जनगणना के इतनी जल्दबाजी में फैसला क्यों लिया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि डेटा के बिना निर्णय लेना स्वीकार्य नहीं है. कर्नाटक का तर्क है कि वो देश के आर्थिक विकास के इंजन हैं और विकास को गति देने वाले राज्यों को राजनीतिक रूप से कमतर आंकना पूरी तरह से अनुचित है.

TVK प्रमुख ने संशोधन वापस लेने की मांग

तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय टीवीके प्रमुख विजय ने भी 131वें संविधान संशोधन को वापस लेने की मांग की है. उन्होंने इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए कहा कि ये कुछ राज्यों को इनाम और दूसरों को सजा देने वाला कदम है. विजय ने आशंका जताई कि इस कदम से तमिलनाडु जैसे राज्यों को मिलने वाले वित्तीय आवंटन में भी भारी कटौती हो सकती है. उन्होंने कहा कि संघीय ढांचे के हित में इस संशोधन को वापस लिया जाना चाहिए.

विपक्ष की चिंता परिसीमन आयोग को मिलने वाली शक्तियों को लेकर भी है. प्रस्तावित ढांचे के तहत आयोग को लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या तय करने, एससी/एसटी आरक्षित सीटों का निर्धारण करने और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तैयार करने का अधिकार होगा. आलोचकों का मानना है कि इतने बड़े बदलाव केवल मजबूत डेटा और व्यापक राजनीतिक आम सहमति के आधार पर ही होने चाहिए, न कि आनन-फानन में.

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क्या है दक्षिणी राज्यों की चिंता

दक्षिणी राज्यों की चिंता ये है कि उन्होंने दशकों से जनसंख्या को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है और कई शासन संकेतकों पर बेहतर प्रदर्शन किया है. अब नई जनगणना के आधार पर परिसीमन होने से उत्तर भारतीय राज्यों की सीटें बढ़ जाएंगी और दक्षिण की आवाज संसद में कमजोर हो जाएगी. दक्षिण के इस कड़े रुख ने केंद्र और विपक्ष के बीच तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है जो प्रक्रिया सामान्य प्रशासनिक अभ्यास होनी चाहिए थी, वह अब एक बड़े राजनीतिक और संघीय टकराव में बदल गई है.

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