सम्राट चौधरी या नित्यानंद राय... बिहार में मुख्यमंत्री पद की दौड़, किसमें कितना है दम?

बीजेपी के दो प्रमुख नेता सम्राट चौधरी और नित्यानंद राय बिहार में मुख्यमंत्री पद के मुख्य दावेदार हैं. सम्राट चौधरी उपमुख्यमंत्री हैं और कुशवाहा समुदाय से आते हैं, जबकि नित्यानंद राय केंद्र सरकार में गृह राज्य मंत्री हैं और यादव समुदाय से संबंध रखते हैं. दोनों के पास अलग-अलग ताकतें और चुनौतियां हैं.

Advertisement
बिहार का सीएम बनने के लिए दोनों में कई खूबियां हैं. (Photo: PTI) बिहार का सीएम बनने के लिए दोनों में कई खूबियां हैं. (Photo: PTI)

रोहित कुमार सिंह

  • पटना,
  • 10 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:29 PM IST

बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर मुख्यमंत्री पद को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं. एनडीए में भविष्य के नेतृत्व को लेकर चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है. बिहार के मुख्यमंत्री पद के लिए बीजेपी के दो प्रमुख नेताओं- सम्राट चौधरी और नित्यानंद राय को मुख्य दावेदार के रूप में देखा जा रहा है. जबकि कुछ अन्य नामों पर भी विचार-विमर्श जारी है.

Advertisement

इस मामले में आखिरी फैसला पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व और व्यापक गठबंधन समीकरणों पर निर्भर करेगा. लेकिन दोनों नेता अपने साथ अलग-अलग ताकत और चुनौतियां लेकर आते हैं.

सम्राट चौधरी की बात करें तो, वो वर्तमान में बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं और शासन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. ये एक्सपीरियंस उन्हें पार्टी के भीतर शासन के लिए तैयार चेहरे के रूप में दिखाता है. 

सम्राट चौधरी की खूबियां

राज्य की नौकरशाही मशीनरी, विकास के एजेंडे और राजनीतिक संतुलन के साथ सम्राट की परिचितता उन्हें दूसरे उम्मीदवारों के मुकाबले में एक अच्छा विकल्प बनाती है. इसके अलावा, चौधरी कुशवाहा (कोइरी) समुदाय से आते हैं, जो बिहार के जातीय मैट्रिक्स में एक प्रभावशाली ओबीसी समूह है.

बिहार की चुनावी राजनीति में ऐतिहासिक रूप से 'लव-कुश' सामाजिक समीकरण अहम रहा है और उनकी उम्मीदवारी इस ब्लॉक में बीजेपी की स्थिति को मजबूत कर सकती है.

Advertisement

यह भी पढ़ें: सम्राट चौधरी के लिए बिहार सीएम बनना आसान है, नीतीश कुमार होना मुश्किल

राजनीतिक विश्लेषक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मौन समर्थन को भी चौधरी के लिए एक अतिरिक्त फायदे के तौर पर देखते हैं. हाल के सार्वजनिक कार्यक्रमों में मिले संकेतों ने इस धारणा को बढ़ावा दिया है कि नेतृत्व परिवर्तन की स्थिति में, खास तौर पर गठबंधन में, वो एक आम सहमति वाले उम्मीदवार के तौर पर उभर सकते हैं.

सम्राट चौधरी के सामने कई चुनौतियां

हालांकि, चौधरी की राह बाधाओं से मुक्त नहीं है. आरजेडी के साथ उनका पुराना जुड़ाव बीजेपी के मूल कैडर के कुछ हिस्सों में अब भी सवाल खड़े करता है. इसके अलावा, समय-समय पर पार्टी में पूर्ण आंतरिक सहमति की कमी भी सामने आई है. उन्हें मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेश करने वाले पोस्टरों का विरोध जैसी घटनाएं दिखाती हैं कि गुटीय मतभेद पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं. ऐसे में साफ है कि उनके उत्थान के लिए केंद्रीय नेतृत्व के समर्थन की जरूरत होगी.

नित्यानंद राय की खूबियां

अब नित्यानंद राय की बात करें तो, वो वर्तमान में केंद्र सरकार में गृह राज्य मंत्री के पद पर हैं. राय बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं. केंद्रीय कमान से उनकी करीबी पार्टी में उनके कद को बढ़ाती है. बिहार बीजेपी अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल सहित राय का लंबा संगठनात्मक अनुभव, उनकी मजबूत जमीनी पकड़ को दिखाता है.

Advertisement

राय की एक प्रमुख राजनीतिक ताकत उनकी सामाजिक पहचान में छुपी है. यादव समुदाय से ताल्लुक रखने की वजह से, जिसे पारंपरिक रूप से आरजेडी का मुख्य आधार माना जाता है, उन्हें आगे बढ़ाना बीजेपी का इस मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाने की एक रणनीतिक कोशिश हो सकती है. अगर ये सफल होता है, तो ये बिहार के राजनीतिक अंकगणित को काफी हद तक बदल सकता है.

यह भी पढ़ें: नीतीश के मुख्यमंत्री पद छोड़ने की डेट हुई फाइनल, सम्राट चौधरी नए CM की रेस में सबसे आगे

इसके बावजूद, राय को भी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. राष्ट्रीय राजनीति में उनकी लंबी भूमिका को देखते हुए, राज्य स्तर पर उनका प्रत्यक्ष प्रशासनिक अनुभव तुलनात्मक रूप से सीमित है. राज्य सरकार के नेतृत्व की मांगें- जिसके लिए निरंतर स्थानीय जुड़ाव और शासन की निगरानी की जरूरत होती है, उन्हें चौधरी के मुकाबले में थोड़ा पीछे रखती हैं.

नित्यानंद राय के सामने कई चुनौतियां

इसके अलावा, बिहार में बीजेपी की स्थापित सामाजिक रणनीति मुख्य रूप से गैर-यादव ओबीसी समूहों को एकजुट करने के इर्द-गिर्द रही है. एक यादव नेता को मुख्यमंत्री के पद पर बैठाना इस नजरिए से हटकर होगा और पार्टी में आंतरिक बहस छेड़ सकता है. केंद्र और राज्य के बीच जिम्मेदारियों के संतुलन का भी सवाल है, क्योंकि राय वर्तमान में केंद्र सरकार में एक अहम भूमिका निभा रहे हैं.

Advertisement

कुल मिलाकर, बिहार के अगले मुख्यमंत्री को लेकर चर्चा व्यक्तिगत उम्मीदों से परे है. ये जातिगत समीकरणों, शासन की निरंतरता, गठबंधन की स्थिरता और पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश तथा पंजाब जैसे राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों से जुड़े व्यापक रणनीतिक गणनाओं को दिखाती है.

बीजेपी पहले ही राज्य के एक दूसरे 'कुशवाहा' नेता- उपेंद्र कुशवाहा का समर्थन कर चुकी है और छोटी पार्टी होने के बावजूद उन्हें हाल ही में हुए राज्यसभा चुनावों में उच्च सदन भेजा है. इसलिए ये सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या बीजेपी एक और कुशवाहा नेता को मुख्यमंत्री पद पर बिठाने का जोखिम उठाएगी?

कैसे काम करेगी रणनीति?

दूसरी ओर, पार्टी का यादव चेहरा होने के नाते नित्यानंद राय 2029 के अगले लोकसभा चुनावों में बिहार के 14% यादव वोट बैंक में सेंध लगाने में अहम साबित हो सकते हैं. अगर राय को शीर्ष पद दिया जाता है, तो वो अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के यादव वोट बैंक को नुकसान पहुंचाने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं.

जहां सम्राट चौधरी वर्तमान ढांचे में एक स्वाभाविक प्रशासनिक उत्तराधिकारी के रूप में दिखाई देते हैं, वहीं नित्यानंद राय एक ज्यादा रणनीतिक और लंबी राजनीतिक जुए का प्रतिनिधित्व करते हैं.

Advertisement

यह भी पढ़ें: नीतीश कुमार की संसदीय पारी शुरू, राज्यसभा MP के रूप में ली शपथ

बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व ही आखिरी फैसला लेगा. उसका फैसला न सिर्फ बिहार के भविष्य के नेतृत्व को आकार देगा बल्कि आने वाले सालों में राज्य के राजनीतिक समीकरणों को भी फिर से परिभाषित करेगा.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »